सशक्त सावन

नभ में नाचता नीर

भिगोता हीर धरा शरीर

अतृप्त-अंश सब जीव-दंश

पीर पैगम्बर नयन अधीर  

रिक्त विरक्त विकृत मन  

प्रकृति सहेजती निस्तेज काया-ऋण

भरसक भरती जल भूले भावों में

निर्मम को जैसे निर्मल स्पर्श

 भर-भर छलकता प्रेम-कलश

 सुंदर सरस व सदृश्य तृण

अभाव जड़ें है बड़ी जटिल

अमृतरस संचार बड़ा मृदुल

सावन के स्वर

बूँदो में प्रखर

जलधार गिरी

नयनों में बिखर-बिखर

पुण्य का पुनः पृथ्वी पर

निष्पाप मिलन

सुप्त शुष्क शेष सब

जीवंत भाव सुफल प्रफुल्ल

श्वास में भर सुखद सावन संगीत

सुना अनसुना गीत तू यौवन

ठंडी बयार में तैरता मधुर संदेश

नव कंवल हरित पाती विशेष

कुशलक्षेम का अद्भुत स्पंदन

हृदयस्पर्शी आलिंगन मन जल मगन

द्रवित है आँखे देख

जल-थल का नाट्य मंचन

हरियाली है फैली

फूल-फूल कर सतरंग

छोड़ा न कोई

धरा का कोना कण-कण

धुंआधार बरसात मत झंझोर

तिनके सा कोमल मेरा मन

मन की बंद चौखट पर लगातार

बज रहा टप-टप का शोर

दिल डूब गया है

जल का देख तीव्र अतिक्रमण

धाराप्रवाह जल में घुली यादों की गाद

मानो खो गया नाविक किश्ती संग

प्रश्नों का उमड़ता घुमड़ता सैलाब नहीं 

उतर में बहती शांत नाव है जिंदगी

जिजीविषा से खाली जीवन-प्रसंग

प्रकृति भरती है लबालब रोचक ढंग

भैया राखी आई

सावन ने लगाई खुशियों की झड़ी

प्रीत की रीत निभाने को आई अद्भुत घड़ी 

अटूट प्यार में बँधे है भाई-बहन

पावन त्यौहार मनाये रक्षा-बंधन  

सजी बहना क्या कहना

भैया ने भी स्नेह का ताज पहना

हाथ में ले चांदी की थाली

हँसते चेहरों में गुलाबी लाली

ये प्रेम की डोर

विश्वास का टीका

सम्मान की ज्योति

मिष्ठान की आभा 

मैं बाँधूँगी राखी कलाई

तुम दोगे नेग की मोहर भाई

आरती में भैया की लूँगी बलाईं

रखना लाज करना रखवाली कृष्ण कन्हाई

प्रेम की डोर में हर वर्ष

भरोसे की गाँठ लगाना है जरुरी

रक्षा-बंधन मनाते खुशकिस्मत

आसक्ति में है शक्ति रह सहमत

भाव विभोर स्मरण

स्मृति है शेष

भाव है ज्यादा

शब्द है कम

श्रद्वा से आँख है नम

यूँ तो जीवन के पृष्ठ

रोज़ पढ़ आगे बढ़ जाते है हम

पर वक़्त के झोंके से

जब यह पीछे पलट जाते है

तब स्मृतिकोष से

विशिष्ट व्यक्तियों के साथ बिताये

संस्मरण स्वतः ही खुल जाते है

कुछ चुनिंदा पंक्तियाँ

कुछ खास प्रसंग

कुछ हृदयस्पर्शी बातें

कुछ मार्मिक भाव

कुछ उन्मुक्त हास्य रंग

जो उमड़े थे जब बैठे थे संग

वक़्त और किताब के पृष्ठ

दोनों कुछ देर ठहर जाते है

एकसार और गहरे होते जाते है

श्रेष्ठ संगत की अनुपम बसंत

न भूले हम और न तुम

पर दिल पर दे जाते है

हलकी सी दस्तक

रिश्तों और जज़्बात का आपस में

जब टकराता है समंदर

होती है यादों की अजीब सी सिहरन

जब साथ थे तो निश्चिन्त थे

पर अब दिल में अंकित है

उनके वो स्वर्णिम हस्ताक्षर

हमारी जीवन की किताब पर

जो आज भी है ताज़ा और खुशनुमा

स्मृति के पुराने पन्नों पर

वो रोज दिखते है

मानो कल की बात हो

