माँ दुर्गा के सुंदर रूप

माँ दुर्गा के नाम में निहित अर्थ बड़ा चमत्कारी

द माने “स्थिर” ग माने “गति” उ माने “संतुलन”

अ माने “अजन्मे ईश्वर की शक्ति” अथार्त

ईश्वर की वो शक्ति जो है “स्थिर गतिमान और संतुलित”

माँ दुर्गा ब्रह्माण्ड को बांधे एक शक्ति के सूत्र

दु का मतलब होता “अंधकार” “कठिनाई” “बुराई” और “कष्ट”

ग का मतलब “ईश्वरीय ज्योति” यानि “प्रकाश”

जो दुखों पापों और बुराईओं को है हरता  

बीच में रेफ का मतलब “दुखों से मुक्ति सुखों की अनुभूति

दुर्ग शब्द का अर्थ “दैत्य” “महाविघ्न” “बंधन”

आ शब्द का अर्थ “हन्ता” अथार्त “हरने वाली

आदि शक्ति प्रधान प्रकृति गुणवती माया

बुद्धि जननी विकार रहित माँ में सम्पूर्ण जग समाया

असत्य अज्ञान और अंधकार रूपी राक्षशों का करे विनाश

अष्टभुजाधारी आठों दिशाओं की रक्षक अस्त्रशस्त्र से करती प्रहार

हाथ में त्रिशूल तीन गुणों का प्रतीक “सतोगुण” “रजोगुण” “तमोगुण”

सत “मन की स्थिरता” रज “लोभ लालच” तम “आलस अज्ञान”

त्रिशूल करे नियंत्रित और संतुलित यह तीनो ऊर्जा

अग्नि सूर्य चंद्रमा माँ के तीन नयन तीसरे नेत्र से कहलायी त्रयंबके 

केंद्रित होने पर भी मायाशक्ति संयोगवश हो जाती अनेक

त्रिरूप ब्रह्मा विष्णु महेश के रूप में जन्मी

ब्रह्माणी कमलारानी रुद्राणी संग गयी ब्याही

तीनो रूप भिन्न पर आदि शक्ति में समाये

सोलह श्रृंगार सोलह संस्कार सोलह कलाएं

माँ दुर्गा के सोलह रूप व सोलह नाम

दुर्गा नारायणी ईशाना विष्णुमाया शिवा

सती नित्या भगवती सर्वांगी सर्वमंगला

अंबिका वैष्णवी गौरी पार्वती सत्य सनातनी  

दुर्गा है वो देवी जो दैत्य दानव समेत दुःख दर्द का करे हनन

नारायण के गुण विद्यमान माँ दुर्गा नारायणी

तमाम सिद्धियाँ देने वाली देवी ईशानी

विष्णु की माया शक्ति अतः विष्णुमाया

शिवअर्धांगिनी शिवभक्त शिवप्रिया बनी शिवा

हर युग में विद्यमान सतवती पतिव्रता माँ सती

ईश्वर नित्य है अतः भगवती भी माँ नित्या

जगत मिथ्या है ईश्वर सत्य बनी माँ सत्या

संपूर्णता सिद्धता ऐश्वर्यता सब गुण रखती देवी भगवती

कर्मबंधन मुक्त जन्ममृत्यु बंधन मुक्त करती मोक्ष प्रदान देवी सर्वांगी

मंगल कर्ता हर्ष संपत्ति कल्याण प्रदान करे सर्वमंगला

त्रिलोकिनी पूजित वंदित स्तुतिय माँ अंबिका

विष्णुशक्ति विष्णुभक्त विष्णुरूपा माँ वैष्णवी

गौर माने निर्लिप्त निर्मल निर्गुण परब्रह्मा परमेश्वरी माँ गौरी

पर्वतराज हिमालय पुत्री कहलायी माँ पार्वती

हमेशा विद्यमान रहने वाली माँ सनातनी

भव्य रूप माँ धरे हर रूप भक्तो के कल्याण हेतु

तुम में सृष्टि या सृष्टि में तुम पाकर तुम्हे धन्य हुए हम

जय शेराँवाली माता तेरी जयजयकार

नौ ग्रहों में नौ देवी के रूप

प्रतिपदा से नवमी नौ तिथि

नौ नक्षत्र नौ ग्रह नौ निधि

नौ शक्तियाँ की नवधा का पर्व नवरात्र

जीवन के नवरंग निखरे नवरात्रि के संग  

नौ रंग नौ रूप नौ अवस्थाओं में बंटा सृष्टि चक्र

नौरात्रि जीवन के नौ रंग का विभाजन

कोख से कब्र तक का सफर बया करती मानव जीवन ऊर्जा का रहस्य

नवरात्रि में छिपे गहरे अर्थ का संदर्भ मार्मिक व गूढ़

प्रथम शैलपुत्री “चंद्र” संचालित उज्जवल शांत ठंडक भरे आनंद  

कोमल मन की देवी नवजात शिशु समान अबोध निष्पाप निर्मल

द्वित्या ब्रम्ह्चारिणी “मंगल” संचालित तमविजया की शक्ति

ज्ञानपिपासा विद्यार्थी शिक्षाप्राप्ति मूलमंत्र करे ब्रम्हचर्य पालन

तृतीया चंद्रघंटा “शुक्र” संचालित काम को रखती वश

व्यस्क यौवन से भरपूर प्रेम का सही संचरण काम ऊर्जा नियंत्रण

चतुर्थ कुष्मांडा “सूर्य” संचालित जीवन शक्ति भंडारण

विवाहिता स्त्री करती गर्भधारण नवपीढ़ी करे उत्पन्न

पंचम स्कंदमाता “बुध” संचालित पालनशक्ति सुबुद्धि और मन

द्विरूप मातापिता बन करे पालनपोषण परिवार संरक्षिका

छठी कात्यानी “बृहस्पति” संचालित तुष्टि पुष्टि संतुष्टि करे प्रदान

परिवार की शक्ति भविष्य सुनिश्चित करती संपन्नता का आशीर्वाद

सातवीं कालरात्रि “शनि” संचालित वृद्धावस्था के अनुभव से संवारती

पुत्रपौत्र सुखप्रदाता प्रतिक्षण काल से लड़ता जीवन जीता बुढ़ापा

अष्टम महागौरी “राहु” संचालित सदगति प्राप्ति की शक्ति

जीवन की अंतिम अवस्था पंचतत्व में विलीन मिले प्रभु यही इच्छा

नौवीं सिद्धिदात्री “केतु” संचालित करे परमेश्वर में विलीन

आत्मा से परमात्मा के मिलन की सिद्धि शक्ति देती वचन

नवग्रह की शक्ति नवदेवी की भक्ति से हो मज़बूत

शक्ति ही ग्रह या ग्रह की शक्ति दोनों ही एक रूप

नौ देवियों के चमत्कार हर्ष के उदगार

आओ करें नवशक्ति से नव जीवन की स्तुति

नवधा भक्ति दे शक्ति

श्रवण(परीक्षित) कीर्तन(शुकदेव) स्मरण(प्रह्लाद)

पादसेवन(लक्ष्मी) अर्चन(पृथुराजा) वंदन(अक्रूर)

दास्य(हनुमान) सख्य(अर्जुन) आत्मनिवेदन(बलि राजा)

नवधाभक्ति के निराले नौ रूप भक्तों को करे प्रसन्न   

हाथ जोड़ श्रद्धा सहित अतृप्त मन से करे “श्रवण

ईश्वर की लीला कथा महत्व शक्ति स्रोत सुने हृदय और मन

आनंद उत्साह और प्रेम के साथ करे प्रभु “कीर्तन”

ईश्वर के गुण चरित्र नाम पराक्रम का उच्चारण

मुग्ध भाव से महात्म्य और शक्ति गुणगान का हो “स्मरण”

निरंतर अनन्य भाव से परमेश्वर का हो मनन

ईश्वर के चरणों में आश्रय वही सर्वस्व माने बिना मंथन

पादसेवन “भक्ति से निखरे आत्मा तन और मन

मन वचन और कर्म द्वारा पवित्र सामग्री से “अर्चन

शरीर वातावरण और कर्तव्यों का पवित्रिकरण

ईश्वरीयअंश आचार्य ब्राह्मण गुरुजन मातपिता

सदैव आदरसत्कार नमस्कार सेवा बने “वंदन”

परम श्रद्धा से करे प्रभु सेवा इसमें मिले जीवन आनंद

दास को प्रभु की आस करे “दास्य” भक्ति सब जन   

जब प्रभु बने सखा पाप पुण्य कर दे सब समर्पण

ईश्वर को ही माने सच्चा मित्र “सख्य” भक्ति के गुण

मैं आत्मा तुम परमात्मा सब तेरा मेरा क्या भगवन ?

