मां की छोड़ी विरासत

मां की छोड़ी विरासत संभालती है सिर्फ उनकी बेटियां
चाहे वो बन जाए किसी के भी घर की बहू बेटियां

नही भूलती सब बेटियां संभालना प्रभू की दी एक बेशकीमती नेमत
मां की बरसों तक संजोई और छोड़ी उनके नाम यह अनमोल विरासत

नही होती इनमें धन-दौलत गहने कपड़े बर्तन और ढेर सारे जेवर
न जमीन-जायदाद न मकान न दुकान न कोठियां न गाड़ियां न नौकर

इनके हिस्से आता है वो प्यार जिसकी पात्र होती है सिर्फ सयानी बेटियां
धर्म-गुण परिवार-संस्कार परंपरा रस्मों रिवाज़ व्यवहार कुशल है बेटियां

सब गांठ बांध लेती है और छुपा देती है कहीं दिल के कोने में यह बेटियां
नही बिगड़ने देती घर का सब्र संतुलन वा सुकून मां का वचन है बेटियां

जरूरत पड़े तो लड़ पड़ती है अपनों से सबसे और समाज से भी बेटियां
मां से ऊंचा वा बराबर कोई नहीं मानती है और निभाती है सब बेटियां

जो देखती आई जीवन भर मां के कर्म-कर्तव्य वा निष्ठा कदम की दूरियां
पालन करती है बखूबी ऐसी ही तो होती है बेटियां और उनकी खूबियां

बेटें संभालते है बड़ी बड़ी बातें बड़े बड़े कागज़ात बड़ी बड़ी पेटियां
उसी घर में दूर दूर तक बिखरे जज्बातों को संभालती है सिर्फ बेटियां

दुआओं में मांगे जाते है सिर्फ बेटे पर दुआएं बन जाती है यह चुप बेटियां
भरोसे वाले तो अक्सर भूलते बिन कहे जो रिश्ते बचाए वो है सिर्फ बेटियां

आ अब लौट चले

आ अब लौट चले
अपनी छोटी सी प्यारी सी दुनिया में
गरीब थे तो क्या हुआ
अपनी भी तो थी एक कच्ची सी कुटिया

आ देख छोड़ दिया था जो तूने नीड़
बनने हिस्सा दुनिया की भीड़
क्यों न फिर से इसका तिनका तिनका जोड़ ले
कर खत्म इंतजार बाहों में एक दूसरे को भर ले

आ टटोले वो पुराने दिन जो गुम हो गए थे लापरवाही से एक दिन
तेरे हाथ का स्वादिष्ट भात जो छीन गया था बेरहमी से अकस्मात
तज दी थी जो तूने दुनिया बरसों पहले शायद उन्माद
माया के मोहपाश के इस बंधन से खुद को आज मुक्त कर ले

आ खत्म करें यह महलों के किस्से
कर दिए जिसने हम दोनों के जिस्मों के हिस्से
आ इस ढलती उम्र को आंखों में फिर से समेट ले
एक दूजे को जी भर के देख ले घड़ी से एक बार निगाहें फेर ले

आ साथ रहने की अनुपम भेंट एक दूसरे को जरूर दे
एक पीड़ा से बचने को दूसरी पीड़ा को न मोल ले
एक नया हाथ पकड़ने में पुराना हाथ क्यों छोड़ दें
बिखरे इन रिश्तों को फिर से पुरानी कड़ी में जोड़ ले

आ फिर से वक्त से हंसी उधार ले भारी पलकों को हल्का कर ले
नदी किनारे बैठ हम दोनों यादों के कुछ पत्थर उसमें ही फेंक दे
दूरियां दिलों की नजदीक आने से चहल कदमी से कम होंगी
सफर आगे और भी कठिन है प्रेम के समझौते पर विश्वास की मोहर दे

आ इन उमड़ती घुमड़ती इच्छाओं को जमीं में यहीं दफन कर दे
एक वृक्ष इंसानियत का आंगन में फिर से खड़ा कर दे
सुख के साथी तो बन न सके हम दुःख के हमसफर ही बन चले
दिल रखना था बड़ा छोटी सोच से हुई नुकसान की भरपाई कर ले

आ सपनों के इंद्रधनुष को तोड़ यथार्थ के कुछ फल झोली में बटोर ले
क्या पाया क्या खोया कुछ याद नहीं दर्पण से ही थोड़ी पूछताछ कर ले
जो भाव बचा है बाकी इस जर्जर शरीर में उसे सीने में दफन कर ले
थे हम आवारा कहां कुछ संवारा बिगड़े इन कदमों को फिर से घर की ओर मोड़ ले

स्वयंभू

घर की बहुरानियां
नही बनना चाहती है
अब नौकरानियां

जीना चाहती है भरपूर
धरती से अंबर तक कुछ भी
नही है अब उनसे दूर

घूंघट का बना के परचम
फैलाना चाहती है दुनिया में
अपनी चमक अपने दम अपने कदम

पहन ज्ञान की कवच वा ढाल
तोड़ना चाहती है पुरुषों का वर्चस्व
शक्ति के मर्म को खूब समझती है और संभाल

अपने सपने महत्वकांक्षाएं और इच्छाएं
ना ही पानी में बहाना चाहती है
ना ही इधर उधर फेंकना चाहती है

ना बंद डिब्बों में
ना अलमारियों में
ना तालों में

ना कपड़ों जेवर में
ना जिम्मेवारियों तले दबे घुटे मरे
ना ही यूंही पड़े रहना चाहती है

बस सहेजना चाहती है
खुद को बना आत्म निर्भर
सब कुछ न्यौछावर किए बिना

नही जीना है उसे
बंद आंखों से
अतः बेमतलब की बेड़ियां तोड़ती है

संसार को उसका हिस्सा दे
अपने भाग्य अपनी बराबरी के लिए
लड़ती है धीरे से फिर पुरजोर से

खुदा की नेमत में से थोड़ा हक
पाने के लिए अग्रसर है
आज ही तो वो अवसर है

दुनिया से कहती है
भ्रमण है जानकारी
क्यों न घूमूं मैं देश विदेश

बरसों बाद मिली स्वतंत्रता को
सांसों में भर दिल में संजो कर
एक लंबी उड़ान लेना चाहती है

पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर को
नापना चाहती है
खींचना जानती है

जिंदगी न मिलेगी दुबारा
इस भाव को मुट्ठी में रखना चाहती है
और आत्मसात् भी करती है भरपूर