आज भी छलकती है आँखे

ख़ुशी और गर्व का मिश्रण

जब आता है उन का जिक्र

एक पृष्ठ में नहीं सिमटा उसका व्यक्तित्व

वो शख्श बना मशहूर किताब

जीवन का लाजवाब उदाहरण

मुबारक हो जन्मदिन

साल का सबसे सुंदर दिन

तुम्हारा प्यारा जन्मदिन

सब दिन रहते तुम जमीं पर

पर इस दिन उड़ते नभ में पूरा दिन

ईश्वर का उपहार है स्वयं में यह जीवन

पर अपनों से ढेरों उपहार पाते इस दिन

तुम हाथ जोड़ते प्रभु को धन्यवाद स्वरुप

 आशीर्वाद का गुलदस्ता तुम्हे मिलता इस शुभ दिन

जीवन में बढ़ना आगे करना खूब यत्न

खुश रहना और रखना दिव्य वचन से गूँजता वातावरण

हर दिन तुम देते प्यार और प्रसन्नता

इस दिन बिखरे तुम्हारे लिए वरदान के इंद्रधनुष जो चाहे चुन

मिलता जीवन पुण्य से है और खिलता है अपनों से

लेने-देने की इस प्रक्रिया में भाव है सबसे सुंदर प्रेम-बंधन

जीवन स्वयं में अर्थ है बाकी सब व्यर्थ है

भरपूर जीवन जीना यही भावार्थ यही पुरुषार्थ है हर दिन

कामना सबकी शुभमय और खुशमय हो सम्पूर्ण जीवन

असीम खुशियों से महका रहे आपका मन और दिन

योग प्रयोग निरोग

योग साधना

ईश्वर आराधना

आरोग्य निमंत्रणा  

ऊर्जा-चक्र नियंत्रणा

संस्कृति प्रार्थना

गुरु वन्दना

तन कसना

मन प्रसन्ना

आत्म पोषणा

अद्भुत प्रेरणा   

एकाकार भावना  

शक्तियाँ जागना  

आलौकिक कल्पना

सत्य धारणा

मानव गूढ़ सरंचना

सूक्ष्म-ज्ञान भेदना

प्रकृति संवेदना

सृष्टि विचरना

व्यक्तित्व निखरना

भूल कर न भूलना

स्वाध्याय सम्पूर्णा

पितृ दिवस की शुभकामनायें

माँ के आँचल से जब तर आया

तब पिता ने सम्पूर्ण संसार दिखाया

माँ ने सींचा दूध से

तो पिता ने भी अपना खून-पसीना बहाया

माँ ने दिया उज्जवल जीवन

पिता ने जीवन जीना सिखलाया

एक ज्ञान का अंग एक अनुभव का संग पाया

माँ रात की शीतलता समान

पिता सूर्य सा तेज़ और बलवान   

जब तक रहे दोनों साथ

भगवान् को कँहा बच्चों ने ध्याया

माँ खूब दुलारती पिता खूब डाँटते

दुनिया थी बस अपनी सतरंग

संसार रहा सदा दूर और पराया

नरम-गरम इस प्रेम में

सदा खुद को सुरक्षित पाया

जब हुए बड़े और संसार ने सताया

माँ ने धीरज बंधाया पर पिता ने लड़ना सिखाया

घर का दिल माँ बनी पिता घर का सरमाया  

जिस घर में पिता का सख्त पहरा

काल भी चल दिया सिर झुकाया

गगन सा पिता का प्यार गहरा और विशाल

माँ धरती सी पावन पोषक और उदार

दोनों के प्रेम का जिस घर में साया

सुख शांति समृद्धि हाथ जोड़े खड़ी माया

ईश्वर ने भी वही डेरा जमाया

माँ ने दिया भर-भर आर्शीवाद

तो पिता ने आशीर्वाद सँभालने का गुर सिखाया

परम पिता अपना एक दिव्य स्वरुप

इस धरती पर न्यौछावर कर आया

क्या खोया क्या पाया

हम पैसे कमाना झटपट सीख गए

हम सादगी से जीवन जीना भूल गए

हम पढ़ना-लिखना सीख गए

हम गुण-संस्कार भूल गए

हम अपनों से लड़ाई में जीत गए

हम जीवन संघर्ष में हार गए

हम हाथ उठाना सीख गए

हम हाथ बटाना भूल गए