करे भक्त आत्मनिवेदन मेरी लाज रखते तुम

संसार विनाशी तुम अविनाशी सुन मेरे आराधन

तुम दया और कृपा के सागर अनंत तेरे वरदान

तुम से तुमको को माँग लूँ जीवन सफल टूटे भव बंधन

मैं से मुक्ति प्रभु तभी मिलोगे होंगे तुम्हारे साक्षात् दर्शन

नवरात्रि में नवऊर्जा का सृजन

शक्ति के पर्व का आशय महान

जागृत हो स्वयं की महाऊर्जा बने बलवान 

अंतर्मन की शक्तियों का हो उत्थान

बिखरी ऊर्जा को स्वयं समेटने का अवसर प्रदान

स्वपरिचय ज्ञान और बोध पाये जीव ले संज्ञान

संकलन संचरण प्राप्ति का क्रियान्वयन

नौ दिन तलवार नहीं स्वयं की धार तेज करने का प्रावधान

चेतन से अचेतन मन नौ गुणा क्षमतावान

नवरात्रि में उसी नौ गुनी क्षमता का पुनर्परिचय जान

माँ की भक्ति शक्ति से स्वजागरण व आत्मबोध का ज्ञान

सुप्त आतंरिक क्षमताओं और ऊर्जाओं का भान

सात चक्रों में निहित कुंडलिनी शक्ति का आह्वान

मूलाधार से सहस्रार चक्र जागरण खोले मोक्ष के द्वार

पशुवत जीवन चार पंखुरी सारा जग इसमें मगन

जीवन अर्थ नष्ट हो जाये जो न हो मूलाधार से भिन्न

भोगी बन सब सुख पाये छह पंखुरी सब रहे प्रसन्न 

स्वाधिष्ठान चक्र की ऊर्जा से उठे तो पार पाये बने संपन्न

भोग से उठ कर्म की ओर दस पंखुरी रखे ऊर्जा का मान

मणिपुर चक्र साधे जीव पाए कर्मयोगी का सम्मान

ऊर्जा का जब बढ़े स्तर बारह पंखुरी जीव स्वक्षमता से अंजान

अनाहत चक्र पर ऊर्जा अनमोल बने सृजनशील जग दिप्तमान

सोलह कलाओं सोलह विभूतियों सोलह पंखुरी जीव करे स्वनियंत्रण

अति बलशाली अत्यंत खुशहाली ऊर्जा खिले विशुद्ध चक्र का मंत्र

बुद्धि सिद्धि संवेदना संपन्न सकरात्मक ऊर्जा का मनन

आज्ञा चक्र संवारे कर्म ज्ञान भक्ति के समीकरण

सहस्रार चक्र जाग्रत हो तो खिले कमल सा जीवन

परमहंस पदवी की प्राप्ति आनंदमय जीवन मोक्ष लक्षण

महाशक्ति से पाकर शक्ति स्वशक्ति का भंडार विलक्षण

माँ तुम्हीं सर्वज्ञ तुम्ही सर्वशक्तिशाली तुम्हीं तोड़ो भव बंधन

माँ को वंदन हार्दिक अभिनन्दन जगजननी के हुए दर्शन

माँ महाबली

जब पाप अत्याचार दुराचार का बढ़ा आतंक

अधर्म अन्याय असत्य का पलड़ा हुआ भारी

बुरी शक्तियों ने जकड़ा पृथ्वी मानव प्रकृति सारी

तमस ने निगले सतियों के सत सृष्टि पलट डाली

मन कर्म वचन से विमुख देख मानव

निराश हुई माँ जगदम्बे शक्तिशाली

अराजकता का देख दृश्य माँ के सब्र की टूटी प्याली

असत्य अज्ञान अन्धकार ने कड़ी परीक्षा ले डाली

प्रकटी धरा पर आसुरी शक्तियों का नाश करने

अपार शक्ति की स्वामिनी महाबली महाशक्तिशाली

सच्चाई की स्वरूपा माँ सत्या

सर्वसिद्धांत निपुण माँ सर्वशास्त्रमयी

अजेय माँ वैष्णवी महापराक्रमी माँ विक्रमा

बन संहारिणी मारे महासुर रक्तबीज मधुकैटभ महिषासुर

बन चामुण्डा निशुम्भशुम्भहननी और सर्वदानवघातिनी

कभी शूलधारिणी कभी पिनाकधारिणी

भयंकर दृष्टिकोण जिसका स्वरूपा माँ घोररूपा

दैत्यों पर टूट पड़ी बन माँ कालरात्रि

किया धरा को पापमुक्त जब रूप धरा माँ भद्रकाली

विध्वंसक रूप में भयंकर चेहरा बनी माँ रौद्रमुख

बुरी शक्तियों का कर अंत राक्षसों से मुक्ति दे डाली

रक्षा लाज व कल्याण कर बनी माँ कल्याणी

धरे विभिन्न रूप भक्तों को कष्ट से उबारे

महामाया ने कर असुरमुक्त संसार

सृष्टि की बागडोर स्वयं संभाली

महाशक्ति तुम्हीं बनी शक्ति भक्ति मुक्ति

त्रिबली तुम्हीं कल्याणकारी परोपकारी शुभकारी

तुम्हें नमन तुम्हें वंदन तुम्हें कोटि कोटि प्रणाम

जय माँ शेरांवाली

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माँ भवानी

अनंत आनंद जिसका स्वरुप माँ सत्यानन्दस्वरूपिणी

सतस्वरुप में जो सबसे उत्कर्ष माँ सत्ता

विभिन्न रूप धारण करने वाली माँ बहुला

जिसका अंत न हो विनाशरहित माँ अनन्ता

हर कार्य में विद्यमान कर्म की प्रक्रिया माँ क्रिया

सर्वत्र विद्यमान तुम ब्रह्मवादिनी

शिव का प्रेम शिवप्रिया विख्याता माँ भवप्रीता

मनोहर भावना ध्यान योग्य कामना माँ भाव्या

उत्पन्न करने को प्रसन्न महासुंदरी माँ भावानी

संसारिक बंधनों से देती मुक्ति माँ भवमोचनी

कल्याण की भावना भव्य रूप में प्रतिष्ठित माँ भव्या

जिससे बढ़कर कुछ भी नहीं माँ अभव्या

कण कण रोम रोम हर श्वास में बहती बन विश्वास

तुम्हीं स्थिर गतिमान संतुलन जय अम्बे माँ जय अम्बे माँ

माँ की महिमा

हे शिवार्धांगिनी

माँ पार्वती सती गौरी

हे त्रिनेत्रा

दो सुंदर नयन व तीसरा दिव्यदृष्टिधारी

हे त्रिशक्ति

माँ सरस्वती लक्ष्मी अन्नपूर्णा

हे त्रिलोकिनी

पृथ्वी स्वर्ग नर्क तीनो की अधिकारी

हे त्रिकालदर्शीनी

आदि मध्य और अंत काल में विराजे माँ

हे त्रिगुणात्मक देवी

जगजननी पालक संहारक तुम्ही त्रिपुरासु

हे त्रिदेवी

माँ ब्रह्माणी रुद्राणी तुम्ही कमलारानी

हे त्रिमुखी

तुम्ही शक्ति चेतना आनंद

