शादी बनाम नौकरी…..

नौकरी तो हमने भी की है यार

तीन दशक का है अनुभव बिना पत्राचार

शादी बनाम नौकरी या नौकरी बनाम शादी, प्यार का इकरार

कुछ भी समझ लो, दोनों तरफ से है गुलामी, घर की सरकार

सरकारी नौकरी नहीं, सरकारी कर्मचारी के सेवादार

परिचय राजरानी का पर पद, घर का विनम्र मददगार

न सूचना, न नियुक्ति, न ऑफिस, बस चारदीवारी के काम चार

जरुरत बस एक देवदूत की, लेने को हो जा नया अवतार

चुपचाप बाँध दिय गए सहर्ष, अपने ही घरद्वार

पद एक, विभाग सभी, टिक सको तभी कहलाओगे समझदार

अपना है घर, अपनों का है काम, अपनों की बनोगी मुफ्त सलाहकार

निस्वार्थ भाव रखना, जैसे बिना ईंधन के गाड़ी की रफ्तार

पगली, घर सँभालने के भी कोई पैसे लेता है, रही न अनपढ़ गँवार

हमें प्यार का चश्मा लगा था, हमने भी कर दिए झट जुबानी हस्ताक्षर

किया है ऐसा हृदय परिवर्तन, आज भी लगे है जैसे घर का बंधनवार

गृहलक्ष्मी का देकर निवाला, खाली करते रहे, तन-मन-धन के भण्डार

गृह को सुंदर बनाने वाली का मन कितना असुंदर, कितना असहज, कितना लाचार

घर की बंदी, लगा कर बिंदी समेटे, बंदी गृह के सुंदर उपहार

न छुट्टी, न पेंशन, न पदोन्नति, काम बढ़ेगा, मान घटेगा सिलसिलेवार

चौबीसों घंटो की नौकरी, बस आँख रखना खुली, जुबान रखना बंद, हजूर

मुफ्त की रोटी, कपड़ा और घर के एक कोने की हिस्सेदार

इससे पहले कि हम भी खोलते अपनी भावनाओं के द्वार

अच्छाई का जामा, लिबास पाजामा, प्यार का पंचनामा करना पड़ा मंज़ूर

शादी बनाम नौकरी या नौकरी बनाम शादी, हमारी समझ से था बड़ी दूर

हम भी ज्ञान और कौशल से करना चाहते थे खुद का विस्तार

कुछ सपनें हमने भी देखे थे, उजले और शानदार

आज़ादी, पैसा, घूमना-फिरना, झटपट हो तैयार

कुछ घंटो का मनपसंद काम, हम भी चाहते थे व्यक्तित्व निखार

पक्की होगी नौकरी, पक्की होगी पगार, पक्का समय, प्रत्येक वार

पर इससे पहले हमारी चलती, उनके चले कड़वे शब्दों के वार

घर बैठना परम कर्तव्य होता है, क्या रखा है बाहर संसार ?

शादी दो पहियों पर चलती है, नहीं तो बिगड़ता है घर संसार

तो फिर नौकरी एक ही क्यों करे ? क्या यहाँ संतुलन की नहीं है दरकार ?

आधा है अंग, आधी है रूह, आधा है हिस्सा, फिर एक पर क्यों भार ?

यह दुनिया तेरे हिस्से और घर मेरे हिस्से, शर्त में नहीं बांधो प्यार

आदमी के पीछे खड़ी है औरत, पर औरत के पीछे खड़ा है शून्य संसार

कंधे पर सर रखने वाली, कंधे की जिम्मेवारी में भी है होशियार

तुम होंगे रिटायर, संसार से निकलोगे बनकर एक विजयी आफिसर

मेरी रिटायरमेंट कभी न आएगी, घर के कामों से इस्तीफा होता नहीं मंजूर

मुझे लड़नी है एक लंबी लड़ाई, जिसमें मैं भी बनूँ तुम्हारी हिस्सेदार

शादी और नौकरी दोनों में मुझे मिले प्यार, सम्मान,गर्व और आभार

Today’s Woman

A woman of substance

Walks willingly in odd and even circumstance

Not by chance

A one-woman army

Fights alone with her invisible enemy

Not by becoming weak but stormy

A go-getter lady

Empowers herself by grooming and self study

Not by staying fragile but sturdy

A feather in her cap

Completes her mission before her final nap

Not by society norms but follows her own mental map

A woman of her words

Finds happiness in comforting both her worlds

Not by old traditional rooted chords

A woman in a million

Keeps strong headed opinion

Not by leaving her duties home or pavilion

A woman of spirit

Goes beyond her body’s limit

Not by favors but achieves on her own merit

A woman of letters

Awakes society by solving conservative matters

Not by simplicity alone but she is a smart trendsetter

A woman of parts

Stands firmly with full hearts

Not by skill alone but her amazing master art

A woman on mission

Carries love based human tradition

Not by rituals but her own strong composition

A fine figure of a woman

Steps confidently not less than super woman

Not by race but by her own grace becomes wonder woman

A woman among women

Considers self-believe and self-potential make a real woman

Not by destiny but truly she is a self-driven woman

HAPPY WOMEN’S DAY !!!