हम स्वार्थ के बीज बोना सीख गए

हम निःस्वार्थ की फसल काटना भूल गए

हम अकेले रोना सीख गए

हम दूसरों के आँसू पोंछना भूल गए

हम घर में समृद्धि लाना सीख गए

हम दिल से गरीबी दूर करना भूल गए

हम कठिन विषयों पर बहस करना सीख गए

हम बेमानी जिंदगी के सरल सबक भूल गए

हम गिरगिट की तरह रंग बदलना सीख गए

हम इंसानियत के लाल खून की नस्ल है भूल गए

हम व्यापार में रिश्ते गढ़ना सीख गए

हम भगवान के गढ़े रिश्तों को भूल गए

हम बेहतर से और बेहतर होना सीख गए

हम आसमान छूने की लगन में जमीनी हकीकत से दूर हो गए

हम समय की रफ़्तार पकड़ना सीख गए

हम समय और सोच को एकसार करना भूल गए

हम मौन का फायदा उठाना सीख गए

हम असत्य अज्ञानता और अधर्म के खिलाफ आवाज़ उठाना भूल गए

हम स्वाभिमान से रहना जल्द ही सीख गए

हम दूसरों की इज़्ज़त करना भूल गए

हम उपलब्धियों के भगवान बनना सीख गए

हम हमें रचने वाले भगवान को कैसे भूल गए

वसुंधरा सुंदरा

माँ की गोद में समाहित मैं

धरती माँ की गोद में समाहित माँ गंगा 

मातृत्व का है उजियारा अंग जो है प्यारी वसुंधरा

माँ का प्यार और आशीर्वाद की अविरल जलधारा

बिना आँचल और पोषण के दिखेगी न भू और न काया

माँ में समाया जग सारा ईश्वर ने रची गूढ़ माया

सूरज और चंदा धरती की दो अलौकिक शक्तियाँ

धरती माँ की आँख खुलते ही भागती तामसिक शक्तियाँ

अस्तित्व मेरा माँ की ठंडी छाँव का साया

संपदा मेरी माँ के सशक्त दो हाथ का सरमाया

पेड़-पौंधों पक्षियों फूलों से महकती ऊँची पहाड़ियाँ

मेरे आँगन शुभता की बेल फलती-फूलती मेरी क्यारियाँ

माँ साथ है तो मिले तपती धूप से सुरक्षा और अपनापन

बचाने को उसके पास है हरी-भरी बेजोड़ चुनरिया का सरंक्षण

बहता है निश्छल भाव प्रत्येक जैसे करती कोलाहल नदियाँ

धुलता है तन-मन सुस्त और सुप्त जीवन की कुरीतियाँ

स्वर्ग ईश्वर व सृजन का स्वर कितना मधुर और प्रखर

धरा धारा और धाई संजोते जीवन-सत्व न जाए बिखर

माटी से निर्मित है प्रत्येक कण क्षणभंगुर पर निर्मल

वसुधा के दिव्य गुणों से संचलित व फलित है कण-कण

ऋणी हूँ माँ तेरी भव्यता का अमृततुल्य तेरे रूप

 दर्द से जुड़े जड़ से सींचे रिश्तो का सच्चा प्रारूप

लौटा न सकूंगा जो दिया है तुमने शीतल जल

कर न सकूंगा तेरी बराबरी न समर्थ मुझमें न बल

जब तक है साँस कहता हूँ आशा और विश्वास

तुम्हें स्वच्छ पावन और उत्कृष्ट रखने का भरपूर प्रयास

सिद्धि वृद्धि समृद्धि मानव-शृंखला के तीन प्रमुख स्तम्भ

धरणी करती प्रदान बिना मोल बिना दम्भ बिना विलम्भ

जागृत हो बुद्धि चुने वसुंधरा की सेवा और समर्पण

बने कृतज्ञ जितना ले उतना तो दे नतमस्तक रहे धरा के स्वर्ण

औरत की हद

अपने घर के लिए

एक अनपढ़ औरत का पढ़ा-लिखा बनना

या एक पढ़ी-लिखी औरत का अनपढ़ बनना 

सिर्फ एक समझदार औरत को यह गुण आता है

निम्नवर्गीय हो तो घर को उच्चवर्गीय बनाना

उच्चवर्गीय घर को निम्नवर्गीय जीवन का महत्त्व बताना आता है