पुरानी पीढ़ियों के घाव
जो मिले हैं विरासत में उसे
उन्हें भरना चाहती है

दादी नानी और मां से
बरसों पहले मिले भीगे जज्बातों में
इंसानियत की मरहम लगाना चाहती है

उसकी कोशिशें करूं थोड़ी मेरे मन की भी
सबको बेहतर दूं इंसाफ करूं
प्रथम नही तो दूसरा लक्ष्य रखूं

कुदरत की शुक्रगुजार है
जो दिया उसे मातृत्व वरदान
संभालना चाहती है बिना गरूर बिना सरूर

चाहे किसी को हो मंजूर या नामंजूर
अपने उज्जवल भविष्य को
अपनी आंखो से देखना चाहती है

बस एक परम अभिलाषा है उसकी
स्वयं के लिए स्वयं ही वरदान सिद्ध हूं
क्यों न बनूं मैं स्वयंभू

कविता और कहानी

चलो आज हम दोनों पति-पत्नी
दो बिछड़े दोस्त समान एक दूसरे को मिलने को बेताब हो जाए
एक कविता मैं कहूं और एक कहानी तुम सुनाना
एक खुशनुमा सा माहौल बनाए
बचपन के कुछ लम्हें समेट कर शैतानी कर भाग जाए
भूल जाए हम दोनों बड़े होने का खेद
निर्मल हो जाए जैसे बारिश में घुले सब भेद
मैं दूं गर आवाज तुम साज बन जाना
मैं बनूं किरदार तुम कहानी बन जाना
मैं सोचूं तुम कविता बन जाना
मैं रूठूं तुम प्रेमी बन जाना
याद करे हम दोनों वो बरसों पुराने किस्से
जो खुदा ने लिखे थे बहुत जतन से तेरे मेरे हिस्से
चलो आज वक्त के साथ आगे नही थोड़ा सा पीछे सरक जाए
मन की पगडंडियों पर फिर से उछलते कूदते बहुत आगे निकल जाए
गंभीर है हालात पर मुस्कुराहट की क्यों छोड़े हम आहट
जीवन के इन किरदारों को निभाते निभाते सो गए हमारे जज़्बात
क्यों न फिर से इन्हें जगाए कुछ हंसे कुछ रोकर हल्के मन हो जाएं
जीवनसाथी बनने से पहले पढ़ लेते थे तुम मन की पाती
पर अब मैं रह गई सिर्फ तेरे जीवन की एक अनपढ़ी कविता तेरी मेज़ पर पड़ी बंद पाती
और तू किरदार एक पुरानी घिसी पिटी कहानी का
इन किताबों से ही तो निकले थे हम दोनों के किरदार
सोचा था बनेंगे सदाबहार कविता और कहानी
इन खुले पन्नों में रखे उस सूखे सुर्ख गुलाब संग क्यों न चहक जाए
शायद यही है जिंदगी और वास्तविकता आ गले लग जाए
वक्त ने हमें खूब चुराया है मुझे कविता तुझे कहानी बनाया है
क्यों न हम वक्त से एक लम्हा सिर्फ अपने लिए चुराए
नया कुछ नही है कहने को तो कोई बात नही
अभाव यदि गहरा है दोनों के बीच
नव कल्पना से कुछ नया रचने को क्यों न दोनों आतुर हो जाए

मैं स्याही लेखनी वरदान

यूं तो मैं चुपचाप मेहनत करता रहा सालों साल
पर जब मैं लिखने बैठा तो यारों की दुआओं ने कर दिया कमाल
मेहनत तो थी बस अपने पास दुआओं का हो रहा था बेसब्री से इंतज़ार
फिर तो ऐसा लिखने बैठा न उठ सका न लेट सका टिका तो ऐसे जैसे घड़ियों के तार
न कुछ बोल सका न कुछ कह सका बस कलम में हो गया गिरफ्तार
जब तक खत्म न हुई स्याही और सुलगते जज़्बात बनी न कोई बात
जिंदगी जीने की वो मेरी अधूरी प्यास कागज़ पर उतरती चली गई
लोगों ने की मुझसे भरपूर बेवफाई बस एक कलम थी जो मुझसे वफा करती चली गई
मन की तो न कर सका जिंदगी भर तन यूंही तड़पता रहा जिया कम मरता रहा हर कदम
मैं जलता रहा मैं बुझता रहा हर हाल में जीना है तुझे बस सुनता रहा
संघर्ष में जब शरीर ने छोड़ दिया मेरा साथ तब लेखनी ने शुरू किया बाकी का संवाद
इस कलम को पकड़ने में मैं तो स्याह से हो गई सफेद
पर मेरा नाम सफेद से हो गया स्याह यूं कहे तो जैसे कर दिया कोई संगीन गुनाह
सुनता है सबकी ऊपरवाला उसने मेरी भी सुनी जुबां जो बरसों से चुप थी अचानक से बोल पड़ी
अपने अपने हिस्से का संघर्ष करना पड़ता है सबको
यूंही कोई झोली में नही डालता दिल की मुराद मांगना पड़ता है हक बेहद यकीन के साथ
लेखनी के है दिल से शुक्रगुजार सिर उठा कर जीना सीखा दिया
मरने को कहती थी यह दुनिया इस कलम ने दुनिया को मुठ्ठी में रखना सीखा दिया
मुझे मेरा अस्तित्व लौटा दिया जिंदगी की दौड़ में पीछे रह गए थे पुनः पहली पंक्ति में ला खड़ा कर दिया