शिवरात्रि

त्रिनाथ की उत्पति

त्रिदेव की पाणिग्रहण स्मृति

त्रिशक्ति से मोक्ष मुक्ति

त्रिभाव में समाहित जगत्पति

अज्ञान, अविद्या, अन्धकार के विलय की रात्रि 

तभी कहलाती महापर्व महाशिवरात्रि

शिव एक, असंख्य उसके प्रेमलेख

चढ़ती, ठहरती, उतरती जीवन ऊर्जा, सब विधिलेख

गिरना, उठना, संभलना समझाती ओंकार की धुन  

हर जीव के उपवन के है स्वामी,वो त्रिभुवन

शिवतीर्थ, शिवशक्ति, शिवज्ञानी

सृजक, पालक, संहारक, शिव औढरदानी

समस्त जीवों के स्वामी, भोले अंतर्यामी

दिखाते सन्मार्ग त्रिआयामी

शिव का समझे अर्थ वर्ना सब अनर्थ

तमो, रजो, सतो, त्रिगुणी में विलीन सब भावार्थ

शिव से जन्मों जन्मों का नाता

शिव से शक्ति का अनंत मिलन जग भरमाता

त्रिलोकी चले ब्याह रचाने

पवित्र बंधन से संसार लुभाने  

साकार में जैसे ब्रह्माण्ड

निराकार में शिवलिंग जैसे सूक्ष्म खंड

माया से काया का अटूट संबंध  

 शिव प्रेमी पा जाते अमृत बिना कोई अनुबंध

तू जी रहा है तो है शिव,

तू मर रहा है तो है शव

जीवन है कठोर तपस्या

जाग्रत कर शक्तियाँ, नहीं तो घोर अमावस्या

फिर बंध संसार में

उपयोग कर समस्त इन्द्रियाँ

कर्म कर्तव्यों की कर इतिश्री

चुन प्रभु का मार्ग जैसे दुग्ध में मिश्री  

एकरूपी में व्यापत सर्वरूपी

चाह ले उसे, जैसे तेरे भाव, ओ बहुरूपी

व्यर्थता में सार्थकता ,सार्थकता में व्यर्थता

अपनी दृष्टि में समेटनी होगी एकाग्रता

पाना उसे है यदि पार्वती

खोने उसे है शिव की स्वयं उपस्थिति   

एक लोटा जल से कर शिवाभिषेक

निर्मल मन में बसता वो परमात्मा नेक

आह जिंदगी वाह जिंदगी    

जब जब आँख को सुखाता हूँ जिंदगी

अगले पल फिर से भीग जाती है जिंदगी

जिंदगी को जोड़ने की कोशिश में

हर बार तोड़ता जाता हूँ जिंदगी

जीतने की भरसक कोशिश में

हर रोज हार जाता हूँ जिंदगी    

कभी जिंदगी आगे, कभी मैं पीछे

कभी मैं आगे, कभी जिंदगी पीछे

इसी भाग-दौड़ में, इसी उथल-पुथल में

ताउम्र गँवाता हूँ जिंदगी

जिंदगी का अर्थ समझने में

व्यर्थ बना डाली जिंदगी

जिंदगी के मायने क्या है

रोज इस वाक्य में उलझ जाता हूँ जिंदगी

आज पढ़ा-लिखा, कल बेवकूफ का खिताब पाता हूँ जिंदगी

फटे है, उधड़े है, पुराने हो चले है, घर के झमेले

रोज़ सिलने, कुछ जुगाड़ लगाने में

इसी उधेड़ बुन में सुई-धागा लेकर

वक़्त में पैबंद का टाँका लगाता हूँ जिंदगी  

जिंदगी में जितने छेद है, उतने ही भेद है

इनको दुरुस्त करने में

खुद ही तार-तार हो जाता हूँ जिंदगी

सुख की धूप अभी निकली ही थी

न जाने कँहा से दुःख के बादल आ गए

आँखों में सपने संजोये ही थे

न जाने कँहा से तूफान के साये नज़र आ गए 

नींद की खुमारी अभी चढ़ी भी न थी

संग अपने सपने भी उड़ा ले गए

दो कदम आगे तो चार कदम पीछे

कँहा मंज़िल तक पहुँच पाया हूँ जिंदगी

वक़्त से हाथ मिलाना चाहा बहुत

पर हाथों से रेत सी फिसल जाती है जिंदगी

रोटी के दो कौर, किस्मत पर नहीं जोर

बड़े से जीवन की एक छोटी सी किस्त रोज़ चुकाता हूँ जिंदगी

हिसाब किताब में बंट गए पैसे और जमीन, कीमत नहीं जानते तेरी जिंदगी

क्या मिला, क्या नहीं, एक सौदा नहीं, बेशकीमती है जिंदगी

सफर का मज़ा लेने से पहले न जाने कैसे हाथ से छूट गयी गाड़ी जिंदगी

बेफिक्र और फक्र जिंदगी, जन्नत का पता जल्द बता दे जिंदगी

रिश्तों के बिना क्या है जिंदगी

यह सोच मिलने और गले लगाने चला हूँ जिंदगी

बंद दरवाज़ों और दिलों पर है कड़ा पहरा

दस्तक देने को बेकरार हूँ जिंदगी

सुख की दो बूँदे, दुःख का अथाह समंदर

दुनिया से बचा आँखों में भर लाया हूँ जिंदगी

दर्द में निकलती आह, खुशी में निकलती वाह

तेरे इस दोरंगे स्वभाव पर इतराता हूँ जिंदगी

Love is forever

Love, love, love

What is love ? 