हे त्रिज्ञानी

कर्म ज्ञान भक्ति का त्रिकोण

हे माँ धरती पर प्रकटी भक्तों को

दुःख से मुक्ति दिलाने

दर्शन को तेरे हाथजोड़ खड़ा संसार

अब तुम्ही करो पाप का अंत अधर्म का नाश

अन्याय का समापन असत्य का अवसान

तेरी जयजयकार माँ तेरी जयजयकार

क्या करुँ ? कोई लड़की पसंद ही नहीं आती

क्या करुँ? कोई लड़की पसंद ही नहीं आती

सब जगह देखा ढूँढा पुकारा खोजा तलाशा

आखिर करुँ क्या ? समझ में नहीं आता

मेरी पसंद की लड़की आशा है या निराशा

कोई घरेलू है तो लगती नहीं चुस्त चालक

कोई नौकरीपेशा है तो घर के काम से उदास

कोई सुंदर है तो व्यवहार में अजनबी

कोई आकर्षक है तो बोलचाल में नहीं लाजवाब  

कोई लंबी है तो नैननक्श अति साधारण

किसी की नाक चौड़ी तो गाल चपटे

लंबे बालो वाली के सौ सौ नखरे

कोई पतली दुबली तो कोई साधारण कद काठी

सांवली शक्ल सूरत वाली मेरे मन को नहीं भाती 

मोटी भारी भरकम मेरी लिस्ट में नहीं समाती

अख़बार इंटरनेट पासपड़ोस दोस्त नाते रिश्तेदार

सब बता बताकर दिखा दिखाकर समझा समझाकर

हर तरह से मदद कर थक गए हार गए छोड़ गए

मुझे न मिली एक अदद सुकन्या सुंदर गोरी घरेलू

सुशिक्षित पतली दुबली अमीर कमाऊ खानदानी

न मिली ऐसी कन्या ना हीं कन्या का परिवार

बस इतनी छोटी सी मेरी जरूरत न समझे संसार

डॉक्टर इंजीनियर सीए एमबीए आईएएस

बड़ी बड़ी डिग्रीओ वाली से लगता डर

यह क्या मेरा घर चलायेगी या रखेगी मुझे

या मेरे घरवालों को मुंडू रामू शामू की औलाद

कंही रूप तो कंही गुण नदारद

कंही शिक्षा तो कंही घरेलूपन सिरदर्द

किसी की अकड़ रौब गुस्सा नखरा बना दिल का दर्द

हे प्रभु तुमने मेरे जीवनसाथी को तो बनाया

पर शायद पता गलत दिया बताये  

सारे सोमवार के व्रत कर डाले

सारी मातारानी पूज डाली

पर ईश्वर का न दिल पसीजा

जो मुझे रखा कुवांरा

कन्या तलाशते तलाशते उम्र गयी है ढल

समझ नहीं आता मेरी पसंद की कन्या

आज मिलेगी या कल

खुद को सँभालते सँभालते थक गया हूँ

अब कोई तो आये जो मुझे संभाले

इंतजार करते करते थक गया हूँ

पक गया हूँ ऊब गया हूँ

तलाश है ऐसी सुकन्या की जो मुझसे न हो बड़ी

उम्र पैसे ओहदे में और हाँ कद की ऊँचाई का रखना ध्यान

सालों से घूम रहा हूँ उसे पाने के लिए

जो फिट हो मेरे दिल में घर में परिवार के फोटोफ्रेम में

घर के सदस्यों से रखे अच्छा तालमेल घर के कामों में दक्ष

घर बाहर की जिम्मेवारियों को निभाए दुरुस्त दुनियादारी में चुस्त

संगीत कला साहित्य में पारंगत तनमन से तंदुरुस्त 

एक अम्बा में मिल जाये नौ देवियों के अवतार

फिर तो जिंदगी की गाड़ी फर्राटे से दौड़ेगी मेरे यार

सौ में से निन्यानवे नकार चूका हूँ

शायद मेरे भाग्य की लक्ष्मी कंही सो गयी है

मेरी नींद उड़ाकर दिल का चैन चुराकर विलुप्त हो गयी है

रोज़ करता हूँ ढेरो देवियों के दर्शन

मेरे मन मंदिर की घंटी कोई बजाती ही नहीं

अधूरी है जिंदगी बिन अर्द्धांगनी

बिन जीवनसाथी जिंदगी भाती नहीं

कोई हँसती है इतना हाय मज़ाक न बना दे अपना

कोई बातूनी है इतनी पक्का चुगलखोर नस्ल होगी इसकी 

खोल देगी पोल सबकी

किसी को उठने बैठने का शऊर नहीं

किसी को कपडे लत्ते पहनने का ढंग नहीं

कोई बालकटी तो कोई सिरमुंडी

आज के ज़माने की मॉडर्न वुमन

क्या रखेगी मेरा ख्याल ? जिसे पसंद सिर्फ आज़ादी अपनी

कोई पार्टीखोर तो कोई सखियों के बिन अधूरी

कोई रखती खरीदारी का महँगा शौक

जो मुझे और मेरे पैसो को कभी भी दे सकती है शॉक

घरवाली को ढूंढ रहा हूँ जिसे घर से नहीं लगाव

बाहरवाली तो खुद ही रहती बाहर मुझे भी न कर दे घर से बाहर

एक मिली अति साधारण घरेलू पूजा पाठ व संस्कारी आचरण

सेवाश्रुषा में रहती मगन मैं उसका भक्त वो भगवान की भक्त

कैसे होगा भक्ति का संगम ? हर जगह पुकार लगाई गुहार लगाई

तब जाकर एक कन्या बमुश्किल पसंद आयी

पर हाय दैय्या यह किसने नज़र लगाई ?

वो ही लड़की पड़ोस वाले शर्माजी के बेटे संग गयी ब्याही

मैं भी कितना बुद्धू हूँ मुझे यह बात समझ में क्यों आयी 

भगवान ने सिर्फ और सिर्फ एक ही सर्वगुणसंपन्न सुकन्या बनायीं

और उसे ही बना लिया अपनी लुगाई

बाकी सब तो असल की नकल है

मैं कुबुद्धि ढूंढ रहा सर्वगुणसंपन्न सुकन्या जो ईश्वर ने कँहा बनायीं ?

अब सर्वगुण संपन्न नहीं सद्गुणी चाहिए

सुंदर नहीं साधारण चाहिए

विदुषी नहीं शिक्षिता चाहिए

कामकाजी नहीं घरेलू चाहिए

परिवार की पसंद की नहीं मेरी पसंद चाहिए

पैसों की अमीर नहीं दिल की अमीर चाहिए

रवैया वाली नहीं राज़ी होने वाली चाहिए

हाई फाई नहीं वाईफाई नहीं वाइफ चाहिए

एक छोटी सी है ख़्वाहिश एक छोटा सा है ख़्वाब

एक छोटा सा घर एक प्यारी बीवी दो बच्चे

घर की बनी दाल रोटी सुख शांति चैन की बंसी

यही तो है शादीशुदा जिंदगी का ख़्वाब

कैसा लगा जनाब ?