पिता परमेश्वर

silhouette of father and son at sunset

जैसे मां तो मां होती है
वैसे ही पिता तो पिता होता है
मां बहुत कुछ कहती है
पर पिता कुछ नही कहता है
बस सब सहता है
सब जज्ब कर लेता है
कुछ नही मांगता है
सब हजम कर लेता है
सुख में नही उछलता है
दुःख में नही पिघलता है
बस एक मौन में छिपा
उसका व्यक्तित्व होता है
परिवार को सब भरपूर देता है
खुद को बस कम कर लेता है
कुछ घटे तो जमा कर देता है
कुछ बड़े तो घटा कर देता है
पीढ़ियों के कर्ज तले अक्सर
गहरा दबा मिलता है
पुरानी पीढ़ी का कर्तव्य पहले कंधे पर
नई पीढ़ी की जिम्मेवारी दुसरे कंधे पर रख
कुछ झुक कर ही चलता है
मां की चलती है घर में पिता की नही
तो बाहर अपनी चला लेता है
किसी बहस में नही पड़ता है
सिर्फ रास्ता निकालता है
सबको दिल में रखता है
बच्चों के आगे बहुत कमजोर पड़ जाता है
पर संसार में कठोर हो निकलता है
बोलने में बहुत झिझकता है
काम में खुद को बहुत झोंकता है
सबके बुने सपनें पूरे करने के लिए
सूरज सा बड़ा हो कर शाम को ढलता है
सबको अपनी छत्र छाया में
रखने को वचनबद्ध होता है
घर मां के सहारे होता है
तो वो घर से बाहर नेमप्लेट पर चमकता है
उसकी भारी कीमत भी देता है
सबको बांट कर संतुष्ट रहता है
संसार के सारे सुख मां के पल्लू से बंधे होते है
पर पिता मां के उस पल्लू को संभालने में
उम्र भर लगा रहता है
मां स्नेह की अविरल धारा होती है
पिता अनुभव का समंदर होता है
मां के लिए पिता बनना असंभव होता है
पर पिता मां के गुजर जाने के बाद
अपने गरिमामय पद को छोड़ मां के सरल पद को संभालने की नाकाम कोशिश करता है
प्रयास में भले ही प्रयास हार जाए
पर पिता हर संभव अथक कोशिश करता है
तभी तो पिता धरती पर
परमेश्वर का दिव्य पद ग्रहण करता है

केक और कविता

केक बनाती मां
केक को वहीं छोड़ कर
कविता लिखने को बैठ गई
जुबां की प्यास को अधूरा छोड़ भाव रस में बह गई
तन को तृप्ति देता केक बनाना छोड़ कर
मन को आनंदित करती कविता लिखने को बैठ गई

केक उसका घर-परिवार आस-पास की दुनिया का लाजवाब स्वाद
कविता थी अंदरूनी भाव विलुप्त जिंदगी गहन विचारों का कड़वा स्वाद
केक बनाने में इतना खो जाती भूलती अपना जीवन पर्यन्त संघर्ष
कविता उसे याद दिलाती मन की यात्रा का भाव है श्रेष्ठ वा उत्कर्ष
केक को सजाती अपनें सपनों अपनी ख्वाहिशों अपने जज्बातों से
कविता में पिरोती सुख दुःख टूटन घुटन दर्द मजबूरियां के मार्मिक भाव

केक उसकी कशमकश मां की अनोखी पेशकश मां थी मेहनतकश
कविता थी एक कोशिश गर लिख लेती तो भरता सूने मन का तरकश
केक देता उसे थकावट रुकावट जरूरी पर थोड़ी सी बनावट
कविता देती उसे सांस सुकून सांत्वना राहत और मरहम के दो घूंट
केक उसकी प्यारी सी मृगतृष्णा जिसे पकड़ने में लगती ढेर सी ऊष्मा
कविता सुलझाती मन की अनगिनत गांठे बिना प्रयत्न सीख ना जीना

केक कल्पना का साक्षात रूप मीठा खाना है उचित जब सब लगे खुश्क
कविता में उसका रुका रूदन खोया सृजन अनदेखा मां का बिछड़ा स्वप्न
केक कटता तो जी भर अपनों में बंटता और चुटकी में समाप्त हो जाता
कविता रचती मां जुड़ती कड़ी से कड़ी दो घड़ी का खुद से सुखद मिलन

केक की उपस्थिति क्षण भर जैसे अंधकार को चीरती भोर का आगमन
कविता स्वत: दर्ज हो जाती सदा के लिए इतिहास में बन स्वर्णिम अक्षर
केक नर्म लचीला और स्वादिष्ट झलकता मां का उल्लहास वा अल्हड़पन
कविता सरस सुंदर और सर्वगुण संपन्न मां के मन का अनोखा दर्पण

केक और कविता मां के दो रचनात्मक पहलू एक नित्य एक साहित्य
केक उसका मधुरता का जीवन कविता ने दी उसे जीवन की मधुरता
केक ने बनाया कर्कश से कोमल कविता ने दी भूली पहचान बना संबल
जब जब केक पड़ गया भारी मन पर तो न बन सकी कविता
अब कविता पड़ी है भारी केक पर तो कुछ मन की लिख संभल कर

केक उसका कौशल उसकी रसीली इच्छा अधूरे व्यक्तित्व को करता पूर्ण
कविता जीवन की ऊर्जा प्रवाह छाया मुस्कान उसका आत्मिक पोषण
केक एक लगाव एक आसक्ति एक नियुक्ति एक युक्ति
कविता एक भाव एक विरक्ति एक अभिव्यक्ति एक जागृति
संतुलन न पहले मां के एक जीवन में था न अब हो सकेगा
मां के मन की जब जब चलेगी तो तन क्या कर लेगा ?

आधा अधूरा सफर कुछ मेरा

हर सफर जिंदगी का कहां किया पूरा आधा-अधूरा छोड़ आए दोस्तों

बमुश्किल जिंदगी मिली थी इससे पहले गले लगाते बिछड़ गए दोस्तों

जो गली मिली जो नुक्कड़ मिला जो रास्ता दिखा जो बन पड़ा

उसी पर कभी बैठ कभी चल कभी दौड़ कभी भाग आए दोस्तों

ना मंजिल मिली न हमसफर मिला न काफिला मिला न मिली मुराद

जिंदगी बेतहाशा पकड़ना चाहते थे पर मौत लगी हाथ नामुराद दोस्तों

कभी खुद को तो कभी खुदा को पकड़ने की जुर्रत वा जुनून

लगे रहे जीवन भर न देखा वक्त न देखे हालात न देखा सुकून दोस्तों

न खुद से मुलाकात कर सके और न ही खुदा से बात कर सके

जिंदगी लापरवाही से अचानक ही किसी मोड़ पर छोड़ आए दोस्तों

दोस्त मेरे दुश्मन निकले दुश्मन मेरे दोस्त बन गए बाजी पलट गए सब

मित्र मेरे गुरू बने गुरू बने मेरे मित्र जिंदगी अदल बदल कर गए दोस्तों

परिचित मेरे अपरिचित निकले अपरिचित मेरे परिचित भाग्य के है मेल

ज्ञान के पीछे दौड़ा मैं तो कुछ हो भला अज्ञानियों से मात खा गए दोस्तों

थक हार कर जब घर के कोने में बैठ गए तभी एक घंटी बजी उठो उठो

अगला सफर है हरि के दर्शन जो अब सच में पूरा करने जा रहे है दोस्तों

जीवन के अंत में

जीवन के अंत में
सब संक्षिप्त सा हो जाता है
सब सारगर्भित भी हो जाता है
सब प्रेममय हो जाता है
सब एकनिष्ठ हो जाता है
सब क्षमाशील हो जाता है
सब संपूर्ण हो जाता है