Nothing is more sweet than love

We all live and die for this superb love

Most cherished emotion on this earth

Love is a heaven’s feel in our heart

Love is a great feeling

God’s subtle blessing

Love is a passion

Nature’s best creation

Love is like a limelight

Graced by sunlight and moonlight

Love is a blind fact

Forever care in kind act

Love is a gratitude

No space for an attitude

Love is an investment

Returns guaranteed but true commitment

Love gives freedom

Accepted well without wisdom

Love has a potential

A gift for someone special

Love is an extreme joy

Never treat it like a toy

Love is a kind presence

A simple gesture of innocence

Love is missing someone

Unconditional love is always true one

Love brings togetherness

Highly supports forgiveness

Love is a charisma

Clicks like a magical cinema

Love is a channel of healing

Surrender it without a stealing

Mutual love blooms nicely

One sided love glooms slowly

Love grows inside

Reflected well outside

Love is a lifeline

Many twists and turns, not a straight line

Love rocks wonderfully

When hearts are knocked silently

Love is a celebration

Valentine day or anyday, wants full dedication

Love is being at the top of the world

All the prayers are heard without a word

Let’s admire love daily, not occasionally

Found rarely and reciprocated warmly

कुँआ नहीं, तू बन नदी 

प्रकृति, मानव, व जीव, तू पुष्ट करती संजीवनी

तू परिवार का कुआँ, पोषण करती अनंत, हे जलस्वामिनी

खुद रह प्यासी, सबकी प्यास बुझाती, कभी न रुकता तेरा यह क्रम

खाली होती जाती, नियम से धर्म निभाती, सब कर्म

भर-भर पानी देती जाती, तभी कहलाती जग सुखरासी

तेरी प्यास, तेरी आँखों का पानी, कौन समझेगा तेरी उदासी

तू बन कुँए का मीठा पानी बदले में लेती सबसे पीड़

तू देती तृप्ति, फिर क्यों रह जाते अतृप्त तेरे स्व के नीड़

तू कुँआ बन खड़ी रहती, रोज रोज की खिंचाई तोड़ती तेरा तन-मन

तू चाहे न चाहे, गीले रखने पड़ते तुझे, रिश्तों के उपवन

जब सूख जाएगा कुँआ और पानी का स्रोत हो जायेगा खत्म

संसार हो जाएगा तुझसे वैरागी, खाली कुँए का क्या महत्त्व

छोड़ दे यह रीत, खुद से अब कर प्रीत, बदल दे अपनी पहचान

कुँआ नहीं, अब तुझे बनना है, बहती नदिया का स्वतंत्र गीत

बस कल-कल बहना, प्रसन्न व मदमस्त रहना

अब तू न रुकना, अब तू न ठहरना, बस खुल के बहना

जिसको लेना होगा पानी, तुझे ढूंढ़ने और पाने की झेलनी होगी परेशानी

तू देना, जो हाथ जोड़ माँगेगा तुझसे तेरी कृपा और मेहरबानी

जिसे दिल करे देना वर्ना छलककर, बहकर व रिसकर चुपचाप चल देना

बेरोकटोक, बिंदास व अल्हड़ बन कभी सीमाओं को तोड़कर बहना

कभी तट को छोड़कर, दुनिया भर में जी भर कर फैल और निखरना

तू जल से है या जल तुझसे है, अंदर-बाहर का भेद न खोलना

जल से सब नाते है, जो तुझे खूब निभाने आते है

तू खुद को और राह में मिलते जीव-कण को प्रफुल्लित करती रहना

नदी बनना है कितना रोमांचक, रोचक और रचनात्मक, तू अनुभव करना

तू बहना पर्वत, घाटी, मैदानों में बेख़ौफ़ व बेपरवाह किये

तू शोर मचाना, चिल्लाना, खिलखिलाना व गुनगुनाना जीवन भर

उन्मुक्त भाव से, संपन्न भाव से, हर्षित भाव से सदा गहरी रहना

कुँआ बनना पोषण नहीं, तेरा शोषण है, बन्धन जीवन का प्रश्न है

कुँआ सूख समाप्त हो जाता है, नदी को बह बढ़ना आता है

खुद की पहचान, अहसास और प्यास तुझे खुद ही समझनी-बुझानी है

पोषण की नदिया में पहले अपनी फिर सबकी प्यास बुझानी है

कुँआ थी तेरी पुरानी पहचान, अब नदियाँ से रचनी नयी कहानी है

भारत दिव्य गणतंत्र

स्वत्रन्त्र है

गणतंत्र है

” मेरा भारत महान “

सबसे बड़ा प्रजातंत्र है

भाषा, धर्म, सभ्यता व संस्कृति

बेजोड़ समता का मूलमंत्र है

वीरों, देशप्रेमियों व शहीदों की धरती

माँ भारती सबका गौरव व सदा संपन्न जंत्र है

संतों, गुरुओं व विद्वानों का देश

भारत रहे बुलंद, आशीर्वाद इसका वेदमंत्र है

गुलामी, शत्रुघात व विपत्ति में भीं

हिमालय सरीखा भारत तोड़ता सब षड़यंत्र है

अनेकता में एकता सदा रहा भारत बल

हर तमस, दुर्भाव व दुर्गुणों से लड़, जोड़ता एकमंत्र है

रानी लक्ष्मी, सरोजिनी व इंदिरा नाज़ इसका

अदम्य नारी शक्ति से बना भारत सशक्त लोकतंत्र है

सुभाष, गाँधी, नेहरू अनेक दिग्गज नेताओं का बलिदान  

अनगिनत देशभक्तों के अथक प्रयास से भारत जयमंत्र है

भारत अपनी आन, बान व शान का लहराए सदा परचम

 जन गण मण हर दिल में गूंजता अलौकिक वाद्ययंत्र है

मिट्टी को इसकी चूम

मिटटी को इसकी लगा मस्तक

भारत पर जन्म सौभाग्य कर्म है

तिरंगे पर न्यौछावर दिल व जान, वीरों का प्राणमंत्र है

Memoir : Degree at 47

Dreams never die

Aspirations never deny

Desires never depart

Ambition never sleeps

Hope never drops

Truth never hides

Good thoughts and energy always reply

  Your willpower gives you wings to fly

 Miracles happen to those who try

Time doesn’t stop for anyone but it certainly comes back in different forms and in different phases what we call as opportunities and sometimes as threats. What we need to know and identify about time is the hidden message it carries and renders blessings and surprises beautifully.

I too felt the same when I read in the newspaper one day that I could pursue my dream project of getting a Post Graduate degree as a regular student where age was no bar. At that time, I was a quadragenarian homemaker, so it was good news for me but shocking news for people around me. At the age, when our body and mind retire from education, career, marriage and job decisions, I was going to take a decision to restart my studies which I couldn’t pursue due to my job. A thought long time back perceived but not pursued came as an golden opportunity. I remembered that it was my earnest desire in my young age to get a degree in higher education .

It was impossible not only for me but for anyone of my stature to try something new at this crucial age and that too academic pursuit in this competitive world, alongwith shouldering family responsibilities. I knew my body, mind and soul will not permit me easily to chase my past life goals in the present scenario. It was a big decision with a huge cost of time, energy and money. Can a desire of past be fulfilled with only a positive frame of mind and a brave smile alone ? No, it sounded so weird and difficult. My ambition to pursue further education could lead to many problems of my health, finance and stamina too. But when passion leads, rest things take a back seat in our life. So one major decision of my life made me stand on the threshold point of my entire life.

I took that big decision finally to start my studies once again. I made up my mind  and took it as a challenge that I will try my best and will leave my venture in case I fail. I prepared myself to accept the challenge whether comes success or failure. My family members who believed, being a lady, I had very little potential and they were anxious about my decision of hard journey of sailing in two boats simultaneously for the next two years. How will I bear dual responsibilities of a house maker and a student ?  As one job demanded great physical work and another job demanded rigorous mental work.

My sedentary home life was threatened against this active student life but I didn’t want to loose this opportunity. I knew I might have to quit at any time because of my stamina and mental caliber still I followed my heart truly. Before I fail, I wanted to try my best as I believed, try try again, you will succeed at last. Slow and steady always wins the race, this phrase too motivated me to keep going. I had to keep my heart and soul together for my learning mission till I would reach my goal point.

Everyday was a big challenge for me to recollect myself in one piece to reach at my target place i.e. my college. I had selected Masters degree in English Literature as a regular student at RIE (Regional Institute of English), Sector-32, Chandigarh. A student’s life was ready for me to shape me into the new personality and character and I was thrilled to have this long awaited new experience.

The transformation of a cocoon into the butterfly called metamorphosis that happened in my life was exciting as well as painful procedure too. I was dead and dumb deep inside my body for this new atmosphere and daily activity. Still I fought against all the odds that interrupted my path dreadfully. I had to pretend daily as an active, smart and wise student to prove that I was strong enough for this assignment. But later on, it became my habit and I didn’t have to pretense anymore. Rushing everyday for my classes was like inhaling a refreshing air inside my monotonous life.

I was enjoying the company of young students and became young again in this middle age. But my fellow-beings took sometime to be in comfortable mode with me as I was the only student who was double of their age. I read English literature in details, learnt various skills and participated in many other co-curricular activities during these two years. I rediscovered myself as a person with latent qualities and unexplored talent. I rigidly followed all the norms of my curriculum to become a better student and a good human being.

Life had taught me many lessons through experiences but now in the classroom I studied humanities in details to understand the real concept of human life in the global context and human plight spread universally. It wasn’t easy for me to pull out a student from my wane body  to recreate charisma of youth and student life again. I stretched myself from every core to look like a winning score. I was happy and satisfied that God gave me an opportunity to see the human life more closely and more deeply through literature.

After two years of hard work and training programme, at last I got my degree in Masters in English and was able to achieve my goal of life with flying colors. I did a journey that was impossible for me and beyond my limits but gave me a great message too. That nothing is impossible in this world, until and unless you push yourself from your comfort zone and your limits. You only need to prepare yourself firmly for a gift that you deserve after hard work and determination.