क्योंकि बड़ी देर में समझ आया

शादी सौदा नहीं समझौता है जनाब

मोना

ईश्वर ने जब खोला कीमती खज़ाना अपना

स्वर्ण काया की निकली अप्सरा मोहना

प्यारी दुलारी हमारी मैडोना

मातपिता ने रखा नाम उसका “मोना”

घर में सबसे छोटी पर रखती सबका आदर मान सजोना

प्यारी दुलारी हमारी मैडोना

सुंदर सुकोमल सुगुणी हर कोई जिसका दीवाना

ईर्ष्याभरा जग सह न सका जिसका दिव्य रूप सलोना

प्यारी दुलारी हमारी मैडोना

सजसवंकर बनठनकर घर से जब तुम निकलती

दुनिया भूल जाती कटरीना बिपाशा करीना

प्यारी दुलारी हमारी मैडोना

ज्ञानी ध्यानी कर्म शिक्षिका ज्ञान की तुम नगीना

अज्ञानता को ओढ़ती जब संसार में हो विचरना

प्यारी दुलारी हमारी मैडोना

प्रेम मैत्री स्नेह वात्सल्य दया करुणा तुम्हारा गहना

सबकी सलाहकार सबका हो भला तुम्हारा चाहना

प्यारी दुलारी हमारी मैडोना

गृहदक्ष कार्यदक्ष संसारदक्ष हर कार्य की करती गणना

सबको रखती व्यवस्थित घर घरवालों की सुलोचना

प्यारी दुलारी हमारी मैडोना

संगीत साधना या ईश्वर आराधना दोनों में पारंगत

कभी संसारी कभी बैरागी दोनों रूप की विडंबना

प्यारी दुलारी हमारी मैडोना

यूँ तो करती प्यार पर करती क्रोध लक्ष्मीबाई सा  

जब ठेस पहुँचता कोई आत्मसम्मान और गरिमा

प्यारी दुलारी हमारी मैडोना

खूब समझती ईश्वर को संसार को देखती माया का खिलौना

तुम सा न कोई भक्त वासुदेव कृष्ण की तुम्हीं राधा व मीरा मोना

प्यारी दुलारी हमारी मैडोना

जन्मदिवस की शुभकामनाएँ स्वीकारो मोना 

स्वस्थ आयुष्मान खुशहाल जीवन जीना सम्मोहना

श्राद्ध

मुझमें श्रद्धा का अभाव

कैसे करुँ श्राद्ध  ?

दुनिया ने समझाया रे कैसा तू

न डर न भय न शर्म न संकोच

न मन में ग्लानि न लोकलाज का भाव

नाराज़ हो कंही ईश्वर न दे दे तुझे श्राप

दुनिया न समझे मेरे मन के भाव

श्राद्ध का संबंध श्रद्धा से वे क्या जाने

मेरी कुपात्रता मेरा संताप

हर कोई नहीं होता काबिल पितृप्रेम के आशीर्वाद

कैसे करुँ श्राद्ध  ?

वे पूर्वज मैं वंशज

जड़ से जुड़े रहे यही श्रद्धा भाव

जीते जी उन्हें समझ न सके

न बन सके काबिल न पा सके आशीर्वाद

कैसे समझाऊँ मन के उतार चढ़ाव  ?

पितृलोक पहुँचते केवल सच्चे भाव

बाज़ार में मिलता पितृपूजा का सामान

बिना श्रद्धा भाव पदार्थ का क्या मान ?

कैसे करुँ श्राद्ध  ?

मैं अंश उनका मैं वंश उनका

चलती रहे कुल परंपरा पितरों का सपना

प्रेम त्याग बलिदान समर्पण से

सवांरते रहे मेरे कल आज और कल निर्बाध

लुटाते रहे अथाह प्यार और मान

रह न जाये कंही कोई जीवन में अभाव

उनकी भूमिका में जाकर समझा

माँबाप के बहुमूल्य क्रियाकलाप 

कैसे करुँ श्राद्ध  ?

मैं कौन ? मेरा क्या अस्तित्व ?

मेरे जीवन का कौन कर्णाधार ? मैं किसका कर्ज़दार ?

एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को जोड़ती

समझाती फ़र्ज़ और बनाती जिम्म्मेवार

धर्म न्याय संस्कार से जुड़े पारिवारिक रीति रिवाज़

पुरखों की विरासत रखना संभाल

यह पर्व नहीं एक दिन का

यह तो है रोज़ का पुण्य प्रताप

कैसे करुँ श्राद्ध?

प्रेम की लता आशीर्वाद के फ़ूल खुशियों के पल्लव पितृआशीर्वाद

स्मरण वंदन हाथजोड़ चरणस्पर्श निभाते पितृसंस्कार

पृथ्वी आकाश प्रकृति मनुष्य आत्मसात होते पितृपक्ष का आशीर्वाद

जागृत करता अहसास श्रद्धा का एक फ़ूल मन में ख़िला रहे

प्रेम का दीपक एक हृदय से दूसरे हृदय में जलता रहे

विश्वास की डोर आपस में थामे धर्म मर्यादित रहे संसार

पूर्वजों की शांति में निहित स्वकल्याण का भाव 

पितरों की आत्मिक शांति हमारा संतोष निष्काम कर्मभाव

कैसे करुँ श्राद्ध  ?

यह रीत नहीं यह है भाव  

यह रस्म नहीं यह है आत्मीय संवाद

यह केवल श्रद्धा नहीं प्रेम व विश्वास का है अद्भुत संचार  

श्राद्ध पितरों को श्रद्धांजलि ही नहीं स्वयं के होने का है गौरव एहसास

वे कल थे हम आज कल जब हम भी न होंगे

हमारे अपने ही तो करेंगे हमें स्मरण प्रेम भाव

पितरो को करेंगे तर्पण तभी मिलेगी पितृऋण से मुक्ति लेकिन

पितृऋण से मुक्त होना कहाँ सबके बस की बात

कैसे करुँ श्राद्ध  ?

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हर धर्म जाति संप्रदाय को एकतासूत्र में बांधती हिंदी