सिर्फ एक गुणी औरत को यह संतुलन सिखाना आता है

अपने भरे-पूरे परिवार में खुद अभाव में रहकर

गर घर में अभाव हो तो भरे-पूरे होने का अहसास दिलाना आता है

सिर्फ एक औरत को कटु यथार्थ को रूमानी बनाना आता है

उसे उसके अपने देवी मानकर पूजेंगे या केवल उसकी देह सेकेंगे

देवी से देह या देह से देवी का सफर उसे रोज निभाना आता है

भारी बात को हल्का और हल्की बात में वजन डालना बखूबी आता है

पग-पग जीवन की अग्निपरीक्षा या सीता समान जव्लंत अग्निपरीक्षा

उसे बार-बार या एक बार अवश्य देकर ही स्वर्ग लोक जाना होता है

इस भूलोक को औरत की शक्ति का परिचय हर बार कराना आता है

फूल संग मिलेंगे काँटे या काँटो संग मिलेंगे फूल, अजब है भाग्य-भेद

कर्म-पथ लिखा हो चाहे काँटो का, अदम्य साहस से बिना आदम-हाथ

 कठिन से कठिन डगर पर भी उसे हँस कर चलना आता है

तुम सब चलो, आगे बढ़ो, मैं आती हूँ, सबको आगे रख

घर की सुख-शांति के लिए चुपचाप घर बैठना आता है

अपने जीवन को टुकड़ों में बाँट घर का भाग्य जगाना आता है

हद तो तब हो गयी जब काल से उलझ गयी, खबरदार

तू लेने आया है जिसे, उससे पहले तूने मेरा नंबर लगाना है

अबला औरत का सबल रूप देख काल ने भी निर्णय बदल डाला है

औरत की हद और औरत की जिद, न संसार समझा है, न जाना है

औरत को बना कर खुद खुदा ने, उसके मान-सम्मान में

उसकी झोली में खुद को डाल, उसके प्रेम और समर्पण को जाना है

हजूर मजदूर

वो मालिक एक

उसके बंदे अनेक

वो जन्म-दाता, वो पालता

उसकी शक्तियाँ अनेक

उसकी विराट सत्ता

उसके बगैर कंही न हिलता पत्ता

अनगिनत उसकी आँखे

असंख्य उसके हाथ और कँधे

 खुदा का हाथ ढेर सारा आशीर्वाद

 खुद का हाथ करे सदा धन्यवाद

लेने-देने का प्रकरण है उजियारा

सँभालते दो सशक्त हाथ जगभार सारा

घूमाते दुनिया का अद्भुत फेरा

 ये दुनिया सिर्फ मेहनतकशों का बसेरा

ममता में है समता वो कहता

जड़ता में है नश्वरता पूर्ण सत्यता

तेरे लिए प्यारों, ये दुनिया बसाई

रखना इसका ख्याल और साफ़-सफाई

तन-मन और धन का वो रखवाला

बस चाहे सबका साथ प्रेम-भाव निराला

सच्ची सेवा और सेवक की पहने फूलमाला

शक्ति का वो भरपूर रसाला

मालिक-मज़दूर मैं नहीं मानता

पालक-बालक से क्या बड़ी महानता

श्रेष्ठ कर्म से ही मनुष्य बनता

मेरी दृष्टि एक फिर क्यों इतनी असमानता

एक शक्ति में बंधे हम-तुम सुख है भरपूर

बिना भेदभाव उसकी नजर जैसे चश्मे-बद्दूर

तुम्हे दूँगा बीज, पानी और धरती

तुम मेहनत से सींचना मेरी प्रकृति

काम मेरा अन्नदाता, नाम होगा तेरा भ्राता

पसीने से खिलेगी फसल, निखरेगी धरती-माता

पेट भरोगे मेरे बन्दों का हर पल

मैं शुक्रगुजार तेरी तपस्या का देख शुभ फल

 परमात्मा के हुनर से है जीवन और तृप्ति

रूप धर अनेकों लुभाता उसकी मौन प्रवृति

भले ही मैं रचनाकार और तुम कृति

तुम करते मेरा काम मुझसे ले स्वकृति

सांझेदारी है, रखवारी है, न रखना गरूर

  काल के हिसाब-किताब में दर्ज होता कर्म जरूर