जीवन के अंत में
सुख दुःख सब एक समान आंखों से बह जाता है
शरीर ह्रदय और आत्मा सब एक भाव हो जाते है
मन और बुद्धि सब निर्मल से हो जाते है
पुण्य और पाप का भेद खुल जाता है
जीवन का अंधकार प्रकाशमय हो जाता है
ईश्वर अब स्पष्ट रूप में नजर आता है

जीवन के अंत में
सब सुलझ जाता है
सब निखर जाता है
सब संतुलन हो जाता है
सब स्वत: छुट जाता है
मन की अनगिनत गांठे खुल जाती है
मन पसीज जाता है दया भाव आ जाता है
कहने सुनने को कुछ भी नहीं रह जाता है
कोई दोस्त दुश्मन नही रह जाता है

जीवन के अंत में
सब स्वाद एक सा हो जाता है
सब कड़वाहट फीकी हो जाती है
सब जीवन रस लुप्त हो जाता है
सब गुण अवगुण अब ठीक सा लगता है
सब अहंकार मिट्टी सा हो जाता है
सब कुछ संतुष्टि भाव से भर जाता है

जीवन के अंत में
सिर्फ एक क्षण जरूर आता है
जब पछतावा भी बहुत होता है
और अफसोस भी बहुत होता है
निर्णय न लेने या देरी से लेने का अपराधबोध भी होता है
अच्छे बुरे के अंतर में चूकने की ग्लानि भी होती है
पर अगले क्षण सिर झुका कर समर्पण करने से सब मानो
सम समान समतल सरल सा मन हो जाता है

जीवन के अंत में
एक दृश्य मानस पटल पर बखूबी अंकित होता है
सच में मैं अर्जुन सारथी मेरे श्री कृष्ण यह विचार सा आता है
जीवन मेरा कुरुक्षेत्र का मैदान
मैं कैसे लंडू स्थिति रही सदा असमंजस
युद्ध अपनों के खिलाफ अन्याय के विरुद्ध
सत्य को साथ रखना है तो बस तू निर्भय हो लड़
तू केवल अपना कर्म कर फल की चिंता मुझ पर छोड़
कृष्ण वचन तू मेरे पुण्य को संभाल मैं तेरे पाप को संभाल
इस महायुद्ध में सब हार के भी जीत का अनुभव सा होता है
क्योंकि जिसका सारथी स्वयं हरि कृष्ण होता है
वो तो मरकर भी अमर होता है
मेरे ख्याल से दोस्तों शायद जीवन के अंत में ऐसा ही होता है

अमृत कुंभ विष पान

विवाह
जिसमें है विविध प्रकार के स्वाद
वाह और आह
इस पृथ्वी पर रचा
सबसे बड़ा स्वांग
सबसे बड़ी मांग
सबसे बड़ा स्वर्ग
सबसे बड़ा नर्क
सबसे बड़ा सम्मान
सबसे बड़ा अपमान
सबसे बड़ी प्रथा
सबसे बड़ी व्यथा
सबसे बड़ा रिश्ता
सबसे बड़ा अजनबी
सबसे बड़ा दान
सबसे बड़ा पात्र
सबसे बड़ा सत्य
सबसे बड़ी मृगतृष्णा
सबसे बड़ा ज्ञान
सबसे बड़ी मूर्खता
सबसे बड़ा संगीत
सबसे बेसुरा राग
सबसे बड़ा सुख
सबसे बड़ा दुःख
सबसे बड़ा सौदा
सबसे बड़ा बाजार
सबसे बड़ा उपहार
सबसे बड़ी कीमत
सबसे बड़ी सुविधा
सबसे बड़ी दुविधा
सबसे बड़ी नेमत
सबसे बड़ी मेहनत
सबसे बड़ी जीत
सबसे बड़ी हार
सबसे बड़ा उपकार
सबसे बड़ा धोखा
सबसे बड़ा वरदान
सबसे बड़ा अभिशाप
सबसे प्राचीन संस्कार
सबसे बासी विचार
सबसे बड़ा प्यार
सबसे बड़ा व्यभिचार
सबसे बड़ी निशानी
सबसे बड़ा दाग
सबसे बड़ा धन
सबसे बड़ा निर्धन
सबसे बड़ी स्वतंत्रता
सबसे बड़ा बंधन
सबसे बड़ी संगत
सबसे खराब रंगत
सबसे बड़ा मिष्ठान
सबसे बड़ा अनुष्ठान
सबसे बड़ा कदम
सबसे खराब मंजिल
सबसे बड़ा समझौता
सबसे बड़ा हस्ताक्षर
सबसे बड़ा लगाव
सबसे बड़ा अलगाव
सबसे बड़ा गम्भीर मुद्दा
सबसे बड़ा मजाक
सबसे बड़ा दोस्त
सबसे बड़ा दुश्मन
सबसे बड़ी खरी बात
सबसे बड़ी खोटी नीयत
सबसे बड़ा संवाद
सबसे बड़ा मौन
सबसे बड़ा अपनापन
सबसे बड़ा बेगानापन
सबसे बड़ा ढाबा
सबसे बड़ा शोर शराबा
चुनते है सब किस्मत
पर मिलता है बंद ताला
कोई किसी को नहीं बताता
हाथ लगी चाभी या सिर्फ टंगा ताला
सब कुछ होकर भी
कुछ भी नहीं
कहने को सब अपना है
पर हाथ में कुछ भी नहीं
एक दिव्य तार जो जोड़ता तीनों शक्तियों को
ईश्वर तनमन और वक्त को बेतार बेहिसाब
सागर के मंथन से निकला अमृत कुंभ
विष पान भी तो है इसका एक भाग
करे सब सेवन थोड़ा थोड़ा
संयम ने नियम कानून कहां है तोड़ा