It may sound common to someone to pursue any degree or education at any age but I knew how I went beyond my capacity and potential to achieve this academic present from God.

My journey to the college to get a higher education might have ended that year but certainly my goals haven’t completed yet. Some more journeys are still waiting for me to pursue that path for growth and happiness to rise and shine in future life. I know I have to cross many milestones and see many glories in the coming years. Life goes on, so our desires and ambition go on. Our efforts and endeavors too go on because dreams make us alive and dreams never die.            

After getting a PG degree in English Literature, a new phase came in my life. I started my writing career on 24 January, 2018 and later became a blog writer. I started my blog on 7 April, 2019 and enjoying this journey with my readers blissfully till date. This memoir is a kind and loving remembrance note to my writing journey with my readers, my friends, my well-wishers and last but not the least to say thank you to God for this wonderful and divine gift.

Be my light with delight I request all of you in this writing journey.

With love and regards

नववर्ष अपना सहर्ष

नववर्ष में भर प्राण, प्रण ले सहर्ष

स्व-ऊर्जा को उठा, कर्म कर उत्कर्ष

अथक प्रयास व दृढ़ निश्चय से लक्ष्य साध शीर्ष

हो निडर, चल डगर, जीवन बेमज़ा है बिना संघर्ष

सुख का मोती दुर्लभ, दुःख के समुंद्र में छुपे है असंख्य हर्ष

चलना है सबको अकेले, पर परिवार सदा रखना अपना आदर्श

रख उत्कंठा, आज यदि तेरे सपनें बिखरे है फर्श

हौंसलो की शक्ति से कल अवश्य पहुँचेंगे अर्श

चहुँ ओर ध्वनि के स्वर है बेहद कर्कश

अनूठे प्रयास व मधुर अहसास से भर कंठ तर्कश

राह कभी आसान, कभी मुश्किल, चलना ले परामर्श

आशा, उत्साह व उमंग का छोड़ना न आकर्ष

हार-जीत नहीं, कार्य-निष्ठा से बंध, निष्पक्ष व निष्कर्ष

स्व-निर्णय लेते स्वाभिमानी, खूब सोच विचार-विमर्श

जी उठेगी मानवता पाकर तेरा सुंदर स्पर्श

खुदा ऊपर ही नहीं, हर जीव में भी है, कर दिव्य दर्श

उन्मुक्त कर बंधन

ईश्वर बंधा है मंदिर में

गाय बंधी है खूंटे से

जंगल बंधे है सीमाओं से

वन्यजीव बंधे है पिंजरों में

निर्दोष बंधे है सुधारगृहों में

गरीब बंधा है पेट की आग से

औरत बंधी है घर की चौखट से

कन्याएँ बंधी है सामाजिक नियमों से

विद्यार्थी बंधे है परीक्षाओं से

सब खुशियाँ बंधी है माया से

 सागर बंधे है जल प्रदूषण से

नदियाँ बंधी है बांधो से

सूरज बंधा है गगनचुंबी इमारतों से

हवा बंधी है धूल-धुँए के गुबार से

सांस बंधी है जिंदगी की रफ़्तार से

हाथ बंधे है जीवन नैया की पतवार से

पैर बंधे है रूढ़ियों और संस्कारों से

सब बंधे है बेवजह सिर्फ एक कुंठित विचार से

कि बंधन में सब सुख है, उन्मुक्त जीवन दुःखद है

फिर क्यों एक आदमी ही खुला व बेख़ौफ़ घूम रहा है

बदनीयत व बौखलाया सा है जिसका अंग अंग

सब टूट रहा है, बिखर रहा है, पर बाँध रहा है आदमी सबको निर्मम

बेबुनियाद सोच, बुरा व्यवहार व बेहूदगी भरा है आचरण  

एक आदमी की स्वार्थी सोच के वशीभूत बंधे है सब बेमन

भोली दुनिया, इंसान व जानवर, बंधन से है सब खिन्न

प्रकृति, जीव और स्त्री, ईश्वर के है सच्चे सृजन

एक बेहद खतरनाक प्राणी बचा है वो है आदमी

जो खो बैठा है जीवन का संतुलन

बस वही इस पृथ्वी पर जीता है उन्मुक्त जीवन

ताकि उसका संसार रहे प्रसन्न व संपन्न

निष्फल है उसकी चाहत के आगे क्या भूमि ,क्या भगवन ?