हमारे हाथ उसकी जन्नत की चाभी

जिम्मेवारी बड़ी है उसने बाँटी आधी-आधी

घमंड नहीं ब्रह्माण्ड का रखता जो तेज़

उसके फैसले और मेरे हौंसले से दुनिया रंगती रंगरेज़

खूबसूरत दुनिया का वो सरताज

तुम्हारे हाथों की सदा रखूँगा लाज

तूने भरा सभी प्राणियों में मेरा नूर

दुनिया के सब मजदूर मेरे कोहिनूर

हजूर किसी को बनना था वो बन गया

मुझे गोद में बैठा वो खुद भी मजदूर बन गया

हैप्पी मदर्स डे

सिर पर आकाशगंगा

आंख में बहती गंगा

गोद जैसे अम्बा

आंचल में कुदरत अचंभा

बांहों में बसी जन्नत

हाथों में अन्नपूर्णा सत

पांव में घूमती उसकी दुनिया

ममता की ओढ़ चुनरिया

जुबां पर विद्यमान सरस्वती

कमर पर बंधी धन की पोटली

डांट-फटकार की मोटी छड़ी

संतान सींचती आराम न दो घड़ी

बांटती सुख का मोती

छुपोती दुःख मैली धोती

जग को दिल से देखती

अपने मन की करती

मां तुझे खुदा ने बनाया

या खुदा तेरा रूप धर कर आया

क्योंकि बांधने,जगाने और शीर्ष तक

ले जाने की सिर्फ तुममें शक्ति

मां दिव्य तेरी प्रेम प्रस्तुति

प्रभु से पहले करूं मैं तेरी स्तुति

प्रेम की गाँठे

जीवन भर बड़े जतन से

बड़े लगन से, बड़े चाव से

बड़े मन से, जोड़ता गया मैं

अनगिनत प्रेम की गाँठे

अब सताने लगी है

अब रूलाने लगी है

 अब बंधन लगने लगी है

अब डराने लगी है

उलझ रही है रोजाना

कैसे खोलूँ मन की गाँठे

यह गठरी सी बन

पीठ पर है लदी

मोह माया के मोटे रेशमी धागों में

बड़ी लुभावनी लगती रंगबिरंगी गाँठे

एक एक मोती जैसे पिरोता रहा गाँठे

ख़ुशी और गम में सहेजता रहा गाँठे

वक़्त गुजरता रहा तेज रफ्तार कांटे

वह खोलता रहा मेरी उम्र की गाँठे

और मैं बाँधता रहा प्रेम की गाँठे

इन गाँठो को जोड़ने में

आज हो गया हूँ मैं खुद एक गाँठ समान

इन गाँठो में घिर कर

घुट कर रह गया हूँ मैं और मेरी पहचान

टूट गयी कुछ गाँठे

ढीली हो गयी कुछ गाँठे

बेकार हो गयी कुछ गाँठे

बिखर गयी कुछ गाँठे

फीकी पड़ गयी कुछ गाँठे

इन प्रेम की गाँठो में

इंसान बखूबी बसते थे

जी भर के हँसते मिलते थे

कभी पास दूर के रिश्ते

 प्रेम के फरिश्तों से चमकते थे

अब केवल बची है गाँठे

 उजड़ गया है प्रेम

चुभती है अब यह गाँठे

आसक्ति में थी शक्ति

तो बोझ नहीं थी

विरक्ति में कैसे झूल रही है गाँठे

सुख देने वाली गाँठे

क्यों दुःख का सबब बनी यह गाँठे

बिना सोच-विचारे, आँखे भिगो, लगाता रहा गाँठे  

साँस की डोर में बंधी है ये गाँठे

एक क्षण में लुप्त हो जाएगी गाँठे

मुक्ति का सूत्र ढूँढ़ती मेरे मन की गाँठे

काश ! गाँठ लगाने के गणित को

समझ के गाँठ लगाता तो

आसानी से खोल और निकल जाता

अपने मन की कर पाता

आओ भगवान बचाये

भगवान् को बाँटा तो भी एक

भगवान को जोड़ा तो भी एक

उस एक से है सब

वो सब में है एक

पंच तत्वों का बेजोड़ स्वरुप

असंख्य, अद्वित्य व अनमोल रूप

सृष्टि में व्यापत सब भाव साकार

दिव्य दृष्टि में सब भाव निराकार

भ से भूमि की रखी उसने नींव