मैं हूं एक जलधारा

मै हूं एक नन्ही सी जलधारा
पावन निर्मल और बहती जो अविरल
इस संसार में जब से मैं आई
चलती गई बस चलती गई
कहां रोक पाई खुद को
बस बहती गई बस बहती गई
बहुत चाहा कहीं तो रुकूं
कहीं तो ठहरूं कहीं तो पांव जमाऊं
पर रूकना न था मेरी फितरत
बंधना न था मेरी किस्मत
अतः मैं बहती गई और आगे बढ़ती गई
सबसे यह कहती गई रोकना न मुझको
मैं किसी की मुठ्ठी में न समाऊँगी
बहना बहुत अच्छा लगता है मुझको
हो सकता है तेरे दिल से भी निकल जाऊंगी
फिक्र न कर ऐ मानव फर्ज अपना बखूबी निभाऊंगी
बहते बहते भी तेरा कल्याण कर जाऊंगी
पर वापिस कभी न आ पाऊंगी
छूने है मुझको इस लंबी यात्रा में
गांव नगर शहर बस्ती और घर
घाटी पहाड़ी पर्वत सब तक
पहुंचना है मुझे मेरे मुक्ति तट तक
किसी प्यासे की प्यास बुझाऊंगी
किसी सूखी फसल को हरा भरा कर जाऊंगी
किसी के पुण्य कर्म में भागीदारी निभाऊंगी
किसी के ह्रदय को गीला कर जाऊंगी
कोई चाहेगा साथ मेरा तो पल भर साथी भी बन जाऊंगी
न मैं जानती हूं मेरा स्त्रोत न मैं जानती हूं मेरा मोक्ष
इस अनंत यात्रा में यदि अभिशप्त हो विलुप्त हो भी गई तो
तो पुनः धरती से मिलने को व्याकुल हो जाऊंगी
नया जन्म ले दुबारा आऊंगी
बहता है इस संसार में तिनका तिनका
मन भी और कभी कभी तन भी
भावनाएं कल्पनाएं मनोकामनाएं
जिज्ञासाएं समस्याएं सब निरंतर बहती रहती है
जीवन तो है ही जी भर बहने का नाम है
उभरने का नाम उबरने का नाम
चाहे भाव हो तरंग हो या हो उमंग
जब तक मानव बहता है तभी तो सुखी रहता है
कहीं रूके तो मन कीचड़ हो जाता है
नही रखता भीतर मैल शुद्ध मन बस बहता रहता है
वो तर जाता है जो हर भाव दिल में गंगा जल सा रखता है
अस्तित्व तो सबका मिट जाना है एक दिन
फर्क बस इतना है कोई बनता है निर्मल जल कोई बने खारा सागर
मैं चलती हूं है बहना मुझको पल पल पर याद रखना
मैं हूं मानव हित शाश्वत जल तुझको खुद में डुबो कर
अपना बना कर ही जाऊंगी आज नही तो कल