स्वार्थ ने बदल डाले सत्ता के समीकरण

No pains No gains

No heart

No brains

No tears

No voice

Only hands

System drains

No human network

No humanity

No humble gesture

No gender equality

Only hypocrisy

Patriarchy reins

No sanity

No gravity

No charity

No fraternity

Only vanity

Society stagnates

No connection

No conversation

No discussion

No action

Only rumours

Silence at stake

No books

No insight

No looks

No light

Only ignorance

Literacy litters

No sweetness

No gratefulness

No blissfulness

No happiness

Only evilness

Curse circulates

जिंदगी का कश 

जलता है आदमी हर चीज़ से

औरत, भावनायें, परिवार व संसार से

एक हल्के से संवाद की चिंगारी से

भड़क उठता है नासमझ, गाहे बगाहे हर छोटी बड़ी परेशानी से

भीतर का ताप सुखा देता है, उसके सोचने समझने का सोम

सहनशक्ति की परीक्षा में क्षुब्ध हो जाता है उसका रोम रोम

झट से सुलगा लेता है वह एक सिगरेट

 ताप से संताप का हो जाता है बेमेल मिलाप

जिंदगी के बेमानी होने के सबूत उड़ जायेंगे बन धूलकण

भीतर निगलता धुआँ खोलेगा, चंद राज़ जो थे दिल में बंद

यह काला धुँआ सोखता जायेगा उसका

अनचाहे सफेद आवरण ओढ़े रहने का द्वंद

मशीनी जीवन की वेदना से झुलसता मन

रिश्तों के अलाव में सिकंता नाज़ुक तन

तनाव की तीखी तासीर से भरा कसैला जीवन

दिखने में है ठीक, पर आक्रोश से है गहरा गठबंधन

कहने को है खाली उसकी जुबां और दिल

जल गए है दोनों, सिगरेट के संग बना अतरंग संबंध

अनसुलझे विवादों के जालों से भरा है दिमाग

इच्छाओं और महत्तवकांक्षाओ के फैले है अनगिनत बाग

सालों से पड़े विचारों के कूड़े कचरे को धीरे धीरे लगेगी आग

इस गँदगी का धुँआ भीतर और बाहर फैलाएगा गहरा विषाद

चिंता की आहुति से जलते है सिगरेट और आदमी के घाव

 तन मन से निकल रूह तक पहुँचती है, यह सुलगती आग

आदमी, सिगरेट और परेशानियाँ

हर कश में दबी है, अनकही कहानियाँ की अनगिनत चिंगारियाँ

दुनिया को आग लगाने से अच्छा है, फूंक दे वह कुछ सिगरेट

हवा में गुम हो सुकून देती है, उसकी अपनी नादानियाँ

बड़ा मज़ा है, इस बेजान छोटे से सहारे का साथ

थोड़ा सा दिल जला, बचा लेता है बेवक़्त के मारों की लाज

हर चीज़ बर्दाश्त करनी है उसे चुपचाप

आदमी है, आदमी की बनाये रखनी है पहचान

सिगरेट पीना कभी है उसकी मज़बूरी, कभी है उसका शौक

होश रहे बरकरार, अतः निभा देता है यह छोटा सा करार

मर्दानगी की निशानी तो लब पर सुलगती जवानी है

यही तो संपन्न आदमी होने की निशानी है

जिंदगी का नशा जब उतर जाता है

खींचना पड़ता है सिगरेट का नशा बेरहम

खाली होते तन और मन को भरता है यह समागम

फुर्सत के पल दो पल, जन्नत का दिवास्वपन

सिगरेट के कश कम कर देंगे, जीवन के तरकश

फिर भी प्राण में फूंक मार जिन्दा रहने का प्रयत्न

आदमी जलाता है सिगरेट को एक बार

सिगरेट जलाती है आदमी को प्रतिक्षण

पूर्ण ऋणमुक्त बंधन का व्यवहार, आजन्म

जिंदगी के उतार-चढ़ाव झेलते है औरत और आदमी

कोई जलाये आग और कोई बुझाये आग, खिन्न मन

धरती से बंधी औरत की सहन शक्ति है, असीम व अनंत

फर्क औरत और आदमी में बस केवल एक

एक पूर्णतया संबल और एक आंशिक निर्बल

आदमी सुलगाता है और औरत सुलगती है जिंदगी भर

वर्ना चूल्हे, देह और खेत में सिर पर सूरज का ताप काफी है

जो वो भो ढूंढ सके जिंदगी से हताश

एक सुकून भरे कश की तलाश ताउम्र

मैं रोशन दिवाली रोशन

कार्तिक मास त्यौहारों का गज़ब उल्लास

सूर्य की तीक्ष्ण किरणों ने ओढ़ा हल्का रंगीन लिबास

अमावस की रात रचने को है तैयार महारास

चांदनी का उलाहना, न ही उड़ायेगा कोई उल्ल्हास

सृष्टि क्रम कुछ ऐसा बदल  रहा, विलुप्त हुए सब भोग विलास ?

तन, मन व आत्मा है बेकल, बीमारी से ह्रास हुआ विश्वास

काम के बोझ तले दब गयी है,  सांस और आस

उमंग, उत्साह व ऊर्जा से कोसो दूर  है जनमास

अस्त-व्यस्त है जीवन, व्यर्थ लगते है सब प्रयास

आलस की कालिख चढ़ी, चिंता और वहम की फैली घास

कर्म त्याग सब बैठे गए, ले आजीवन वनवास

तो अब उठ बैठ, बदल दे भाग्य-रचित ग्रन्थ और उपन्यास

शक्तिहीन जीवन का जीर्ण-शीर्ण इतिहास

आज कार्तिक अमावस का प्रकाश पर्व पर हे मनुख  

एक नहीं, करना दो दीपक तैयार

एक बनाना तन का, एक बनाना मिट्टी का

इन दो दीपक के प्रकाश से होगा नया आगाज़

नए युग, नए कर्म, नयी सोच की परवाज़

तन के पात्र में कर्म की बाती डालना

गूढ़ ज्ञान का शुद्ध घी खूब भरना

मन के मंदिर में पवित्र भाव से रखना

ईश्वर की लौ से प्रज्ज्वलित करना

यह दीपक प्रतीक होगा तेरी सच्ची आस्था का

जो जग में फैलाएगा मानवता का प्रकाश

एक तन की लौ से हजारों मन रोशन होंगे

प्रकाश पर्व का महत्व लोगों को समझ आएगा

एक दीपक मिट्टी का लेना

धरती की यह है अति पावन सरंचना

भरना इसे तेल से, रुई की सुंदर बाती बनाना

रखना घर के हर कोने और आँगन में आज रात

स्वछता और पवित्रता भरे वातावरण को करना नमस्कार

दियों के प्रकाश में भर देना अटल विश्वास

तेरे अथक प्रयास से दूर होगी गहरी निराशा

अज्ञानता, अन्याय और असत्य का अंधकार मिटेगा

प्रकाश का महापर्व दिवाली का दिखेगा एक अनूठा स्वरुप

प्रेम, आनंद और सौहार्दपूर्ण किरणों से जगमगायेगा भुवन रूप

मन, घर, आँगन व संसार का सुंदर रूप सजाना अपने आस पास

सच्चे अर्थों में दिखेगा तब, दीप्त मानव का प्रदीप्त अहसास

दुर्गा से शक्ति, राम से भक्ति, गुरु-कृपा से मुक्ति

उस दिव्य लौ से प्रज्जवलित है, सम्पूर्ण संसार की अनुरक्ति 

मानव, मिट्टी और संसार की लौ चलती एक समान

प्रकाश पर्व का अर्थ है जगाओ, उठाओ, बढ़ाओ और मनाओ

उस ईश्वर की शक्ति में है निहित हर प्रार्थना और उपलब्धि

इस बार करेंगे रोशन, कुछ बुझे दिल और खाली दीये

प्रकाश का महापर्व है जगमग दिवाली

प्रकाश है जीवन मनभावन हरियाली

प्रकाश सहेजना और प्रकाश बाँटना ही है दिवाली

खुशियों से भरना, चाहे हो खाली मन या पूजा की थाली

आप सबको मुबारक हो दियों का पर्व दिवाली

प्रेम

प्रेम सरल है, विग्रह कठिन है

एक दूजे के बिना हम दोनों क्या

वो परमात्मा भी असफल है

प्रेम का बंधन हमें ले चला था बड़ी दूर

तुझमें बसी थी मैं मुझमें बसा था तू

प्रेम को खूब संभाले चले थे हम

प्रेम तभी सफल है, जब अहम् नहीं, हम है

वर्ना सृष्टि का सारा खेल ख़त्म है

प्रेम सच्चा धर्म, परम कर्तव्य और नेक कर्म है

तू मुझसे या मेरे प्रेम से गुस्सा है ?

गर लड़ना है, तो जी भर के लड़ मुझसे

हर प्रेम कहानी का कमज़ोर पात्र सदा ही औरत है

न भूल, प्रेम के आगे सब निर्बल है

पुराना वाद-विवाद हो या नफरत, सिर्फ प्रेम ही हल है

क्योंकि प्रेम सक्षम है सम्बल है

तू मुझे डराता है धमकाता है

क्या यही सब तुझे आता है ?