धरती माँ के गर्भ से जन्मे सब जीव

ग से गगन का किया अनंत विस्तार

सूर्य और चंद्रमा रोशनी के संचार

व से वायु का संवेग शुभ वातावरण संकेत

श्वाश और विश्वास के अटूट प्रकरण समेत

अ से अग्नि हुई प्रज्जवलित सकल जगत प्रसंग

ऊर्जा, ऊष्मा और उजाला के संग

न से नीर निरंतर निर्मल शक्ति का प्रवाह

प्रकृति में तृप्ति का क्षीर सागर गवाह

पोषण में उसके दुर्लभ दर्शन

युग-अवतारी और थामे सुदर्शन

वो बँट कर भी रहता एक

उसकी सब रचनाओं में गहरे अनेक भेद

तन मन और आत्मा

उत्पत्ति और सरंक्षण वो ब्रह्मात्मा

न माँगे न चाहे सिर्फ देने की भावना

कर्म को दिए दो हाथ, दो पैर का पालना

देखना और संभालना विरासत का खज़ाना

भगवान की रचना ने भगवान को छला

मानो रचनाकार को कृति ने निगला

भूमि हो गयी है खंडित

गगन हो गया है कलुषित

वायु में फैली है दुर्गन्ध

अग्नि स्रोत हो गए है क्षीण

नीर गया है सूख हर ओर

पृथ्वी पर है जीवन संकट भारी

भगवान भी होना चाहता है आभारी

भगवान को लौटना है या लूटना है

मगर कब तक चुप रहेंगे नर नारी

क्यों न एक विचार से उठे और बंधे

एक कर्म से उजड़ी पृथ्वी को सींचे

आओ भगवान अंश प्रकृति वंश बचाये

क्योंकि भगवान में है जीवन और आशाएँ

राम की ओर कदम

चलो ढूंढे राम को

भीतर और बाहर

क्योंकि राम ही कर्म है

राम ही धर्म है

राम ही समर्पण है

राम ही जीवन मर्म है

केवल राम ही नर्म दिल है

तन, मन और आत्मा है माध्यम

उससे जुड़ने और पाने को

कर्म से संवरेगा तन

ज्ञान से जलेगा मन का दिया

भक्ति से मुक्त होगा आत्मबंधन

राम मिलेगा बिना व्यय व बिना परिश्रम

राम की लगाए पुकार और गुहार

स्वर में चाहे अक्षर में सीधा साक्षात्कार

रामनवमी पर वह प्रकटा

मंगलकामना से जुड़े

तेरे मेरे मन के तार

I am insane

Sane is insane

Insane is sane

Get “in” to the word to understand pain

That drives the world insane to look sane

Sane is insane when

People suffer but objects maintained

Insane is sane when

To sustain life, hands are roughly trained

Sane is insane when

Mindful gestures are refrained

Insane is sane when

Potential is less still needs are more explored

Sane is insane when

Self is neither questioned nor bothered for bloodstain

Insane is sane when

One splits into many but reshaped again

Sane is insane when

Human strives love abandoned like grain

Insane is sane when

Duty is priority without entertain

Sane is insane when

Silence sounds high without proclaim

Insane is sane when

 Conventional is broken with strain

Sane is insane when

 Surplus exists in and out but in vain

Insane is sane when

 Brain drains daily for monetary gain

Sane is a selfish thought

Insane is a selfless thought

I am insane

Are you same or …. ?