हमारी आन बान और शान हिंदी

ज्ञान का अनुपम उजाला फैलाती हिंदी

कल्पनाओं इच्छाओं महत्वकांशाओं के पँख हिंदी

फट से जुबान पर जो चढ़े हिंदी

झट से जो दिल में उतरे हिंदी

हिंदी का सदा रहे मान और वर्चस्व तो जमकर बोलो हिंदी

केवल भाषा नहीं यह ये तो है खुदा की नेमत हिंदी

गणेश चालीसा

हे पार्वतीनंदन तुम्हें हार्दिक अभिनंदन I

साक्षात् रूप में धरती पर लेते अवतरण II

असंख्य रूप विराजे तुम अद्भुत प्रभु गजानन I

दर्शन शुभम मनोहारी छवि अद्वित्य सम्मोहन II

चतुर्भुज तुम्हीं करते चारो युग संचालन I

तीनों लोक तुम्हें ध्याये निशदिन हे त्रिगुण II

दुःख दरिद्र विघ्नविनाशन कृपा करो हे शिवनंदन I

शक्ति भक्ति और मुक्ति प्रदाता तुम्हीं त्रिभुवन II

काल का तांडव करे गर्जना मृत्युंजय काँपे धरती गगन I

स्वार्थ का नंगा नाच देखकर मानवता हुई जलमग्न II

खंड खंड भूमि व प्राणी हे भूपति करुणामय रुदन I

प्रकृति का हो प्रकोप या मनुष्यजनित प्रदूषण II

तमज्ञानी मानव दिशाहीन जीवन मार्ग दिखलाओ हे गुनिन I

परमार्थ पुरातन अब स्वहित का प्रचलन नवीन II

आज के स्वयंभू भूले तेरा वरदान वचन श्रीमन I

पाप और पुण्य का प्राणी करे स्वयं निर्धारण II

प्रतिस्पर्धा का है दौर मंगलमूर्ति हार जीत का मिथ्या मंथन I

लोक की परवाह नहीं परलोक का क्या चिंतन ? II

न स्व का रखता ज्ञान और न ही ईश्वर मनन I

इस नश्वर संसार में खोया भूला तुम्हीं शाश्वत भगवन II

ज्ञान को डसता अज्ञान हे देवाधिदेव कैसा भारी अपशकुन ? I

न्याय पर पड़ता भारी अन्याय का अतिक्रमण II

काल प्रकृति पृथ्वी का डाँवाडोल हो रहा संतुलन I

सर्वदेवात्मन तुम्हीं सब संभालो हम भूले अपना सदाचरण II

माया के सब पुजारी मानवता बनी दूरदर्शन I

चाकरी करे विद्वान हे विनायक चाकर विराजे सिंहासन II

कर्महीन ज्ञानहीन सतविहीन हम दारुण हुए तरुण I

गुण संचयन सब छोड़े धन संचयन पर नयन II

शक्ति बल व शौर्य का अनुचित क्रियान्वयन I

सुबुद्धि त्याग हे बुद्धिप्रिय कुबुद्धि में उलझे मन I

,इस अंधे गूंगे बहरे संसार में जीते प्राणहीन जीवन I

कलयुग के संकट अब तुम्हीं हरो संकटमोचन ? II

न सुंदर भाव न सुंदर दृष्टि कैसे होगा सुंदर जीवन ? I

हाथों से हम निर्धन बातों के हम धनी कैसे बनेंगे संपन्न ? II

ईश्वर एक सृष्टि एक तभी चले काल का चक्र निर्विघ्न I

एकता और प्रेम ही जोड़े बाकि सब भ्रम कहते श्यामदशन II

काम क्रोध लोभ मोह अहंकार का गहरा भव सागर I

तुम्हारी कृपा बिन डूबे तारों हम भक्तो को महेशनंदन II

लाज रखियो हे शुभगुनकानन हाथ जोड़ करे विनयवंदन I

तुम चमत्कारी हे गणपति बप्पा करो कल्याण सफल हो जीवन II

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जन्मदिन मुबारक हो

सुनकर “जन्मदिन मुबारक हो”

ख़ुशी और गर्व से भर उठते हम

इस पृथ्वी पर हुआ जन्म हमारा

कुछ तो किये होंगे हमने पुण्य कर्म

साल दर साल उम्र की सीढ़िया लाँघते

बचपन जवानी और अब बुढ़ापे की ओर कदम

दोस्तों परिवार नाते रिश्तेदारों ने ढेरों दी दुआएँ

“जियो जिंदगी जिंदादिल” खुश रहो हरदम

लेकिन ख़ुशी में मिले गम और गम में मिली ख़ुशी

इन आँसुओ का मोल न जान पाए हम

जन्मदिन पर केक उपहार से मनाते सब जश्न

हम चुपके से छुपाते झुर्रियां सफ़ेद बाल थका तनमन

वर्ष का यह एक दिन बड़ा चमत्कारी

कैसे हर दुःख तकलीफ़ हो जाती गुम 

पहले सब मनाते थे हमारा जन्मदिन

अब ख़ुद ही मना लेते है कर ईश्वर दर्शन

गीत संगीत के शोर से शुरू होता था जन्मदिन

अब शांति का राग अलापने को करता मन

पहले घर में पकवानों की लगती थी बहार

अब कुछ मंगवा लो या बाहर खा लो हुए सब प्रसन्न

उपहार देने की रीत हुई ख़त्म

शगुन के लिफ़ाफ़े में कैद इच्छाएँ और मन

संवेदनाएँ तो रह गयी दिल में दबकर

डिजिटल दुनिया की ताल पर चले कदम

वो गले लगाना वो प्यार वो छूना वो सिर पर हाथ

वो स्वयं आ पार्टी में चार चाँद लगाना बातों की खनखन

अब उपहार के पीछे छिपते अपने क्योंकि

जब अपने मिलते थे तो उपहार का क्या गम ?

जन्मदिन सादा अकेले या पार्टी का हुड़दंग

दिल कभी ख़ुश कभी उदास बिना प्यार के रंग

अब कोई धीरे से प्यार से छू के कह दे

“जन्मदिन मुबारक़ हो” बस बिछ जाते है जीवन के सात रंग

A TRIBUTE TO MY TEACHER

a ray of hope

a candle of wisdom

a bulb of education

a torch of competence

a lamp of knowledge

a battery of guidance

a laser of motivation

a firefly of inspiration

a fire of ambition

a star of direction

a moon of progress

a sun of enlightenment

a sum of above

a divine power on the earth

a miracle or a magic

a life builder superb

a one in all true human

a noble profession

a blessing indeed

a teacher you light my world

प्रवासी पंछियों की प्यासी यात्रा

बचपन से देखते आये विदेशों में बसे मौसी, मामा, बुआ, ताया व चाचा जो हर साल प्रवासी पंछियों की मानिंद शीत मास में भारत की यात्रा पर निकलते | खुद को अपनी धरती से जोड़ने, परिजनों से मिलने, ख़रीदारी करने, दिल में भारतीय व्यंजनों के स्वाद को चखने, भारतीय पर्यटन की सैर का आनंद लेने और ढ़ेर सारे अधूरे ख़्वाब पूरा करने के लिए उड़ान भरते |

अपने नए मिले रंगबिरंगे पंखों की चमक दिखाने और उन्हें और भी चमकदार बनाने की खातिर अपने वतन की मिट्टी के प्यार से बंधे खींचे चले आते | अपने कोमल पंख फड़फड़ाते भारत की जमीन को अपने आगमन से आ पवित्र करते |

सबसे मिलना जुलना, खाना पीना, घूमना फिरना, गल्ला गप्पों का दौर, ठहाके, हँसी, फ़ोन पर ढेर सारी बातें, मिलने मिलाने के वादे, दूसरों के लिए समय की बेबसी, पर खुद पर जी भर कर समय लुटाते | इन पंछियों की नज़र रहती हमारे दानों पर और हमारी नज़र इन प्रवासी पंछियों के तेवर झेलने में |

स्वयं के लिए एक से बढ़कर एक नए बेहतरीन वस्त्रों की खरीदारी और हमारे लिए ऊपर रखे नये में छिपे पुराने वस्त्र और कुछ पुराने वस्त्रों को “बिलकुल नए है वरते ही नहीं” बता कर काम चलाना | हमारी न औपचारिकता, न माँगे, न जरुरत, फिर भी अहसान के तले दबाना | इस सौग़ात को पाने वाले हम कितने भाग्यवान बार बार बताना |

इस छोटे से एक माह के प्रवास में अनगिनत सपनें, ढेरों ख्वाहिशें की उम्मीद पूरी करने के लिए जगह जगह इनका दाना चुगना | सब पर बड़ी दया दिखाते क्योंकि सब इनकी मेज़बानी में दिल खोल कर समय और पैसा लुटाते |

डॉलर को रुपये में बदल कर अपनी उड़ान के लिए यथाशक्ति ईंधन को भरवाना | किस्मत इन पर हरदम रहती मेहरबान, अपने पंखो को माया के रंग से रखते सदैव जो गुलजार | लो आ गयी फिर शामत हमारी | इनके सफल प्रवास, पँखो और उड़ान की सुरक्षा की बनती जिम्म्मेवारी हमारी |

न दिन का होश,न रातों का ख़्याल, समय मानो पंख लगा कर उड़ जाता इनके लिए | न इनकी ख़रीदारी की लिस्ट पूरी होती, न लोगो से मिलने का ताँता ख़त्म होता |

ढ़ेर सारे व्यंजन निगल डाले,पर दिल तो अभी भरा नहीं | त्वचा से लेकर बालों को रंगने तक, सब तरह के सौंदर्य प्रसाधन खंगाल डाले, पर कुछ भी ढंग का नहीं, हमारे स्टैण्डर्ड का नहीं मिला | इनका स्टैण्डर्ड सँभालते सँभालते हम खुद स्टैंड पर लग जाते | यह एडवांस और हम बैकवर्ड का गान सुना सुना कर हलाल करते रहते हमारी जिंदगी |

केरला से लेकर कोलकाता तक ,कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक पूरी दुनिया घुमनी है, इनको इस एक मास के प्रवास में | कभी बस, तो कभी रेल, सब खोलते हमारी निम्न स्तरीय होने की पोल और यह हमें याद दिलाते रहते हमारी जिंदगी में है सिर्फ” झोल ही झोल” |