प्रेम में लोग ऊँचा उठते है, गिराते नहीं

मेरा प्रेम तेरी समझ से बाहर क्यों है ?

तू है न संत, न भिखारी, फिर मैं क्यों बनी प्रेम-बेचारी

तुझे दुनिया अच्छी लगी, मुझे तेरी दुनिया प्यारी

तू देता रहा हाजरी दुनिया को

मैं तेरा इंतजार करके हारी

तूने प्रेम की बगिया न सींची, न खिली फुलवारी

मैं रही तेरी दुनिया का एक छोर

तेरे जीवन का रुख रहा सदा किसी ओर

नदी के किनारे भी अलग रह कर चलते है एक ओर

दुनियादारी में रहा अव्वल तू

पर प्रेम की बाज़ी तूने क्यों हारी ?

अब आई है तेरी सोचने की बारी

सिकंदर से क्या सबक सीखा है तूने ?

प्रेम भरे दिल या खाली दिल से होंगे विदा

राजा हो या रंक, आती सबकी बारी

कैसी संसार दीवानगी, जो न जाना प्रेम रवानगी

क्या तू है परिवार की मनौती, पर मेरे प्रेम में बना पनौती  ?

प्रेम को कर दरकिनार बेमतलब जिया है तू, न जानी तूने बंदगी

क्या तूने कभी दर्पण देखा है ?  

तेरे चेहरे पर प्रेम का एक भी नामोनिशां नहीं है बाकी

क्यों खाली है तेरी बाँहें, कँहा है तेरा प्रेम-मोती ?

प्रेम से जन्मा तू, प्रेम में पलाबढ़ा तू

प्रेम में खेला तू, प्रेम करने के वचन में बंधा तू

प्रेम के वशीभूत विवाह किया तूने

प्रेम से उत्पन्न की संताने तूने

दुनिया भर में प्रेम फैलाया तूने

फिर तुझे मुझे प्रेम देने में संकोच क्यों ?

तेरे परिवार में मैंने प्रेम के बीज बोये

ख़ुशी की फसल खिली, दिल के खेत हरे-भरे हुए

प्रेम की कड़ी में पीढ़ियों के जुड़े सिलसिले  

प्रेम में डूब कर चलती है सारी दुनिया

प्रेम करना और पाना, प्रभु की शक्ति है

यह संसार उसी प्रेम का दिव्य फल है

क्यों मेरे हिस्से का प्रेम तू

कंही किसी और को दे आया ?

अब बोल रहा है मैं तेरे प्रेम से तर गया हूँ

तूने तो सब कह दिया सहजता से

तू छोड़ मेरी सब गलियां, रह लूँगा तेरे बिन

नहीं चाहिए मुझे तेरा प्रेमशगुन

तेरे प्रेम ने मुझे कभी न भरमाया है 

मैं पूछती हूँ तुझसे क्या कभी तू प्रेम से

मेरे दिल के दरवाज़े तक आया है ?

मैंने अपनी सारी जीवन पूँजी तुझ पर लुटाई

मैंने तेरे बंजर जीवन में प्रेम की फसल उगाई  

तू मुझे ही काटने पर तुला है, तुझे शर्म नहीं आयी

मेरे पवित्र प्रेम को तूने कुपात्रता से गवायाँ

तू क्यों दुनिया के विवादों को

तेरे मेरे प्रेम के बीच लाया ?

बस प्रेम ही लेना-देना था, जीवन-भर का फैसला था

भर देते थे हम एक दूसरे को प्रेम से

जब हो जाता था किसी का भी खाली

पर अब हम दोनों के बीच है सिर्फ गहरी खाई

सिर्फ मेरे प्रेम से न हो सकेगी भरपाई

 तू नहीं तो किसने हमारे प्रेम को नज़र लगायी ?

प्रेम एक से नहीं, दो तरंगों से होता है उत्पन्न  

पुरुष और नारी शक्ति बने ईश्वर की दो इकाई

प्रेम की गरिमा प्रेम से जाती है निभाई

तू खुद है प्रेम का दोषी

पर सजा सिर्फ मेरे नाम क्यों लिखी कसाई ?

एक अकेले फैसले लेते है सिर्फ हरजाई

टूटे बिखरे थे दिल के धागे

मरम्मत कर थोड़े से भी काम चला बढ़ते आगे  

मिलबैठ कर प्रेम से सब सुलझा लेते अभागे

पर तेरी “मौन अनुपस्थति” से टूटे वर्षो के नाते

प्रेम करने का दंड दिया है ऐसा, मैंने होंठो की हँसी भी गँवाई

बुझ गयी है मेरे मन में तेरे प्रेम की बाती, ओ निर्मोही

सौदा नहीं, प्रेम का मसला था

कभी दिल तुझ पे फिसला था

मेरा प्रेम गहरा और सच्चा था

तू तो सदा से ही प्रेम में कच्चा था

तूने दिल से और नज़र से उतारा मुझे, क्या तू बच्चा था ?

तू बदल रहा था, मैं कँहा समझ पाई ?

मेरे प्रेम के साँचे में कँहा ढला तू ?