मेरा मुझमें क्यों कुछ भी न रहा ⁉️

एक प्रश्न से मेरा मन रोज है जूझ रहा

मेरा मुझमें क्यों कुछ भी न रहा

मेरा तन भी मेरा न रहा मेरा मन भी मेरा न रहा

मेरे मैं के हर पहलू को तूने इतना भींचा इतना खींचा

जैसे तू मेरे शरीर का मालिक और मैं सेवक भर सी रह गई

तेरा अक्स तेरा घर तेरे हालात तेरे जज़्बात

तेरे अपनों का परछावा तक मुझे निगल गया

तेरा अच्छा बुरा वक्त सब चीज़ें मुझ पर ऐसे हावी क्यों हो गए

मेरा मुझमें क्यों कुछ भी न रहा

तू मुझ पर गिरता पड़ता लड़ता भिड़ता गुर्राता रहा

मेरा मुझमें अंश भर भी मेरा न रहा सब दब गया या मर गया

मेरी आंखों से मेरा सब कीमती बरसात के पानी सा बह गया

मुझ में बस अब केवल तू अकेला धूमकेतु सा घूमता रह गया

मेरा मुझमें मेरा कहने को कुछ भी शेष न रहा

मैं मेरे साथ जो जो लेकर चली थी

वो आता क्यों न अब मुझे नजर भला

मेरा आत्म-विश्वास प्रेम श्वास जीवन की आस तूने मुझसे यूंही ले लिया

मेरा मुझमें क्यों कुछ भी न रहा

मैं सरल सा भाव लेकर तुझे ही समर्पण करने घर से चली थी

सब भरपूर भर भर के तुझे देने ही तो निकली थी

जो प्रेम से सहज हो सकता था उसे तू क्यों जबरन लेने पर तुला

अब तो सब कुटिल सा लगता है जिंदगी का मेला

मैं रोज काम में कोल्हू सी घिसती रही

आटे में घुन सा मेरा ह्रदय भी पिसता रहा

तेरे दिए ज्यादातर दर्द सहती रही

तेरे इंतजार में मोम सी भी पिंघलती रही

मैं तो तुझमें समाना चाहती था पर तू मुझे जल्दी में बिखेर गया

मेरा मुझमें क्यों कुछ भी न रहा

तू मुझे आग्रह नही आगोश में लेने की हर कोशिश करता रहा

मैं मैं न रही तू तू न रहा मैं तो तेरे सांचे में खुद ब खुद ढलती गई

पर तू अपनी कहता रहा मैं तेरी सुनती रही और सुन्न सी होती रही

तू अपनी चला कर मुझे घुमा फिरा कर मुझे मुझसे जुदा कर चला

मैं निर्भय थी आनंदित थी उत्साही थी सृजक वा कल्पनाशील भी थी

अब मैं डरपोक हूं उदास हूं निराश भी हूं यथार्थ के धरातल पर खड़ी हूं

मैं सोने से पीतल तक हो गई अब मैं अमृत से विष कुंड में बदल गई

मैं इंद्रधनुष के सात रंग चाहती थी अब वैराग का काला रंग है मेरे हाथ

मेरा मुझमें क्यों कुछ भी न रहा

मैं एकमय हो कर शिवशक्ति की संपूर्णता का अनुभव करना चाहती थी

मैं तेरे जीवन कोष को प्रेम से भरती इससे पहले तू मुझे खाली कर गया

मैं दिल से दिल जोड़ना चाहती थी तू मुझे ही दो टुकड़ों में तोड़ गया

इस आम सी जिंदगी में खास पलों को सहेजना था मेरा एक सपना

मैं भरती अपना स्त्रीत्व तुम भरते अपना पुरुषत्व कुछ ऐसा सोचती थी

सब होते है लकीर के फकीर मैं तुम संग कुछ अनोखा करना चाहती थी

दुनिया में मची है हाय तौबा कौन जाने किसने किसको है जी भर लूटा

मैं ढूंढती खुद में मैं को पर वो मैं तो बैठा तुझ में मुझे ही को चिढ़ा रहा है

मेरा मुझमें क्यों कुछ भी न रहा

ईश्वर का प्रवेश

गर खाली न हो तन और मन

ईश्वर कभी न करता प्रवेश

बात है यह छोटी सी पर है बहुत विशेष

भरे में वो क्या उतरेगा

भरे को कौन भरेगा

वो चाहता है केवल उसे ही भरना

जो रह गया है जीवन में तेरे शेष

तन भी मैला मन भी मैला

कर्मों की मैल उतारने आया था संसार में

और मैल चढ़ाने बैठ गया

क्या नहीं जानता क्या नहीं मानता

केवल स्वछता में होता है उसका प्रवेश

तन भरा कामनाओं की पूर्ति से

मन भरा पांच विकारो से

पात्र ही नहीं तो क्या भरेगा वो

खाली आया था खाली ही जायेगा

जीवन का मूल मंत्र भूला बैठा है तू

राह देखता वो बाट जोहता वो

कभी तो शरीर को सुपात्र बनाएगा

देने का है बस उसका सुंदर प्रकरण

इस हल्की यात्रा को भारी कर चला तू

संग्रह कर रहा है उसका जो न काम आयेंगे

शुभ कर्म और भक्ति ही साथ जायेंगे

संसार में बहता जाता है

स्व के हाथ पैर चलाना सीख

लेने से ज्यादा देने का है बड़ा सुख

इतनी सी बात क्यों न समझ पाता है तू

यह नफरत भेदभाव द्वंद्व पाखंड काम न आयेंगे

सरल बुद्धि सरल मन सरल कर्म

संसार रूपी भव सागर से पार लगाएंगे

कहते है जब जागो तभी सवेरा

एक वो ही जगाता

जब चाहता है जीवन में तेरे सवेरा

जो जान गया उसकी मंशा

फिर दिखता है उसका चमत्कार

तेरे जीवन में साक्षात् ईश्वर का प्रवेश

अविरल बसंत

बसंत है न अनोखी अनूठी एक अदभुत वेला

मन जो खोया खोया सा था और था बिल्कुल अकेला

श्वास में भरकर एक लंबी साँस लेना चाहता है अंतर्मन

धूमिल विश्वास प्रकृति के मधु का रसीला अनुपम स्वाद

सूरज के ताप से शक्ति के अनुराग से

प्रेम के दिव्य भाव से संगीत के आलाप से

मीठी मुस्कान से हँसी मज़ाक के ताव से

रंगो के बिखराव से तरंगों के बहाव से

मौसम की करवट से मदमस्त बयार से

नदियों की कलकल से शांति की पद्चाप से

पंछियों के कलराव से जीवों के स्पंदन से

आसमां के खुले बेबाक अंदाज से रूमानी रूह के जगाव से

जागृत हो उठता है प्रकृति का कोना कोना

तन ऊर्जावान मन प्रफुल्लित स्राव सलोना सलोना

शीत से अतीत में जो जमे थे दबे थे अनजान सुप्त भाव

बसंत में पिंघलने बिखरने लगे है अब भरेंगे गहरे वो घाव

मैं होता जीर्ण शीर्ण प्रति पल प्रति क्षण दृढ़ता में महीन

बसंत नजर आती यौवन से भरपूर प्रति रोम प्रति कण रंगीन

उम्र का ठहराव न मांगें कुछ न खास बदलाव

बस चाहती एक शुभ नज़र टिका रहे मन का सकल भाव

बचपन युवा जवानी अधेड़ वृद्ध अवस्था की कहानी

बसंत भी अलग मायने भी अलग अटपटा चटपटा ढंग बेढंग बेमानी

सदाबहार बसंत मन का है ज्वार देह बनता जाता भाटा विपरीत विचरते विचार

चढ़ती पतंग और उमड़ती उमंग दोनों सदैव कामनाओं की डोर पर रहते अनंत सवार

राम आएंगे आएंगे राम आएंगे

करोना ने हरे थे प्राण विषमय हो गया था सारा संसार
कलयुग में मानो समाप्त हो गया था प्रभू नाम वा संचार
विष पीने वाले शिव ने लीला कर दिखाया था मानव विष का प्रहार
बिना ईश्वर प्रेम वा आस्था के कुटिल है जटिल है चोटिल है संसार
महामारी से तभी उबरा जग जब लिया सबने एक साथ एक सांस प्रभू नाम हो विस्तार
2020 से 2024 तक श्री हरि ने पहले डुबोया जग फिर तारा करने अधर्म असत्य अज्ञानता का संहार
बिना जगतजननी बिना श्री राम बिना श्री कृष्ण शून्य है त्रिलोक का सार
बिना जगत के पालनहार श्री हरि विष्णु नारायण कृपा घोर है अंधकार
कठिन परीक्षा के बाद अब प्रकटेंगे पुनः त्रिशक्ति नारायण भूवासी कहेंगे आभार
बाल रूप रामलल्ला होंगे अवतरित अयोध्या मंदिर में स्वतः ले रूप साकार
दिव्य स्वरूप में दिव्य कृपा संग दिव्य नव ऊर्जा संचार
जय श्री राम जय श्री कृष्ण जयकारों से गूंजेगा विश्व का कोना कोना घर द्वार
रामलल्ला लौटे है पुनः अयोध्या पुनः करने संसार का कल्याण वा उद्धार
नर बिना नारायण कैसे खोले सुख शांति समृद्धि के द्वार
प्रभु अवतरण बधाई मिलजुल बांटे राम कृपा यही सीख बड़ाई वा प्यार
राममय अब है सारा संसार भक्ति की शक्ति से ईश्वर भी आज होंगे निहाल वा निसार

