प्रेम सरल है, विग्रह कठिन है
एक दूजे के बिना हम दोनों क्या
वो परमात्मा भी असफल है
प्रेम का बंधन हमें ले चला था बड़ी दूर
तुझमें बसी थी मैं मुझमें बसा था तू
प्रेम को खूब संभाले चले थे हम
प्रेम तभी सफल है, जब अहम् नहीं, हम है
वर्ना सृष्टि का सारा खेल ख़त्म है
प्रेम सच्चा धर्म, परम कर्तव्य और नेक कर्म है
तू मुझसे या मेरे प्रेम से गुस्सा है ?
गर लड़ना है, तो जी भर के लड़ मुझसे
हर प्रेम कहानी का कमज़ोर पात्र सदा ही औरत है
न भूल, प्रेम के आगे सब निर्बल है
पुराना वाद-विवाद हो या नफरत, सिर्फ प्रेम ही हल है
क्योंकि प्रेम सक्षम है सम्बल है
तू मुझे डराता है धमकाता है
क्या यही सब तुझे आता है ?
प्रेम में लोग ऊँचा उठते है, गिराते नहीं
मेरा प्रेम तेरी समझ से बाहर क्यों है ?
तू है न संत, न भिखारी, फिर मैं क्यों बनी प्रेम-बेचारी
तुझे दुनिया अच्छी लगी, मुझे तेरी दुनिया प्यारी
तू देता रहा हाजरी दुनिया को
मैं तेरा इंतजार करके हारी
तूने प्रेम की बगिया न सींची, न खिली फुलवारी
मैं रही तेरी दुनिया का एक छोर
तेरे जीवन का रुख रहा सदा किसी ओर
नदी के किनारे भी अलग रह कर चलते है एक ओर
दुनियादारी में रहा अव्वल तू
पर प्रेम की बाज़ी तूने क्यों हारी ?
अब आई है तेरी सोचने की बारी
सिकंदर से क्या सबक सीखा है तूने ?
प्रेम भरे दिल या खाली दिल से होंगे विदा
राजा हो या रंक, आती सबकी बारी
कैसी संसार दीवानगी, जो न जाना प्रेम रवानगी
क्या तू है परिवार की मनौती, पर मेरे प्रेम में बना पनौती ?
प्रेम को कर दरकिनार बेमतलब जिया है तू, न जानी तूने बंदगी
क्या तूने कभी दर्पण देखा है ?
तेरे चेहरे पर प्रेम का एक भी नामोनिशां नहीं है बाकी
क्यों खाली है तेरी बाँहें, कँहा है तेरा प्रेम-मोती ?
प्रेम से जन्मा तू, प्रेम में पलाबढ़ा तू
प्रेम में खेला तू, प्रेम करने के वचन में बंधा तू
प्रेम के वशीभूत विवाह किया तूने
प्रेम से उत्पन्न की संताने तूने
दुनिया भर में प्रेम फैलाया तूने
फिर तुझे मुझे प्रेम देने में संकोच क्यों ?
तेरे परिवार में मैंने प्रेम के बीज बोये
ख़ुशी की फसल खिली, दिल के खेत हरे-भरे हुए
प्रेम की कड़ी में पीढ़ियों के जुड़े सिलसिले
प्रेम में डूब कर चलती है सारी दुनिया
प्रेम करना और पाना, प्रभु की शक्ति है
यह संसार उसी प्रेम का दिव्य फल है
क्यों मेरे हिस्से का प्रेम तू
कंही किसी और को दे आया ?
अब बोल रहा है मैं तेरे प्रेम से तर गया हूँ
तूने तो सब कह दिया सहजता से
तू छोड़ मेरी सब गलियां, रह लूँगा तेरे बिन
नहीं चाहिए मुझे तेरा प्रेमशगुन
तेरे प्रेम ने मुझे कभी न भरमाया है
मैं पूछती हूँ तुझसे क्या कभी तू प्रेम से
मेरे दिल के दरवाज़े तक आया है ?
मैंने अपनी सारी जीवन पूँजी तुझ पर लुटाई
मैंने तेरे बंजर जीवन में प्रेम की फसल उगाई
तू मुझे ही काटने पर तुला है, तुझे शर्म नहीं आयी
मेरे पवित्र प्रेम को तूने कुपात्रता से गवायाँ
तू क्यों दुनिया के विवादों को
तेरे मेरे प्रेम के बीच लाया ?
बस प्रेम ही लेना-देना था, जीवन-भर का फैसला था
भर देते थे हम एक दूसरे को प्रेम से
जब हो जाता था किसी का भी खाली
पर अब हम दोनों के बीच है सिर्फ गहरी खाई
सिर्फ मेरे प्रेम से न हो सकेगी भरपाई
तू नहीं तो किसने हमारे प्रेम को नज़र लगायी ?
