
नभ में नाचता नीर
भिगोता हीर धरा शरीर
अतृप्त-अंश सब जीव-दंश
पीर पैगम्बर नयन अधीर
रिक्त विरक्त विकृत मन
प्रकृति सहेजती निस्तेज काया-ऋण
भरसक भरती जल भूले भावों में
निर्मम को जैसे निर्मल स्पर्श
भर-भर छलकता प्रेम-कलश
सुंदर सरस व सदृश्य तृण
अभाव जड़ें है बड़ी जटिल
अमृतरस संचार बड़ा मृदुल
सावन के स्वर
बूँदो में प्रखर
जलधार गिरी
नयनों में बिखर-बिखर
पुण्य का पुनः पृथ्वी पर
निष्पाप मिलन
सुप्त शुष्क शेष सब
जीवंत भाव सुफल प्रफुल्ल
श्वास में भर सुखद सावन संगीत
सुना अनसुना गीत तू यौवन
ठंडी बयार में तैरता मधुर संदेश
नव कंवल हरित पाती विशेष
कुशलक्षेम का अद्भुत स्पंदन
हृदयस्पर्शी आलिंगन मन जल मगन
द्रवित है आँखे देख
जल-थल का नाट्य मंचन
हरियाली है फैली
फूल-फूल कर सतरंग
छोड़ा न कोई
धरा का कोना कण-कण
धुंआधार बरसात मत झंझोर
तिनके सा कोमल मेरा मन
मन की बंद चौखट पर लगातार
बज रहा टप-टप का शोर
दिल डूब गया है
जल का देख तीव्र अतिक्रमण
धाराप्रवाह जल में घुली यादों की गाद
मानो खो गया नाविक किश्ती संग
प्रश्नों का उमड़ता घुमड़ता सैलाब नहीं
उतर में बहती शांत नाव है जिंदगी
जिजीविषा से खाली जीवन-प्रसंग
प्रकृति भरती है लबालब रोचक ढंग


















