माँ चली गयी
संसार भोग कर
हँसता खेलता परिवार
रोता बिलखता छोड़कर
अनंत दिव्यधाम यात्रा पर
अनेकों असहनीय कष्ट सहकर
अपने पीछे छोड़ गयी
अनगिनत सवाल
देहत्याग कर्मबन्धन से मुक्त हो गई
करकमलों से कर सेवा बैकुंठ धाम चली गई
कल थी आज नहीं
अविश्वसनीय है पर सत्य भी है
स्थूल से ले लिया उसने सूक्ष्म रूप
जीवन की लौ समां गई प्रभु नारायण स्वरुप
कर्म ज्ञान भक्ति में से चुना कर्म प्रधान जीवन
संघर्ष से पाया सम्मान सार्थक किया अपना जन्म
जीवन का मर्म सहज ही बतला गई भोला था उसका मन
सब कुछ वैसा का वैसा पड़ा है
बिन माँ घर निष्प्राण पड़ा है
कलयुगी दुनिया में बसाया था उसने शांतिकुंज
जाते जाते हमारे पल्लू में असंख्य सुख बांध गई
चुपचाप हमारे हिस्से का दुर्भाग्य अपने साथ ले गई
फ़ूल समान माँ फ़ूल बन गंगा में बह गई
पलभर में आँखों से ओझल हो गई
फोटो में जा दीवार पर प्रतिष्ठित हो गई
दिव्यता की मूर्त बन रही माँ आजीवन
अब आसमान में तारा बन कर रह गई
परिवार को भावनाओं में डुबो कर
स्वयं भवसागर से तर गई
घर के कोने कोने में बिखरी है उसकी महक
प्रेम से सींची घर की बगिया जिसने जीवन पर्यन्त
धर्म अर्थ काम मोक्ष हर जीव के महालक्ष्य
चारों भावों में बीज बो वंश का वटवृक्ष सुदृढ़ कर गई
चरणों में जिसके बसता था हमारा स्वर्ग
रोके रखती थी वो माँ हमारे लिए दुनिया के नर्क
पूरे परिवार की परिधि
हमारे जीवन का केंद्रबिंदु
अचानक हो गई शून्य में गुम
दिखा गई हमें दिशा
न घबराना कैसी भी हो दशा
सरल रखना सबसे प्रेम समीकरण
कभी न भरेगा उनके जाने से उपजा सूनापन
माँ का छोड़ा रिक्त स्थान रहेगा सदैव अक्षुण्ण
पुण्यात्मा जगतमाता से थी दिखती
नौ रस नौ देवी का संजोय दिव्यरूप संपन्न
शुभ कर्म राम स्मरण कर पहुँची मुक्तिमोक्ष धाम
आश्चर्यरूप से ले लिया उसने जीवन से विश्राम
मेरे स्मृतिपटल पर है अंकित
उनकी अनगिनत यादें सुनहरे पलों की धूल
रोज पोंछूगी नम आँखों से सहेजूँगी स्मरण में बिखरे रंगबिरँगे फ़ूल
चिंतित माँ देखो आज शांतास्वरूप हो गई
उसकी फिक्र उसका जिक्र बाँधेगा हमें समूल
गूंजेगा उनका स्वर विपरीत चलेगा जब कालचक्र कुछ क्षण
प्रार्थना में मेरी माँ अब बस गई
मेरी वाणी में मधुर कविता सी रच गई
मेरे हाथों में घर परिवार संसार सौंप निश्चिन्त हो चली गई
कँहा ढूँढूगी मैं माँ जैसी प्यार की ओट
किस पल्लू से पोंछूगी आँखे दुनिया है बड़ी खोट
आशीष है सिर पर बस नहीं है उसके गर्म नरम हाथों का अहसास
सब कहते है माँ जैसी दिखती हूँ
माँ से ही तो पाया है यह जीवन यह शरीर
माँ जैसी शक्ति व सामर्थ्य कँहा से लाऊँगी
उनके जैसा पवित्र मन मैं न रख पाऊँगी
उनकी देह में भरा था अनुपम स्नेह
साया जुदा है पर हमसाया बन रहेगी मेरे जीवन में सदैव
मुसीबतों से घबरा कर
रख देती थी माँ की गोद में सिर
सिर पर हाथ फेर हर लेती थी हर पीड़ा हर रुग्ण स्वर
सक्षम संबल कर देता था उनका लाड़-दुलार
प्यार देना व प्यार ही कमाना बच्चों
माँ के जीवन का रहा मूलमंत्र
जब तक था माँ का साथ व सानिघ्य
कँहा ईश्वर को ध्याया कँहा भक्ति में मन रमाया
करना होगा अब मुझे ईश्वर की और रुख
माँ सी ओट माँ सा प्यार देगा अब माँ को रचने वाला त्रिलोक
जग मनाना पड़ेगा तनमन की शक्ति जगानी पड़ेगी
माँ जैसी न कोई अलौकिक शक्ति जिसकी उपस्थिति विश्व विराट स्वरुप
नाम अनुरूप जिया जीवन अपने दम पर खूब
“राज रानी” ने किया सबके दिल पर राज बखूब
प्रेम विश्वास समर्पण भाव से किये सब काज
देवी माँ की रजा में रही राजी रखा निस्वार्थ भाव
ओजस व्यक्तित्व सच्ची हितैषी सबकी हमदर्द
हर जन्म में मिले माँ तेरी गोद हाथ जोड़ माँगू ईश्वर से तेरा निश्छल प्रेम भरपूर
ॐ शांति