प्रेम एक से नहीं, दो तरंगों से होता है उत्पन्न
पुरुष और नारी शक्ति बने ईश्वर की दो इकाई
प्रेम की गरिमा प्रेम से जाती है निभाई
तू खुद है प्रेम का दोषी
पर सजा सिर्फ मेरे नाम क्यों लिखी कसाई ?
एक अकेले फैसले लेते है सिर्फ हरजाई
टूटे बिखरे थे दिल के धागे
मरम्मत कर थोड़े से भी काम चला बढ़ते आगे
मिलबैठ कर प्रेम से सब सुलझा लेते अभागे
पर तेरी “मौन अनुपस्थति” से टूटे वर्षो के नाते
प्रेम करने का दंड दिया है ऐसा, मैंने होंठो की हँसी भी गँवाई
बुझ गयी है मेरे मन में तेरे प्रेम की बाती, ओ निर्मोही
सौदा नहीं, प्रेम का मसला था
कभी दिल तुझ पे फिसला था
मेरा प्रेम गहरा और सच्चा था
तू तो सदा से ही प्रेम में कच्चा था
तूने दिल से और नज़र से उतारा मुझे, क्या तू बच्चा था ?
तू बदल रहा था, मैं कँहा समझ पाई ?
मेरे प्रेम के साँचे में कँहा ढला तू ?
मैं तो प्रेम से प्रेम के सफर पर चली थी
बीच रास्ते मुझे खुद ही छोड़ गया था तू
जन्मों जन्मों का प्रेम भरा रिश्ता
रचता है वो अनोखा आसमानी फरिश्ता
बड़े भाग बड़े पुण्य प्रताप से है मिलता, नहीं है यह सस्ता
पकड़ा था हाथ नहीं मिला साथ
सुख-दुःख बाँटूंगा किया था कभी यह भी वादा
जो भी मिला प्रेम, मिला कभी सूखा ,कभी आधा
प्रेम न सही समय ही दे देता
समय तुझे खुद ही प्रेम से भर देता
प्रेम का ढोंग महंगा पड़ता है दिलफ़रेबियों को
भले ही प्रेम सच्चा हो या झूठा
पर मेरे हिस्से तो दोनों ही नहीं आये
दिल का यार तो बन नहीं सका, निभा देता सिर्फ यारी
तू मुझे प्रेम में तोड़ता रहा
मैं तुझे प्रेम से जोड़ती रही
प्रेम में नहीं चलता है यह समीकरण, कहती है खुदाई
तू मुझे अक्ल सिखाता रहा
स्वार्थ की पढ़ाई, तूने मुझे हर बार याद दिलाई
मुझसे कहता रहा, बंद कर अपनी प्रेम-दुहाई
प्रेम-ग्रन्थ को पढ़ते पढ़ते बीते तीन दशक
मैं बन गयी विदुषी और तू रहा असंतोषी प्रेम-रिक्त
मेल-बेमेल बंधन को प्रेम जोड़ता है सशक्त
तेरे प्रेम के ईंधन के बिना और बिन कमाई
मैंने कैसे जिंदगी की गाड़ी है चलाई
पर आज तूने उसमें भी है आग लगाई
प्रेम पारस है, तू रहा पत्थर का पत्थर,दुआ भी तुझे न बदल पाई
प्रेम और विवाह, तूने दोनों में मात खाई
आज मैं इस प्रेम ग्रन्थ के अंतिम पृष्ठ पर आई
प्रेम की झोली प्रेम से भरते है
पर मेरी झोली में न सैंया है, न साईं
इस खाली झोली को विदाई देने की योजना, तूने है बनाई
प्रेम दुर्लभ है, सिर्फ धरती पर प्रज्जवलित है
सालों की तपस्या के बाद मिलता शुभ फल है
एकनिष्ठ प्रेम ही शक्ति का स्थल है
प्रेम से बड़ा न कोई शस्त्र
प्रेम से बड़ा न कोई शास्त्र
प्रेम की प्रकृति है बड़ी विचित्र
प्रेम हर मर्ज़ की दवा है
पर यह भी है सच
कि प्रेम से बड़ा न कोई दर्द है
प्रेम है सच्चा गहना
बड़े चाव से हर कोई चाहे पहनना
प्रेम रखता सबको सुखद जीवन-पर्यन्त
प्रेम ही खुदा है
प्रेम ही है सच्ची इबादत
प्रेम ही व्यापत है सर्वत्र
प्रेम में दिल हारना नियति है, जीत है सच्चा समर्पण
हर चीज को जीतना पड़ता है संसार में
दुनिया का प्यार बड़ा खुदगर्ज़
काश तू मेरे संग दो कदम ही चल लेता
तो मेरे प्रेम के पँख, तुझे भी ले उड़ते आसमान में
और हम बन जाते, जीते-जागते सच्चे प्रेम का प्रसंग
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