इनके दिल रहते ठंडे इनके देश की ठंड की तरह ठंडे और हम इनकी आवभगत करते गर्मजोशी से हमारे गर्म देश की गुलाबी सभ्यता के शिष्टाचार |

कल तक जो खुद रहते थे इस देश में, आज विदेशियों की भांति देखते है भारत की गरीबी, अनपढ़ता, अस्वछता, बेरोज़गारी, भीड़, आबादी, भ्रष्टाचार, ट्रैफिक जाम, अराजकता को कोढ़ की बीमारी की तरह,न कोई हल,न इसका उपचार | यह तो है यहां का हाल | क्या प्रगति करोगे ? सब बेक़ार |

पाकर सुखद माहौल, अपनापन, प्यार-मोहब्बत, यारी-दुनियादारी, दिल होता इनका खुश क्योंकि खुद पर जी भर कर पैसा लुटाने की सिर्फ इंडिया में आती है बारी |

स्पा से सौंदर्य निखार से तरबतर पर ख़ुश्क दिल से दुनियावी रिश्ते निबाहते, जान से जहान तक का सफर, इनको देते ख़ुशी और संतुष्टि का तोहफा बेशुमार |

झटपट समेटते सब कुछ इस एक मास में, क्योंकि अब ताज़ातरीन होकर लेनी है एक लंबी उड़ान | दिल भरा,पेट भरा,सपने भरे,बैग भरे,शगुन के नोट भरे,मिर्च मसाले भरे,कपडे लत्ते भरे और उड़ गये अगले साल का वादा लिए अपने देश |

वो तो चल दिए और हमें सोचने पर कर गए मज़बूर | अरे ! हम तो सदियों से इंतज़ार में है बैठे एक छुट्टी, एक सैर, एक ब्रेक को तरसते |

सुनो जी, कभी हमें भी केरला, बेंगलूर घुमा लाओ | सुना है,बहुत सुंदर शहर है,कैनेडा वाली दीदी बहुत तारीफ़ कर रही थी | कभी हमें भी अमृतसर ,अंबाला से ख़रीदारी करवा दो और हाँ, केरला की पंचकर्म थेरेपी बहुत बढ़िया है | कभी हमें भी एन्जॉय करा दो , थोड़ी दुनिया घुमा दो |

पर फूटे हमारे भाग, घर की चक्की से न अलग हुए, न हम ,न जनाब | अर्ज़ है ! एक छुट्टी की दरकार, एक सैर सपाटे का इकरार, इक खरीदारी, कुछ भूले बिसरे रिश्तों का प्यार, इस सूखे जीवन में बेसब्री से एक रिमझिम ब्रेक का इंतज़ार |

यह प्रवासी पंछी हर साल भारत भ्रमण पर आते और हमारे अरमान जलाते | हम कुछ न कर पाते और हम हर बार हो निराश,खुद से एक वादा करते | इस जन्म न सही अगले जन्म, हम भी अपनी तमन्नायें पूरी करेंगे | प्रवासी पंछियो की भांति जीवन को तरोताज़ा करेंगे | होगी न अब यह हार, हर साल यह प्रवासी पंछी ताज़गी की तलाश में उड़ते फिरते, दुनिया घूमते और हम पिंजरे के कैदी बन अपनी विवशता पर खुद को कोसते |

वाह रे, प्रवासी बाशिंदे ! विदेश में रह तूने की ढेर कमाई, खूब धूम मचाई, डॉलर कमाया, नाम-काम कमाया, इज़्ज़त कमाई, विदेशी से शादी भी रचाई, अपनी दुनिया सफल बनायी | और एक हम है अपने देश में रहकर भी न काबिल बन सके , न जोड़ सके एक दमड़ी की कमाई |

मैं बेरोज़गार

मिली न एक अदद नौकरी

न निजी कंपनी न सरकारी

न पैसे कर सकूँ कोई कारोबार

विदेश में नौकरी मेरी सामर्थ्य से बाहर

मैं बेरोज़गार……….

न ऑफिस न पद प्रतिष्ठा न कुर्सी मेज़ न पगार

डिग्रीयों से लैस लड़ता परीक्षा के हर मौर्चे पर बार बार

वक़्त हालात व किस्मत से बेज़ार

देश पर बोझ परिवार से दरकिनार

मैं बेरोज़गार……….

खुद पर था गरुर एक दिन पहनूँगा क़ामयाबी का ताज शानदार

किस्मत चमकेगी मेरी भी मेरी मेहनत से मेरे यार

बंगला गाड़ी पैसा खुद की कमाई होगी बेशुमार

दुनिया मेरे कदमो में झुकेगी देख मेरी प्रतिभा का चमत्कार

मैं बेरोज़गार……….

झूलता रहा उम्मीद से नाउम्मीद

हौंसलो से दिलछोड़ कई बार

विश्वास से संदेह के घेरे में बार बार

पर रही मेरी कोशिशें व्यर्थ बेकार

मैं बेरोज़गार………

व्यवहार बोलचाल व व्यक्तित्व की रख पैनी धार

हर प्रतिस्पर्धा में जान लगाकर किया खुद को तैयार

लगाया बहुत धन परिश्रम समय व प्रार्थना की गुहार

लेकिन मुट्ठी भर नौकरी आते हज़ारों लाखों की अर्जियों के अंबार

मैं बेरोज़गार……….

हर दफ़्तर कार्यालय पर दी दस्तक

न कोई सुंनने समझने को तैयार

कहीं रिश्वत कंही सिफ़ारिश कंही जीहजूरी कंही बुरा व्यवहार

दुनिया मेरी क़ाबलियत पर लगाती प्रश्न बार बार

मैं बेरोज़गार…….

न काम आई क़ाबलियत न मेहनत

न हुनर न कौशल करते रहे मुझे सब विफल बार बार

कंही क़ाबलियत से ज़्यादा दिखी कमज़ोरी सुनाया बन होशियार

छाँटते उत्तम में से सर्वोत्तम खोजते कंही मैं तो नहीं “अपशकुन” का तार ?

मैं बेरोज़गार…….

क्या करुँ समाज का उपेक्षित हिस्सा हूँ ?

बिना रोज़गार मैं पढ़ालिखा पिस्सू हूँ

मुफ़्त में सब देते हिदायतें आश्वासन भरोसा बार बार

इस देश में मिलता है सब कुछ नहीं मिलता एक ढंग का रोज़गार

मैं बेरोज़गार…….

न जाने कैसी दुनिया न जाने कैसे लोग

न जाने कैसा दुनिया का कारोबार

भीख रोटी कपड़ा पैसे सब दे देते है

पर नहीं देते सम्मान से जीने का अधिकार

मैं बेरोज़गार…….

परिवार समाज व देश का निशाना हूँ

पढ़ा लिखा होकर भी दुनिया से बेगाना हूँ

बेरोजग़ार को न इज़्ज़त न प्यार न जीने का हक़ हट गैरज़िम्मेदार 

सबसे महरूम सबसे नज़रअंदाज सबकी दया के झेलता प्रहार

मैं बेरोज़गार…….

समाज की आँख की किरकिरी बन गया हूँ

चलता फिरता पुर्जा यही रह गयी अब मेरी पहचान

दर दर की ठोकरें खा पक चुका नौकरी है बस एक ख़्वाब

शरीर घिसते घिसते हो गया हूँ शर्मसार

मैं बेरोज़गार…….

परिवार लोग समाज लेते रहे सब कड़ी परीक्षा  

तोड़ते रहे मुझे व मेरे आत्मविश्वास को बार बार

जब तक हाथ में न हो काम व जेब में पैसों की भरमार

तेरी सब शिक्षा बेकार तेरा अस्तित्व डूबने के कग़ार

मैं बेरोज़गार…….

डर डर कर जीता हूँ मर मर कर सब सहता हूँ

खुद से खुद का बैरी हो गया हूँ

समाज की कुव्यवस्था पर ग़हरी चोट बन कर रह गया हूँ

“बेरोजग़ारी-एक ज्वलंत प्रश्न” पर रहता हूँ चर्चा में मेरे सरकार क्योंकि

मैं बेरोज़गार…….