मैं तो प्रेम से प्रेम के सफर पर चली थी

बीच रास्ते मुझे खुद ही छोड़ गया था तू

जन्मों जन्मों का प्रेम भरा रिश्ता

रचता है वो अनोखा आसमानी फरिश्ता

बड़े भाग बड़े पुण्य प्रताप से है मिलता, नहीं है यह सस्ता  

पकड़ा था हाथ नहीं मिला साथ

सुख-दुःख बाँटूंगा किया था कभी यह भी वादा

जो भी मिला प्रेम, मिला कभी सूखा ,कभी आधा

प्रेम न सही समय ही दे देता

समय तुझे खुद ही प्रेम से भर देता

प्रेम का ढोंग महंगा पड़ता है दिलफ़रेबियों को

भले ही प्रेम सच्चा हो या झूठा

पर मेरे हिस्से तो दोनों ही नहीं आये

दिल का यार तो बन नहीं सका, निभा देता सिर्फ यारी

तू मुझे प्रेम में तोड़ता रहा

मैं तुझे प्रेम से जोड़ती रही

प्रेम में नहीं चलता है यह समीकरण, कहती है खुदाई

तू मुझे अक्ल सिखाता रहा

 स्वार्थ की पढ़ाई, तूने मुझे हर बार याद दिलाई

मुझसे कहता रहा, बंद कर अपनी प्रेम-दुहाई 

प्रेम-ग्रन्थ को पढ़ते पढ़ते बीते तीन दशक

मैं बन गयी विदुषी और तू रहा असंतोषी प्रेम-रिक्त

मेल-बेमेल बंधन को प्रेम जोड़ता है सशक्त

तेरे प्रेम के ईंधन के बिना और बिन कमाई

मैंने कैसे जिंदगी की गाड़ी है चलाई

पर आज तूने उसमें भी है आग लगाई

प्रेम पारस है, तू रहा पत्थर का पत्थर,दुआ भी तुझे न बदल पाई

प्रेम और विवाह, तूने दोनों में मात खाई

आज मैं इस प्रेम ग्रन्थ के अंतिम पृष्ठ पर आई

प्रेम की झोली प्रेम से भरते है

पर मेरी झोली में न सैंया है, न साईं

इस खाली झोली को विदाई देने की योजना, तूने है बनाई

प्रेम दुर्लभ है, सिर्फ धरती पर प्रज्जवलित है

सालों की तपस्या के बाद मिलता शुभ फल है

 एकनिष्ठ प्रेम ही शक्ति का स्थल है

प्रेम से बड़ा न कोई शस्त्र

प्रेम से बड़ा न कोई शास्त्र

प्रेम की प्रकृति है बड़ी विचित्र

प्रेम हर मर्ज़ की दवा है

पर यह भी है सच

कि प्रेम से बड़ा न कोई दर्द है

प्रेम है सच्चा गहना

बड़े चाव से हर कोई चाहे पहनना

प्रेम रखता सबको सुखद जीवन-पर्यन्त

प्रेम ही खुदा है

प्रेम ही है सच्ची इबादत

प्रेम ही व्यापत है सर्वत्र

प्रेम में दिल हारना नियति है, जीत है सच्चा समर्पण

हर चीज को जीतना पड़ता है संसार में

दुनिया का प्यार बड़ा खुदगर्ज़

काश तू मेरे संग दो कदम ही चल लेता

तो मेरे प्रेम के पँख, तुझे भी ले उड़ते आसमान में

और हम बन जाते, जीते-जागते सच्चे प्रेम का प्रसंग

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गाँधी-एक क्रांतिकारी विचार

सत्य को बना शक्ति आधार

न्याय की लगाई जोरदार गुहार

अहिंसा के कठिन पथ को चुना

क्रांतिकारी थे उसके विचार

आज़ादी के संग्राम का जब बजा बिगुल

भारत माता की सुन करुण पुकार

चल दिया अकेले और पैदल

वो नहीं था घोड़े पर सवार

नेतृत्व किया संभाली देश की कमान

उद्देश्य था उसका बहुत महान

धर्म की रखी अनोखी व गहरी नींव

मानवता से बड़ा न कोई धर्म, न संस्कार

ऐसा गज़ब का था, वो वीर योद्धा

अपनी सूझ बुझ से झुका दी, कठोर अंग्रेज सरकार

टुकड़े टुकड़े थी मानवता व शर्मसार

हर भारतवासी को किया एकजोड़ व एकसार

अंग्रेज़ों की थी कुटिल राजनीति

फूट डालो और राज़ करो हर बार

एक देशप्रेमी ने दिया मुहँ तोड़ जवाब

शांति, प्रेम और एकता से जितेंगे जंग, हम जाँबाज

कर्म की लेखनी से लिखी आज़ादी, कर दी देश के नाम

बदल डाली कमजोर भाग्य की रेखा, एकनिष्ठ व एकप्राण

बना बागी, दिल में दबी चिंगारी भड़की

सुलगा दी देशप्रेम में आज़ादी की आग

जलने लगी आज़ादी की विराट मशाल

हमे प्यारा, हमारा स्वाभिमान, हमारा हिंदोस्तान

स्वयं को खोजता हुआ मानवता से दिव्यता तक जा पहुँचा

बन गया एक बहुमुखी व्यक्तित्व बेमिसाल

रचा भारत की आज़ादी का स्वर्णिम इतिहास

सशक्त संवाद व सादगी से जीती जंग बिना हथियार

एक साधारण आदमी ने की असाधारण जीवन-यात्रा

जीत लिया सबका मन और प्रत्येक जंग बिना वार

तन से था संत पर था एक बुद्धिजीवी योद्धा

एक आत्मा के महात्मा बनने का अनूठा सफर सदा यादगार

जादुई करिश्मा थे उसके सारे जीवन प्रसंग व प्रहार

एक लाठी के सामने घुटने टेक दिए बंदूक ने हो बेहाल

देश ने प्रेम से दी “बापू” की उपाधि उन्हें उपहार

राष्ट्रपिता बन बढ़ाया गौरव, मान और प्यार

इससे बड़ी देशभक्ति की न मिलेगी मिसाल

गाँधी तुम सदा रहोगे देश के सच्चे लाल

गाँधी एक प्रेरणा एक सर्वश्रेष्ठ विचार

एक क्रांतिकारी की अनूठी मिसाल

तर्पण से पहले दर्पण

श्राद पक्ष में पितरों को तर्पण

श्रद्धाभाव करते समर्पित मन के दो सुमन

प्रथा प्राचीन वर्तमान पीढ़ी में विस्मरण

वंशों को सेंकता वार्षिक पुण्य-कर्म

जीवन भर परिवारों में रहा विघटन व घर्षण

गज़ब सिमटता एक दिन में परंपरा का आकर्षण

मैले मन की मिट्टी दिखती मुख दर्पण

सहज भाव भरते सब खाली मन और बर्तन

रहे न कोई भूल का एक भी धूलकण

हाथ जोड़ सच्चे दिल से करते नमन

क़र्ज़ की श्रृंखला है

ऋण मुक्ति की बेला है

तेरा कर्म प्रतिफल में लौटेगा अगले जन्म

भूत, वर्तमान, भविष्य, एक पल में सब भावमग्न  

काया बदली छाया में, माया उसकी निर्गुण

दम्भ से बेदम जीवन का कटु सत्य वचन

कँहा भोर की उजली किरण और कँहा डूबता सूरज

भेद अनूठा कभी न भरता क्या प्रकृति क्या मानव मन

प्यार और सुरक्षा का सबसे घना पैतृक वन

उनकी सींची फुलवारी में खिले कुछ फूल दिव्य

पर न जाने कैसे रह गए कुछ ठूँठ और कुछ निर्मम

वंश बेल के सब फल नहीं होते मीठे और निर्मल

कुछ कड़वे ही रहते है चाहे दो जितना मीठा जल

क्या हो पाता है किसी का कठोर हृदय परिवर्तन ?

रिश्तों की घुटन में बुझा रहता था सदा तेरा मन

आज यत्न से मना रहा पूर्वजों के रूठे मन

दूरियाँ दिल से उपजी, रिश्तों को निगल गयी अजगर बन

उसी फासले को कम करने की रस्म आ गयी अमृत बन

भाव बल या कर्तव्य बल, दोनों में तू तो रहा निर्बल

आज नहीं है वो आसपास, बस यादों की बची है खुरचन

कुल वृक्ष से क्या कटा तू, स्वार्थ की बेल पनपी बिना संबल

जमीं पर पैर टिकाने में कट गया सारा जीवन

आज तू सब विधि संपन्न, क्या पद-प्रतिष्ठा, क्या धन

फिर क्यों तेरा जीवन कोष, पितृ-ऋण से हुआ विपन्न

इस भावुक क्षण में, जानता हूँ, तुम दे दोगे माफ़ी

तेरा आशीर्वाद, खुश रहो सदा, सच्ची रही तेरी लगन

पर क्या तर्पण की कुछ बूंदो से मुक्त हो जायेंगे ?