बदलाव

युग बदलता है

वक्त बदलता है

कुदरत बदलती है

किस्मत बदलती है

औरत बदलती है

शरीर बदलता है

पीढ़ियां बदलती है

बस आदत से मजबूर

एक आदमी नहीं बदलता है

सोच-विचार बदलते है

हालात बदलते है

रिवाज़ बदलते है

जिंदगी जीने के तौर-तरीके बदलते है

रास्ते बदलते है

इम्तिहान बदलते है

बस फितरत से मजबूर

एक आदमी नही बदलता है

इंसान बदलते है

दीन धर्म ईमान बदलते है

जुबां बदलती है

चरित्र बदलते है

किरदार बदलते है

कहानियां बदलती है

हाथों की लकीरें बदलती है

बस पाषाण हृदय से मजबूर

एक आदमी नही बदलता है

बदलाव है जीवन का अभिन्न अंग और है बहुत जरुरी

वक्त से कदम-ताल को देनी पड़ती है मंजूरी

फिर तेरी क्या है मजबूरी

क्यों वंचित है तू

एक सुखद अहसास से

एक खुशियों के सैलाब से

एक दिव्यता के आशीर्वाद से

एक प्रयास से एक अहसास से बहुत कुछ बदलता है

दुनिया में देखो चहुं ओर घोर परिर्वतन होता है

वक्त भी तारीख घड़ी दिन-रात में बदलता है

भूमि गगन वायु अग्नि नीर सब हर पल परिवर्तित होते है

रंग तरंग से बनी हर चीज बदलती है

जब परिर्वतन बदलाव रूपांतर बेहतर अग्रसर होना

प्रकृति का है कड़ा नियम रहता है सदा कायम

तो फिर एक आदमी क्यों नही बदलता है  ?

 जीवन का मर्म/सार/संदर्भ

* सत्य की खोज करना

* सत्य असत्य में भेद करना

* सत्य को धारण करना

यदि आपने सत्य की इन तीन अवस्थाओं को पार कर लिया है तो

आप निश्चिंत तौर पर दुनिया में अपने आने के मकसद को पाने में कामयाब हो गए है

इस विराट सत्ता के स्वामी जो परम सत्य के स्वरुप में रहता है उसे जानना समझना बूझना कोई आसान बात नही है

वह संक्षिप्त से विस्तार तक, सूक्ष्म से स्थूल तक, भीतर से बाहर तक, बिंदु से ब्रह्माण्ड तक

सब ओर अद्वित्य अनमोल अदभुत रूप में विद्यमान है

* अपने को खोजना उसको खोजना है

* अपने को पाना उसको पाना है

* अपने को और अपनों को प्यार करना उसको प्यार करना है

क्या हम इस वृहद् जीव सत्ता के मालिक को देख खोज जान और समझ पाएंगे या नहीं ?

यहीं तो हम सब के जीवन भर के प्रयत्नों, कोशिशों और अनगिनत प्रयास है यही तो हमारी सबसे बड़ी आस है

यही तो हमारे जीवन की सबसे बड़ी प्यास है

यही हमारे जीवन की सार्थकता है यही हममें इंसानियत है और यही हमारे मनुष्य होने की सबसे बड़ी उपलब्धि है

*सब ओर वो दृश्यमान है फिर भी नहीं दिखता

*सब ओर वो बैठा है फिर भी नहीं मिलता

*सब ओर वो सुनता है फिर भी नहीं बोलता

उसे ढूंढना जैसे भूसे के ढेर में सुई ढूंढने के समान है उसे खोजना जैसे आसमां के तारे तोड़ लाना है

उसे समझ पाना वा पकड़ पाना जैसे गहरे समुंद्र में से मोती निकालना होगा

उसे कर्म से, ज्ञान से, भक्ति से, जिस भी माध्यम से महसूस करो आप

उसकी सदैव निर्मल सुंदर व गहन उपस्थिति पाओगे

वो ना केवल एक सुंदर अहसास है बल्कि वो हमारा अक्स और हम उसका अक्स है वो जितना जाना पहचाना है उतना ही अंजाना भी है न आप उस पर अधिकार जमा सकते हो न आप उसे मना सकते हो न उसे बाध्य कर सकते हो

क्योंकि वो एक ऐसा हितेषी है जो सिर्फ और सिर्फ आपका कल्याण सोचता है क्षमा प्रायश्चित दंड मुण्ड देकर भी वो सदैव आपको उसी रास्ते पर ले जाना चाहता है जिसे मोक्ष का मार्ग कहते है

धर्म अर्थ काम मोक्ष जीवन के सरल मार्ग, सुगम पंथ, स्पष्ट लक्ष्य है

मुश्किल तो है पर उसके साथ चले तो सब संभव होते है

कभी कभी लगता है वो मिलकर भी नही मिलता वो चाहकर भी चाहतें नही पूरी नहीं करता वो सम्मुख होकर भी नही सब कुछ नही देता कभी अत्यंत परिचित कभी बिलकुल भी परिचित नहीं लगता है

इस न्यून शरीर से इस न्यून बुद्धि से इस न्यून जीवन यात्रा से उसकी विराट उपस्थिति का कैसे आंकलन कर पाएँगे हमारी क्या बिसात हमारी क्या जुर्रत पर उसकी एक झलक ही काफी है

जीवन रूपी यात्रा के मर्म को समझने के लिए उसका दीदार ही काफी है ध्यान रहे

*वो तेरी प्रीत का भी प्रीत है

*वो तेरे मीत का भी मीत है

*वो तेरे अपनों से भी अपना है

कोई उसे लूटता है तो कोई उसे पूजता है कोई उसकी सेवा करता है तो कोई उसे सिर्फ मेवा समझता है कोई उसे बहुत ज्यादा जानता है तो कोई उसे बिल्कुल भी नही जानता है कोई उसे सब कुछ मानता है कोई उसे जरा सा भी नहीं मानता है कोई उससे अत्यधिक प्रेम करता है तो कोई उससे घृणा करता है कोई उससे लड़ता है तो कोई उसके लिए सबसे लड़ता है कोई उसे समर्पित है तो कोई उसे कलाकृतियों में उकेरता है कोई उस पर जान न्यौछावर करता है तो कोई उसके लिए जान भी ले लेता है कोई उसे रात दिन सारे जहां में ढुंढता है तो कोई सिर्फ उसके भरोसे बैठा रहता है

कोई स्वार्थ भाव में लिप्त होकर भी असंतुष्ट रहता है उसे कहाँ पाता है तो कोई नि:स्वार्थ भाव में सिर्फ और सिर्फ संतुष्ट रहता है उसे सहज ही पा लेता है

*किसी का है उससे 36 का आँकड़ा

*किसी का है उससे 69 का सौंपड़ा

*किसी का है उससे 11 का रौंपड़ा

कोई उसे एक जन्म में पा लेता है तो कोई जन्म-जन्म के फेरे में पड़ जाता है कोई उसे शक्ति का स्वरुप मानता है तो कोई उसे प्राण स्वरूप मानता है तो कोई उसे चेतना स्वरूप मानता है