जन्मदिन का उपहार

हर वर्ष तुम्हारे जन्मदिन पर सोचा

तुम को दूँ कुछ अच्छा सा सुंदर उपहार

सबसे अनूठा सबसे अनोखा सबसे शानदार

सोच विचार के समंदर में डूबती तैरती रही हर बार

न ले सकी निर्णय न ही खरीद पायी कोई उपहार

जन्मदिन पर उपहार ही तो दर्शाता है देने वाले का प्यार

सर्वप्रथम सोचा तुम्हे दूँ बड़ा सा ख़ुशनुमा

तुम्हारी पसँद के फ़ूलों का सुंदर सा गुलदस्ता

पर जो स्वयं में है फ़ूल सी नाज़ुक गुलाब की पंखुड़ी

मेरे आँगन की चलती फिरती ख़ुश्बू की बगिया

उस निराले फ़ूल को कैसे दूँ फ़ूलों का गुलदस्ता उपहार

फ़ूल पर करुँ फ़ूल न्यौछावर क्या सही है यह व्यवहार ?

फिर याद आया चॉकलेट केक और तुम्हारी मनपसंद मिठाई

सुंदर आकर्षक मीठी ज़ायकेदार भेंट

पर तुम्हारी चॉकलेटी मुस्कराहट के आगे

फीकी पड़ गयी यह सबसे स्वादिष्ट भेंट

इस बार पक्का नई सुंदर सी फैशनेबल पोशाक दूँगी  

खिल उठोगी तुम पाकर रंगबिरंगी ड्रेस का उपहार

पर तुम्हारे अप्रतिम सौंदर्य से मेल खाता

न मिला पहरावा न गरिमामय परिधान

फिर सोचा इस बार आभूषण पर हाथ आजमाती हूँ

खूब सुंदर लगेंगे तुम पर तुम्हे खुश कर जायेंगे

पस्त पड़ गए मेरे हौंसले जब देखा तुम्हरा स्वर्ण सा रूप

सोने जैसा दमकता तन चांदी जैसा उज्जवल मन

मेरे आभूषण की चमक उसके तेज़ के सामने पड़ गयी मंद

अब की बार देखना पक्का जीत जाऊँगी

जब विदेश भ्रमण के लिए तुम्हें ले जाऊँगी

पर तुम ठहरी तपस्वनी ज्ञान और कर्म को समर्पित

विद्याभाव छोड़ कही न जाती

जो विद्यार्जन में हो लीन उसे कैसे घुमाती

मेरा यह विचार भी निरर्थक गया

मेरी उलझन कम न हुई कैसे जीतू तुम्हारे दिल के भाव

आखिर बचा एक विकल्प शगुन से काम चलती हूँ

अपने प्यार का फ़र्ज़ निभाती हूँ

लो फिर हो गयी वही बात तुम जीती में हारी

जो स्वयं में हो साक्षात लक्ष्मी स्वरूपा

लक्ष्मी को लक्ष्मी देकर कैसे रिझाऊं ?

अब मैंने भी मन में ठान ली इस बार हार न मानूँगी

तुम्हे उपहार देकर तुम्हारे मन में खास जगह बना लूँगी

पर जब जब तुम्हें देखती हूँ

अपनी सोच और मूर्खता पर हंसती हूँ

जो स्वयं में है अनुपम अनमोल अद्भुत उपहार

उपहार” को उपहार देकर कैसे करुँ भाव का इज़हार

इस सारे प्रयत्न में मैंने एक बात छुपाई

मेरे मन के भावों की सच्चाई मेरी ज़ेब से न छुप पाई

जन्माष्ठमी का पर्व

त्रेता युग का अंत द्वापर युग का आरंभ

अत्याचारी कंस के पापों का बढ़ा आतंक

धरती को पापमुक्त करने का ले संकल्प

विष्णु के आठवें अवतार ने लिया कारागार जन्म

भाद्रपद की अष्ठमी तिथि व रोहिणी नक्षत्र

श्री कृष्ण जन्मे मथुरा बन देवकीवासुदेवनंदन  

यशोदानंद हर्षाये पाकर बाल गोपाल में प्रभु के दुर्लभ दर्शन

माखनचोर करते सुन्दर बाल लीलाएँ माँ यशोदा को रिझाते नटखट कमलनयन

माता पिता का करे आदर खुद के जीवन से समझाया वही तेरे भावन

खेल खेल में कन्हैया ने काली नाग व पूतना जैसे पापियों का कर दिया अंत

सुदर्शनचक्रधारी श्री कृष्ण ने मथुरानरेश कंस का कर वध पृथ्वी को किया पापमुक्त

अनगिनत दिव्य रूप गोवर्धन धराय मुकुंद मदन लड्डू गोपाल  कंजलोचन मधुसूधन

बंसरी बजईया मोरमुकुटधारी गैयन रखवार कान्हा लीलाधारी पाकर वृंदावन हुआ धन्य

चौंसठ कला संपूर्ण बांकेबिहारी सखियों संग रास रचा रखे सबका मन प्रसन्न

जन्म जन्म का सच्चा प्रेम राधेमोहन पायो बन प्रीत का अद्वित्य उदाहरण

रुक्मणि संग ब्याह रचा श्रीकांत संसार की रीत के भी चले संग

गोविंदा गोपियों संग कर शरारत समझाते रहो मोह माया के बंधन से मुक्त

साँसारिक चीज़ो का मोह व्यर्थ त्याग बलिदान तपस्या सादा जीवन रहे अंग

प्रेम भक्ति संगीत कला सौंदर्य व वात्सलय का रूपमाधव जीवन में भरे सद्गुण

निर्धन सुदामा के तंदुल स्वीकारे निर्बल पांडवों की मदद करी धर्म परायण श्री नारायण

पार्थसारथी की भूमिका में अर्जुन को समझाया धर्म व न्याय का सनातन मार्ग चुन

गीता का उपदेश दिया केशव कर्म का सच्चा मार्ग अपना अर्जुन यही तेरा प्रण

कभी न माने हार लड़नी सबने अपने हिस्से की महाभारत स्थितप्रज्ञ बन

रहे स्वयं निरंजन शक्तियों का न करो दुरुपयोग तभी होगा पथ सुगम

क्षमा सबसे बड़ा गुण पर अति होने पर शिशुपाल का कर वध बने धर्मरक्षक

स्त्री का सम्मान पुरुष का परम कर्तव्य द्रौपदी चीरहरण में रखी लाज तुम्हींपुरुषोत्तम

सर्वज्ञ सर्वत्र सर्वशक्तिमान निर्गुण दिव्य रूप में धरती पर सदैव विद्यमान नाथजगन्न

श्यामसुन्दर का जादू सम्पूर्ण जगत पर चले कौन करे इसके विपरीत गमन ?

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

प्रभु से साक्षात्कार

मैं प्रभु समक्ष खड़ा था

मंदिर में लोग प्रभु दर्शन के लिए आ जा रहे थे

प्रभु प्रत्यक्ष रूप में मेरे सामने थे

अपने सुंदर दिव्य भव्य अलौकिक मनोहारी रूप में

ईश्वर के साक्षात् दर्शन का अहसास मुझे जड़ कर रहा था

मैं विस्मित था और प्रभु शरारत से मुस्कुरा रहे थे

बता दे दुनिया को हमारे मिलन की बात

पर मैं खुद आश्चर्य असमंजस व आनंदित भाव से प्रभु को देख रहा था

दुनिया कैसे विश्वास करेगी ?