तेरे मेरे प्रेम के जन्म-जन्म के यह बंधन

धूल कर भी धुंधला लगता क्यों तेरे मन का दर्पण

कल, आज और कल, बदलते रिश्तों के समीकरण

मन ही तेरा दर्पण, मन ही दिखाता छवि, इसमें कैसा विलंब

क्या साफ़ दिखेगा, तेरे अर्पण में, तेरे दर्पण का प्रतिबिम्ब ?

150th blog post

A journey I started 2 years back

I could hardly walk on this new track

Fortunately, I came across in my life, a writer’s swag

A social writing platform appeared as “Begin Bizarre Blog”

As I have now completed 150 bold steps

I am feeling great and lots of happiness

Heartfelt thanks who acknowledged and encouraged

As you supported me when these posts were published

My outer world shrinked, my inner world twinkled

When I indulged willingly, my mental solace was blessed

Nothing appealed to me more than my own space to chill

My sedentary life was replaced with creative writing skill

A world of writing was waiting for me at my desk

I was unaware of this whole interesting task

One day, I felt, I had so many feelings unheard

I stopped attending those voices which seemed absurd

I focused on strong vibrations, a big source of my subject

A writing bug entered in my life with soul-stirring project

I struggled how to swim, control and bear threats undercurrent

My real and imaginary worlds needed balance more frequent

Everyone asked me what is the need ?

I became silent and picked up a pen to proceed

Are you crazy ? you will have to think out of the box

Eat, sleep and enjoy life with this idiot box

It’s high time to express myself in black and white touch

If listening is good than writing has much better impact

I jumped into this pool of words, initially I too regret

But slowly and steadily, I learnt how to swim with guts

Writing is an art, a skill, an inborn talent and divine grace

It is not everybody’s cup of tea, only an intelligent could chase

I inhaled this real world literally in my breath

but exhaled it in this imaginary world quite worth

When I started writing, I had only pure heart

I knew its complications as my hands were not expert

No guide, no map, no milestone, a journey of solitude

Believed in myself and God, always kept a positive attitude

Few steps I had taken, miles ahead to discover new insights

My spirit of writing needs readers as a constant headlight

What is the fun of writing without your kind gaze ?

Who send me occasionally sunshine, thunder and rain

हिंद का गौरव हिंदी

हमारी राष्ट्रीय भाषा हिंदी

वरदान में मिली हमें हिंदी  

उत्कर्ष रहे हिंद की हिंदी

साक्षात् सरस्वती कंठ में जैसे आनंदी

मधुर स्वर बन उतरती बैकुंठी

कागज़ पर कितनी सुंदर लगती हिंदी

सभी भाषाओं में सर्वोपरि सरल हिंदी

सीधे हृदय में प्रेम भरती हिंदी

युग बदले, परंपरा बदली

नहीं बदली अपनी सभ्यता, अपनी भाषा हिंदी

हमारी पहचान, हमारी शान, विशुद्ध हिंदी

हमें बोलने, सुनने में कैसी भली लगती

सीमाएँ लाँघ कर विश्व पटल पर चमकती बिंदी

इसके जादू से बचना मुश्किल

जुबान से सीधे दिल में उतरती हिंदी

गज़ब इसका अस्तित्व, गज़ब इसका व्यक्तित्व

निखरी, संवरी और फैल गयी जग में

हर युग की साक्ष्य हमारी ऐतहासिक कालिंदी

कितने झेले प्रहार, कितने अत्याचार

कितनी पाबंदी, कितने निकले प्रतिद्वंदी

पर मिटा न सके, हिला न सके

इतनी मज़बूत है हमारी हिंदी

है इसमें जोश, है इसमें आक्रोश

यह विद्रोही है, यह आरोही है

यह देश प्रगति की है मशाल, आवाज़ में बुलंदी

हर हाथ, हर मुख में है संजोयी

है भाषा एक पर इसके प्रशंसक अनेक

मीठी जुबान, मीठे बोल से जग को लुभाती हिंदी

हिंदी की पताका तिरंगे संग सदा लहलहाई

हर भारतीय के दिल में है समाई

आओ जम कर बोले हिंदी, दिल से इसे सीखे

हिंदी ने हमसे कुछ आस है लगायी

गणपति बप्पा मोरया

भादों की शुक्ल पक्ष चतुर्थी

गणेश उत्सव पर होती मनोकामना पूर्ति

गूँजी धरा पर एकस्वर में महास्तुति

“गणपति बप्पा मोरया” की साक्षात् उपस्थिति

साल भर की प्रतीक्षा से मुक्ति

चल अभी चल मेरे घर हे भूपति

प्रत्येक मानव की हाथ जोड़ विनती

परम शक्ति की फैली चहुँ ओर कीर्ति  

विघ्नहर्ता के रूप में प्रकटे गणपति

संभालो प्रभु हमें देकर कष्ट मुक्ति  

वो फिर से लेगा जन्म इस पृथ्वी

माटी का रूप लेकर मिटायेगा दूषित मनोवृति

उसका वजूद मिलेगा, हर हृदय में

हर पत्थर, हर फ़ूल में, हर रंग में

हर प्रार्थना में, मिट्टी की हर मूर्त में

मोदक के प्रसाद में, मंगलगान में, आशीष में

प्रेम में परमेश्वर आसमान से उतरता है जमीं पर

प्रेम के उन्माद में भक्त चढ़ जाता है जमीं से आसमान में

इस अद्भुत प्रेम का होता है मिलन मन के दरबार में

रचकर मिट्टी की सुंदर काया गजानन

धरती को पवित्र करने का वायदा निभाता मनोरम

आत्मा से जुड़े परमात्मा के तार

तभी तो वो खिंचा चला आता हर बार

शक्ति, प्राण, चेतना में जैसे बहती रसधार

पराक्रम का अनुपम पर्याय है वो निराकार

अदृश्य होकर भी सब ओर दृश्यमान है उसका संसार

धूल से स्वयं की करता स्थूल से सूक्ष्म रचना

आत्मा के ज्ञान व उत्थान के लिए तू जन्मा

देता संदेश हर बार जीवन मृगतृष्णा न उलझ

मैं हूँ तेरा बल खुद को निर्बल न समझ

तूने मुझमें रखी है आस्था व दृढ़ विश्वास

शक्ति है गौरी तो मुक्ति है शंकर, रख अहसास

मैं हूँ गौरीशंकरसुत, चाहे कामना हो या मोक्ष पथ

दोनों रथ पर बैठ, पूर्ण करता, भक्तों को मनोरथ