भक्ति या आसक्ति

खंडित है आशा का दीप

रिसा है मन का तेल

बुझी है तन की बाती

मुरझाए है आस्था के सुमन

बहा है विश्वास का जल

जीवन की थाली पुनः हुई खाली

हर बार की तरह फिर से 

विफल हुई मेरी साधना

ख़ुशी से भरूँगा दामन भीगे जज़्बात

उत्साह से भर लूँगा दिव्य सौगात

नियति ने नीयत में डाली खोट

भोले मन को लगी करारी चोट 

अपूर्ण रह गयी मनोकामना, कैसे हुआ अधर्म

संसार रचने वाले से जुड़ न सका मेरा कर्म

धूं धूं कर जला अहम् का स्तम्भ

ईर्ष्या की एक चिंगारी से राख हुआ मेरा भ्रम

भारी पड़ गयी मुझ पर मेरी ही आसक्ति

शायद भक्ति से ज्यादा जरुरी है मुक्ति 

मैं था अच्छा, भाव भी था सच्चा

शायद श्रद्धा में रह गया कच्चा

भावनाओं का आया एक ज्वार-भाटा

जिसने मुझे मेरे अपनों से काटा

बिछड़ गया मैं आवाज़ के सैलाब में

रह गया तिनके सा वज़ूद मेरा

अनुराग के सजाये थे कुछ भाव

जब मन टटोला तो निकले कुछ पत्थर बैराग

टूटे मन, टूटे तन, टूटे घर की चुभन

टीस पुरानी है, नए है यह जख़्म

समझ के उठाये थे कुछ कदम

कर गए मुझे ही निराश व बेदम

कलयुग में सतयुग का दोहराया अध्याय

जोड़ने का सबब तोड़ने का कैसे निकला अभिप्राय

मैं से मैं ही गया मारा

 सब पहले भी और अब भी है ठीक

आज सबने सीखा है एक गहरा सबक

अपने अपने स्वार्थ के तीर्थ बड़े रमणीक

जख़्म

प्रारब्ध से मिले

कर्मों से उपजे

जीव के मिश्रित भावों का

कैसे होता अनोखा संचयन

जन्म-जन्म की पीड़ा

भोगते अपने कर्मफल के जख़्म

दुःख में कैसे उभर आते

सुख में कैसे संवर जाते यह जख़्म

कभी पल में उपचार

कभी निराधार  

कभी लाचार

कभी नासूर बन जाते जख़्म

पुराने भरते

तो नए उभरते

उम्र भर संग चलते  

साथी बन रहते सदा स्मरण

प्रारब्ध की श्रृंखला में

न छिपे, न ढके

न सुधरे, न मिटे

इन जख्मों के उपचार में कटे कितने जन्म ?

शुभ कर्मों के लेप से

 प्रभु की मीठी सेंक से

कुछ हरे, कुछ भरे, कुछ भले हो चले

कुछ जीवन-पर्यंत इंतज़ार में टले

हर पीड़ा की दवा

हर जख़्म की मलहम

खुद के हाथ ही गर है दर्द  

तो खुद के हाथ ही है मलहम

कुछ सूख गए

कुछ कुरेदे गए

दुनिया को दिखाने पर

यह जख़्म नमक से भेदे गए

कभी शरीर, कभी मन

कभी कराहती आत्मा

मेरे जख़्म क्यों न भर सका ?

वो रहमदिल परमात्मा

बड़ा बेदर्द है यह जख़्म

पीड़ा का जैसे होता न हो अंत

मैं जुड़ा पीड़ा से मेरे कर्मबंध

उन्मुक्त व्यवहार का ऋणबंध जीवन

पर जख़्म को देखो गहराई से

एक प्रयास कठिनाई से

एक एहसास नरमाई से

तो भर जाते है बड़े बड़े जख़्म

हर जख्म की अपनी कहानी

पर जो अपने जख़्म को भूल

स्वयं बन जाते है दूसरों की मलहम

स्वतः ही भर जाते है उनके जख्म

परपीड़ा से जुड़ा जब मेरा भाव  

तो जुड़ गया मैं परमात्मा की कृपा से

हो गया जीवन मानो कर्ममुक्त

जन्म-जन्म के जख्मों का अंततः अंत

अब  मनेगी गीली होली

कैलेंडर के पन्नों पर झूलती

होली की एक छुट्टी

प्रकृति पहुँची हमारे द्वार

ऋतु परिवर्तन की एक सुहानी घुट्टी

रंगो की पुरानी पद्चाप

भूले-बिसरे दिलों का मेलमिलाप

ढोल, नगाड़े, झांझ, मंजीरे

संगीत की बिखरेगी लहरी

होली की चेतना अंजान वेदना

रहती सदा मेरे अंग

न जाने क्यों हर बार होती है

खट्टी-मीठी यादों की गहन अनुभूति मेरे संग

अतृप्त मानवीय भावों को

तृप्ति के प्यालों से

पकाने, भरने और परोसने का

रंगबिरंगा और अद्भुत सिलसिला

जी भर के बतियाने

कुछ न करने बस खाने

मन बहलाने और सुस्ताने की

मिलेगी मीठी उत्सव झपकी  

सूखे बासी रिश्तों पर मलती

गाढ़े रंगों का एक छोटा सा लेप

पास बिठा मलहम सी सहलाती होली

मुँह में मुलायम स्वाद बन घुलती जाती होली

प्रीत के आवेग में अपने-बेगाने

सबको ले डुबोती यह होली

मौन संवाद में अपनेपन की मिठास

घोलने की पुरजोर कोशिश बड़ी अखरती

होली के रंगीन संदेश हवा में तैरते

कर बेसिरपैर दिलों से ठिठोली

सादगी या सतरंगी कैसे मनेगी ?

एक नई परंपरा की होली

होली खोलती मन के सूने द्वार

रंग भर, बहा दे, मन के दबे गुबार

होली तो है बस हँसी, व्यंग, कटाक्ष

और दिलवालों की झूमती गाती टोली

अब की बार सूखी नहीं

क्यों न मनाये गीली होली ?