हमने तो कभी नहीं देखा प्रभु

बस सबने कहा तो मान लिया

कभी ध्यानपूर्वक गौर ही नहीं किया

पर आज मैं ईश्वर को नहीं ईश्वर मुझे देख रहा था

मैं तो प्रभु की दृष्टि से खुद को बचा रहा था

प्रभु का तेज सौंदर्य प्रेम निश्छल भाव हर भक्त के लिए एक जैसा

मेरे जीवन की कलुषता कंही मेरी दृष्टि से प्रभु को मलिन न कर दे

मैं आंख नहीं मिला पा रहा था

यह मेरा भाव था

परन्तु ईश्वर तो ईश्वर है

प्रेमपाश में बंधा खड़ा था

मुझे लगा भक्त होना बड़े गर्व की बात है

पर मैं नाचीज़ मेरी क्या औकात मैं अभागा कँहा प्रभु की कृपा का हक़दार ?

मैं भी चुपचाप सबकी तरह दर्शन कर कर निकल जाऊंगा

और मान लूँगा ईश्वर सब जगह सब के लिए है

लेकिन यँहा मेरी कुपात्रता प्रभु के मेरे सामने होने के विरुद्ध थी

प्रभु ने चुपके से मेरे कान में कहा

“जो मुझे जैसा देखेगा मैं वैसा दिखूँगा”

स्पष्ट भाव निश्छल प्रेम निष्काम भक्ति मुझे बांधे सदैव

यह सब हो तो बिना मोल के मैं बिक जाऊंगा

प्रभु के दृष्टिउत्तर मुझे और कमजोर बना रहे थे  

क्या कह रहे हो प्रभु ?

मैं तो सदा ही आपके समक्ष नदारद था

मेरी मूर्खता अयोग्यता अज्ञानता की कोई सीमा न थी

मेरा अकर्म तो सबको ज्ञात था

संसार के ज्वार भाटे में उतार चढ़ाव करता मैं निरीह बेबस प्राणी

मैं कब भक्ति के रंग में खुद को रंग पाया ?

दुर्बल देह व कमजोर मन का जीव मात्र

लोगो के लिए हँसी व्यंग व मज़ाक का विषय था मैं

जब जब इस निष्ठुर दुनिया ने मेरा दिल दुखाया तभी तेरे पास आया

खूब रोया खुद को कोसा दुनिया में प्रभु मैं क्यों आया ?

भीगे नेत्रों से तुम्हें कहाँ देख पाया ?

अपने अस्तित्व को लेकर जो संशय पाले

नाग की भाँति डसते रहे मुझे मेरे कर्मफल के बुने भ्रम जाले

मुझे याद नहीं पड़ता कभी मैंने प्रभुभक्त्त होने का रिश्ता निभाया

मैं शर्म से सार सार हो रहा था

प्रभु मंद मंद मुस्कुरा रहे थे

प्रभु का मूक संवाद मुझ पर भारी पड़ रहा था

तू हमेशा दुनिया और दुनियादारी से अपना मन मैला करता रहा

पर तूने सदैव अपने कर्तव्यों को व मुझे दूषित होने से बचाया

जिसने अपने कर्तव्यों की और मेरी सदैव रखी लाज

मैं भी सदैव उसकी रखता लाज

न तेरी उपस्थिति चाहिए थी मुझे बार बार

न तेरे झूठे आडंबर रीत रिवाज़ के अंबार

जिसने स्वयं में मुझे और मुझ में स्वयं को पाया

वही तो अपना जीवन सफल कर पाया

जिसने संसार की परवाह न की  

मेरे ध्यान में सच्ची कर्म भावना में पवित्र हृदय से मुझ में रहा ली

वही प्राणी मेरे साक्षात दर्शन कर पाया

प्रभु के अद्भुत वचन ने मेरे मन का मैल धो डाला फिर बोले

हे मनुख मैं तेरे हर रुदन को जानता हूँ समझता हूँ

प्रभु ने मेरी मौन प्रार्थना के संकेत दिए कहा

इस संसार ने तुझे ही नहीं मुझे भी खूब रुलाया है

अपनी रची कृति ने ही मुझे पाप का अंत करने को धरती पर बार बार बुलाया है

सतियों के सत बचाने पापियों से मुक्ति दिलाने मैं ही हर युग में अवतरित होता आया हूँ

मैं कब तुमसे जुदा हो चैन की बंसी बजा पाया हूँ ?

सृष्टि को चलाना अब मेरे बस की बात न रही

तभी तो कलयुग के अंत का विचार मन में लाया हूँ

पहले एक पापी कंस था जिसका वध कर धरती को बचाया था

पर अब हर प्राणी कंस बनने को तुला कृष्ण को सबने भुलाया है 

कृष्ण या कंस पुण्य या पाप धर्म या अधर्म

न्याय या अन्याय संपूर्ण जगत ही भरमाया है

सुन ईश्वर की हृदय वाणी मेरा दिल भी भर आया आंख बंद की ही थी

तभी पूजा की ध्वनि के बाद पड़ी अमृत वर्षा की बूंदों ने मेरा ध्यान कर किया भंग

प्रभु अपनी दुनिया में और मैं अपनी दुनिया में पहुँच चुके थे

प्रभु मिलन का यह क्षण मेरे हृदय में अंकित हो चुका था

मैं निश्चिन्त था प्रेम भाव से बढ़ कर कुछ भी नहीं

परम सत्य से अवगत हो कर एक सुखद अहसास से भर गया था

आज इस कच्चे प्रेम ने सच्चे प्रेम से साक्षात्कार करा दिया था

जय श्री  कृष्ण जय श्री  कृष्ण जय श्री  कृष्ण

बूझो तो जाने ?

हर वर्ष हर मास हर बार

जो गरमागरम नमकीन व्यंजन परोसा

क्या आप अंदाज़ा लगा पायेंगे ?

जिसने जीता हमारा भरोसा

तिकोना ताज़ा तुनकमिज़ाजी तीखापन

देख तबियत हुई तब्ब्सुम

आलू पनीर मटर या चिकन

विभिन्न भरावन का चटखपन

गर्मागर्म महकती खुशबू

मुँह में भरता पानी जब हो इसके दर्शन

हर बैठक सभा भेंट जश्न पार्टी उत्सव

मौके बेमौके की रखता टशन

जितना इससे मुँह मोड़ा

फिर से आ मुँह के स्वाद में घुलता बेशर्म

होता जब लाल हरी चटनी के संग

देता पटखनी इसका कुरकुरापन

अकेले दुकेले दोस्तों का हुड़दंग घर परिवार संग

बात न बनती तब तक

जब तक इसके स्वाद में न रंगते हम

हाय फ़ास्ट फुड का जमाना

हमें नहीं खाना कहते सब

सिवाय जीभा स्वाद के क्या है

इसमें अनोखापन निरालापन ?

भारतीय परंपरा का वाहक

अनेक रंग गुणों व आकार का कुरमुरापन

भूख छोटी हो या बड़ी

तृप्त करता तन मन आत्मा अंतरंग

कितने व्यंजन इसकी प्रतिस्पर्धा में आये और चले गए

पर छूटा नहीं इसका

करारापन तीखापन चिकनाहट भरा अपनापन

अंग्रेज़ छोड़ कर चले गए

पर इसने न छोड़ा हमारा घर आँगन

भले हो टी -स्टाल कॉलेज कैंटीन ढाबा होटल

फिल्म थिएटर रेस्त्रां या बस स्टैंड रेलवे स्टेशन

सब जगह रखता रुतबा अपना

सबकी जरूरत सस्ता नाश्ता पेट में भारीपन

अरबी फारसी देश से आया

लेकिन हर भारतीय के दिल पर छाया

दुनिया में इसने बहुत नाम कमाया

विभिन्न नामों से गया बुलाया

छोटे हो या बड़े बच्चें हो या बूढ़े

करते रहते इसका गुणगान

कितने सारे उदर कर डाले

पर भरता न मन का बाँकपन

अब तक जान चुके होंगे

इस गुस्ताख़ का हमारे दिल पर अतिक्रमण

समोसा है सबकी जान बरख़ुदार लुत्फ़ लेना जरूर

सभी व्यंजनों में है नामचीन

इसकी जीहजूरी हमारा परमधर्म