* सत्य की खोज करना
* सत्य असत्य में भेद करना
* सत्य को धारण करना
यदि आपने सत्य की इन तीन अवस्थाओं को पार कर लिया है तो
आप निश्चिंत तौर पर दुनिया में अपने आने के मकसद को पाने में कामयाब हो गए है
इस विराट सत्ता के स्वामी जो परम सत्य के स्वरुप में रहता है उसे जानना समझना बूझना कोई आसान बात नही है
वह संक्षिप्त से विस्तार तक, सूक्ष्म से स्थूल तक, भीतर से बाहर तक, बिंदु से ब्रह्माण्ड तक
सब ओर अद्वित्य अनमोल अदभुत रूप में विद्यमान है
* अपने को खोजना उसको खोजना है
* अपने को पाना उसको पाना है
* अपने को और अपनों को प्यार करना उसको प्यार करना है
क्या हम इस वृहद् जीव सत्ता के मालिक को देख खोज जान और समझ पाएंगे या नहीं ?
यहीं तो हम सब के जीवन भर के प्रयत्नों, कोशिशों और अनगिनत प्रयास है यही तो हमारी सबसे बड़ी आस है
यही तो हमारे जीवन की सबसे बड़ी प्यास है
यही हमारे जीवन की सार्थकता है यही हममें इंसानियत है और यही हमारे मनुष्य होने की सबसे बड़ी उपलब्धि है
*सब ओर वो दृश्यमान है फिर भी नहीं दिखता
*सब ओर वो बैठा है फिर भी नहीं मिलता
*सब ओर वो सुनता है फिर भी नहीं बोलता
उसे ढूंढना जैसे भूसे के ढेर में सुई ढूंढने के समान है उसे खोजना जैसे आसमां के तारे तोड़ लाना है
उसे समझ पाना वा पकड़ पाना जैसे गहरे समुंद्र में से मोती निकालना होगा
उसे कर्म से, ज्ञान से, भक्ति से, जिस भी माध्यम से महसूस करो आप
उसकी सदैव निर्मल सुंदर व गहन उपस्थिति पाओगे
वो ना केवल एक सुंदर अहसास है बल्कि वो हमारा अक्स और हम उसका अक्स है वो जितना जाना पहचाना है उतना ही अंजाना भी है न आप उस पर अधिकार जमा सकते हो न आप उसे मना सकते हो न उसे बाध्य कर सकते हो
क्योंकि वो एक ऐसा हितेषी है जो सिर्फ और सिर्फ आपका कल्याण सोचता है क्षमा प्रायश्चित दंड मुण्ड देकर भी वो सदैव आपको उसी रास्ते पर ले जाना चाहता है जिसे मोक्ष का मार्ग कहते है
धर्म अर्थ काम मोक्ष जीवन के सरल मार्ग, सुगम पंथ, स्पष्ट लक्ष्य है
मुश्किल तो है पर उसके साथ चले तो सब संभव होते है
कभी कभी लगता है वो मिलकर भी नही मिलता वो चाहकर भी चाहतें नही पूरी नहीं करता वो सम्मुख होकर भी नही सब कुछ नही देता कभी अत्यंत परिचित कभी बिलकुल भी परिचित नहीं लगता है
इस न्यून शरीर से इस न्यून बुद्धि से इस न्यून जीवन यात्रा से उसकी विराट उपस्थिति का कैसे आंकलन कर पाएँगे हमारी क्या बिसात हमारी क्या जुर्रत पर उसकी एक झलक ही काफी है
जीवन रूपी यात्रा के मर्म को समझने के लिए उसका दीदार ही काफी है ध्यान रहे
*वो तेरी प्रीत का भी प्रीत है
*वो तेरे मीत का भी मीत है
*वो तेरे अपनों से भी अपना है