वो सबको उपलब्ध है पर उसको सब उपलब्ध हो उसे सब विचारें यह जरूरी नही

वो सब के लिए सम दृष्टि रखता है उसके लिए सब एक दृष्टिकोण रखे यह जरूरी नही

वो सबके लिए वचनबद्ध, कर्मबद्ध, प्रतिज्ञाबद्ध है सर्व कल्याण के लिए उपलब्ध है सब जन उसके हित वा कल्याण की बात सोचें जरूरी नही

उसने हमारे लिए स्वर्ग बनाया है हमने नर्क की रचना कर दी

वो संवारता है हम बिगाड़ते है

वो एकता में बसता है हम हिस्सेदारी की बात करते है

देव और मानव यही तो बड़ा फर्क है

स्वर्ग और नर्क सब शरीर के भीतर वा बाहर बसते उजड़ते और दिखते है

ऊपर आसमां में है या नही किसी को पता नही

जो है इस धरती पर है यही शायद कहना चाहता है

जो उसकी रजा में है वो लेता जिंदगी का मजा है

जो उसके विपरीत चलता है वो फिर दुनिया के अनोखे स्वाद चखता है

सत्यम शिवम् सुंदरम उसकी सबसे संक्षिप्त सबसे सशक्त सबसे प्रत्यक्ष उपस्थिति है जिसने सत्य को खोजा उसने उसे ही खोजा जिसने सत्य को माना उसने उसे ही माना जिसने सत्य को धारण किया उसने उसे ही अपने भीतर उतार लिया यही जीवन का तत्व सत्व प्रभुत्व भाव है परम सत्ता का गूढ़ मंत्र है

सिर्फ प्रेम ही उसकी अभिव्यक्ति है है सिर्फ विश्वास ही उसकी दिव्य उपस्थिति है

एक वो ही तो है जो सबका है अपना है निश्चिंत तौर पर हर प्राणी का जीवंत सपना है

संसार का सृजक पालक और संरक्षक है

सत्यनिष्ठ होना ही देवत्व है वा मानत्व है वा परमतत्व है

भले ही दुनिया इधर से उधर हो जाए उस महाशक्ति पर आस्था रखना ही सर्वश्रेष्ठ भाव है

सत्य को जीना सत्य पर चलना सत्य ही बांटना सत्य को धर्म मानना यही जीवन का अंतिम सत्य भी है

सब समाप्त हो जाएगा एक दिन सिर्फ सत्य ही जिएगा अनंत काल तक और रहेगा हमेशा युगों युगों तक

यही तो जीवन का अटल सत्य है

रिश्तें बनाम जिंदगी

जिंदगी जब कठिन थी तब रिश्ते थे सरल
जिंदगी अब सरल है और रिश्ते हो गये है कठिन
जिंदगी जब फुरसत में थी रिश्तें थे बड़े अनमोल
जिंदगी अब व्यस्त है रिश्तें तरसे सुंनने प्यार के दो बोल
जिंदगी जब थी लापरवाह तब रिश्तों की थी परवाह
जिंदगी में जब करने लगे अपनी परवाह रिश्तें हो गए सब जलप्रवाह
जिंदगी में जब तक था इंतज़ार रिश्तें थे बेइंतहा
जिंदगी में अब नहीं किसी का इंतज़ार रिश्तें भी खत्म मैं भी तन्हा
जिंदगी में जब उफान था रिश्तो का तूफ़ान था मुझे बड़ा गुमान था
जिंदगी अब ठहर सी गयी है रिश्तो में भी मान कम अब अहम् सा था
जिंदगी की तेज़ रफ़्तार और भागते वक़्त के तार
जिंदगी की अनगिनत परेशानियाँ और बढ़ती उम्र के तकाज़े
जिंदगी को मिलने के लिए कुछ तो ले फुरसत कुछ तो ले सांसे
जिंदगी को जिंदगी देने के लिए आओ कुछ करे मुलाकातें कुछ करे बातें
जिंदगी में बचे रहे जज़्बात तो बने कुछ बात
वर्ना जिंदगी जीव ही रह जाएगी जीवंत बनाते रिश्तें मेज़बानी प्रेमालाप

गुरुबाणी

गुरू पर्व दी लख लख बधाई

🙏🤲🪔🪔🪔🎉🎉🎉🌟💫🥰🙏

“गुरुबाणी”

रब से रोशन सारा जहां जिधरे मैं देखूं रब दा रूप सोहना चानन वडा प्यारा

रब रग रग विच रब खुशियों दे विच रब जगमग विच रब मेरा सबतो न्यारा

रब देखा रब पाया रब चाहा रब खूब रूबाया रूह प्राण दा सरमाया

रब रौनक रब रौशनी रब रिश्तों दी खान रब रौबिला फिर भी नरमाया

रब खैर रब सुख रब चैन रब रोटी रब अमृत रब फ़ूलों दा बसेरा

रब दा फेरा दिलों दा डेरा रब रखी अपने कोल तदे ही मिले सवेरा

रब आँखों में बहता पानी रब दिवाली रब खुशहाली

रब बिन माँगे देवे रब हर जवाब जो माँगे सवाली

रब बिना कुछ न सूझे रब बिना कुछ न बुझे

रब बिना न कोई ठौर ठिकाने खेल खिलौने समूचे

रब नू सब मंजूर चाहे हाथ जोड़ न जोड़ मेरे सब बच्चे

रब कहंदा बस एक गल जरुरी सुच्ची रखी रूह ता कूचे

रब गीत रब संगीत रब जन्म जन्म दा बिछड़ा मीत

रब सिमरन रब पुरन रब राखा रब दिखदा मिल्दा भोली प्रीत

रब बिना मैं केवल पत्थर रब ढूंढया ता मिला गहरे भीतर

रब सागर मैं डूबदी गागर रब पकड़े हाथ मेरा ता मैं तैरा मजे नाल भव सागर

रब सोने वरगा चमचम रब छांवा रब मांवा

रब आगे फिर क्यों न रोज शीश नवावां

रब रब कर दी शुभ कर्मन कर मैं जी जावां

रब नू कदी न भूलूँ जे भूलूँ ता मैं मर जावां

रब रब मिल्या बड़े भाव ते बड़े चाव ते मन विच खिलायां 

रब रब मैं वारी जावां ता फिर क्यों न शुक्र मनावां