पानी की किल्लत है

पर पानी ही अमृत्व है

सार से सरस बनानी है होली

गीले हाथों में भरना गुलाल

कर देना गुलाबी दोनों गाल

न रहे कोई मन में मलाल

आँखों के समंदर में डुबोना

याद के दरिया में दोस्तों को भिगोना

मीठी जुबान से अमृत शब्दों में

काव्य-रस की सरिता में बहना

भावनाओं में बहकर

अपनों के दिल तक जरूर पहुँचना

प्रेम की डुबकियों में

बिछड़े पलों को फिर से ढूँढ़ना

पानी नहीं है मानव कंही भी

पर रखनी है मानवता की नदियाँ गीली

नम, गीले, और तर भावों में

सदा उछलती खेलती रहे सबकी होली

सूखी नहीं चलती जिंदगी जब

तो काहे मनाए सूखा त्यौहार

नीरस दुनिया की सरस होली

गले न(मन), खिले तन, ऐसे मनाए गीली होली

साया हमसाया

एक स्त्री को खुद के लिए जीना कँहा आता है

उसे गर खुद के लिए जीने को कहो

तो उसे कुछ समझ नहीं आता है

उसका खुद के लिए जीना

कितना भारी और दुश्वार हो जाता है

जन्म लिया तो पिता का साया बन गई

पिता के लिए प्रार्थना, शक्ति और प्रेरणा बन गई

भाई से लाड-दुलार,जज़्बात और सुरक्षा की चारदीवारी बन गई

उसका ख्याल रखने, उसके साथ खेलने में न जाने कब बड़ी हो गई

जब शादी की तो पति का साया बन गई

खुद के अस्तित्व को गला कर पति के साँचे में ढल गई

जब अकस्मात परित्याग, अलगाव या वैध्वय की पड़ी काली छाया

पति से सहना पड़ा बिछोह, तो बच्चों का साया बन गई

खुद का अक्स देखने को समय नहीं

अपनों के दर्पण में खुद की परछाई ढूँढती रही

संतति की परछाई बन एक ढाल सी तन कर खड़ी हो गई

जब बच्चों ने बसाई अपनी गृहस्थी

अपनों का हमसाया बन कर जीने वाली कितनी अकेली पड़ गई

 अपने साये को पहचानना कँहा होता है आसान

फिर से कर हिम्मत वो अब ईश्वर का साया बन गई

ईश्वर से करने लगी प्रार्थना और एक कठिन प्रयास

सबकी खुशियों की सलामती में बना रहे उसका अटूट विश्वास

जब ईश्वर ने उसे किया अपनों के परम कर्तव्यों से अलग

तो भी वो मिट्टी में मिलकर ख्वाहिशें ये करती रही

मेरे घर-संसार, मेरे अपनों को बुरे साए की नज़र से बचाना

हे ईश्वर, तेरे साये-सानिघ्य में बसा रहे मेरे अपनों का घर

अपनों के साये तले चलता रहे, सृष्टि का यह जीवन-क्रम

सदियों तक, मृत्यु तक, जन्मों-जन्मों तक, अनंत काल तक

इस सिलसिले को हे ईश्वर, तुम पोषित और पारिभाषित रखना

 मुझे भी अपनों के साये में शोभित और प्रफुल्लित रखना

ऐ सायों की हमसाया, तू जन्म लेकर भी न जन्मी

काया से भले ही तू जन्मी, पर साया बन रही सदैव अजन्मी

खुद को भुला कर अपनों को सींचती रही जैसे रूप महामाया

न समझ सका जब तुझे ईश्वर

तो कँहा समझ पायेगा आदमी ?

जो भागता रहता है निरंतर

अपनों से, अपनों का साया

Comfort or Discomfort

Life is a choice between being comfort and discomfort

The more I chose comfort, the more I became inert

The more I chose discomfort, the more I could put effort

When I ran for comfort , I remained single

But when I faced discomfort, I could easily mingle

When I selected comfort zone, I was labelled as selfish

But when I opted discomfort zone, I became selfless

When I pursued comfortable path, I lost my identity

But when I walked on uncomfortable path, I found my new identity

When I followed steps of comfort, I lead an ordinary life

But when I took steps of discomfort, I relished an extra-ordinary life

When I chased thoughts of comfort, I forgot to fight for right

But when I included thoughts of discomfort, I got immense delight

When I enclosed myself in a comfortable house, I was cut off from the world

But when I struggled in discomfort situations, I explored a surprising world

When I preferred a comfortable partner, I had little choices

But when I accepted a discomfort partner, I had plentiful choices

When I searched for comfort space, I lost many opportunities

But when I adjusted with my discomfort space, I could handle my liabilities

When I planned for a comfortable journey, I needed a big support

But when I started my journey with discomfort, I created my self-support

I could figure out now between being comfort and discomfort firmly

So I raise my voice, take pains and select life of discomfort willingly

Everyone needs comfortable life but there is a price for heaven, that is discomfort