कोई उसे लूटता है तो कोई उसे पूजता है कोई उसकी सेवा करता है तो कोई उसे सिर्फ मेवा समझता है कोई उसे बहुत ज्यादा जानता है तो कोई उसे बिल्कुल भी नही जानता है कोई उसे सब कुछ मानता है कोई उसे जरा सा भी नहीं मानता है कोई उससे अत्यधिक प्रेम करता है तो कोई उससे घृणा करता है कोई उससे लड़ता है तो कोई उसके लिए सबसे लड़ता है कोई उसे समर्पित है तो कोई उसे कलाकृतियों में उकेरता है कोई उस पर जान न्यौछावर करता है तो कोई उसके लिए जान भी ले लेता है कोई उसे रात दिन सारे जहां में ढुंढता है तो कोई सिर्फ उसके भरोसे बैठा रहता है
कोई स्वार्थ भाव में लिप्त होकर भी असंतुष्ट रहता है उसे कहाँ पाता है तो कोई नि:स्वार्थ भाव में सिर्फ और सिर्फ संतुष्ट रहता है उसे सहज ही पा लेता है
*किसी का है उससे 36 का आँकड़ा
*किसी का है उससे 69 का सौंपड़ा
*किसी का है उससे 11 का रौंपड़ा
कोई उसे एक जन्म में पा लेता है तो कोई जन्म-जन्म के फेरे में पड़ जाता है कोई उसे शक्ति का स्वरुप मानता है तो कोई उसे प्राण स्वरूप मानता है तो कोई उसे चेतना स्वरूप मानता है
वो सबको उपलब्ध है पर उसको सब उपलब्ध हो उसे सब विचारें यह जरूरी नही
वो सब के लिए सम दृष्टि रखता है उसके लिए सब एक दृष्टिकोण रखे यह जरूरी नही
वो सबके लिए वचनबद्ध, कर्मबद्ध, प्रतिज्ञाबद्ध है सर्व कल्याण के लिए उपलब्ध है सब जन उसके हित वा कल्याण की बात सोचें जरूरी नही
उसने हमारे लिए स्वर्ग बनाया है हमने नर्क की रचना कर दी
वो संवारता है हम बिगाड़ते है
वो एकता में बसता है हम हिस्सेदारी की बात करते है
देव और मानव यही तो बड़ा फर्क है
स्वर्ग और नर्क सब शरीर के भीतर वा बाहर बसते उजड़ते और दिखते है
ऊपर आसमां में है या नही किसी को पता नही
जो है इस धरती पर है यही शायद कहना चाहता है
जो उसकी रजा में है वो लेता जिंदगी का मजा है
जो उसके विपरीत चलता है वो फिर दुनिया के अनोखे स्वाद चखता है
सत्यम शिवम् सुंदरम उसकी सबसे संक्षिप्त सबसे सशक्त सबसे प्रत्यक्ष उपस्थिति है जिसने सत्य को खोजा उसने उसे ही खोजा जिसने सत्य को माना उसने उसे ही माना जिसने सत्य को धारण किया उसने उसे ही अपने भीतर उतार लिया यही जीवन का तत्व सत्व प्रभुत्व भाव है परम सत्ता का गूढ़ मंत्र है
सिर्फ प्रेम ही उसकी अभिव्यक्ति है है सिर्फ विश्वास ही उसकी दिव्य उपस्थिति है
एक वो ही तो है जो सबका है अपना है निश्चिंत तौर पर हर प्राणी का जीवंत सपना है
संसार का सृजक पालक और संरक्षक है
सत्यनिष्ठ होना ही देवत्व है वा मानत्व है वा परमतत्व है
भले ही दुनिया इधर से उधर हो जाए उस महाशक्ति पर आस्था रखना ही सर्वश्रेष्ठ भाव है
सत्य को जीना सत्य पर चलना सत्य ही बांटना सत्य को धर्म मानना यही जीवन का अंतिम सत्य भी है
सब समाप्त हो जाएगा एक दिन सिर्फ सत्य ही जिएगा अनंत काल तक और रहेगा हमेशा युगों युगों तक
यही तो जीवन का अटल सत्य है