Republic day

India celebrate Republic day

26 January our historical day

Democracy our pride we say

Constitution of India adopted in formal way

India commemorate unity in diversity the world envy

Joy of freedom a memorial day

Tribute to freedom fighters a remembrance day

Never forget the price of freedom we pay

Flag hoisting by President honours the day

Grand Parade at Rajpath in ceremonial way

The three Army Chiefs salute the flag the glorious day

Tableau from various states and national messages portray

Cultural programme of school children grace the day

Panorama of progress and prosperity amazingly convey

India‘s military might proudly display

Showcase of flowershower by planes on the glorious day

Patriotic fervour at peak create the magical sway

Citizens rejoice with enthusiasm to mark the day

Sovereignty integrity solidarity all Indians obey

Indians pledge for allegiance and fidelity to make the day

National anthem conclude the phenomenal day

We Indians are one and will remain one no one can betray

Blog writing

Dear friends I am really grateful to you for this journey of becoming a blog writer. Actually the passion for writing started on 24 January 2018 when I wrote my first article on “an NRI visits to India”.The sudden shift from teacher to mother, then mother to astrologer and then finally to writer(please God, forbid me, no transformation want after this).Believe me it was not at all an easy journey.I always wanted to say something but never get that ground or platform and people to listen to me.Maybe this inner force took me to this journey of writing.When I started writing it was the simple gesture of sharing and connecting myself to my friends the feelings of ups and downs of my life I was going through. I never forget this thought that I don’t have to become a professional and competent writer but a simple narrator.I am a very simple hearted woman and follow simplicity in my life too.So the attempt was to write anything(absurd,weird,rubbish) in any manner but write,write and write, Manju, everyday about what you feel and visualize about others.

Initally my writing was lengthy,worthless,meaningless,scattered and very poor.Now after two years of this journey, I am able to capture my thoughts properly and can pen them down on paper systematically.The rough drafts to fair ones were formed in constructed and well mannered after rigorous practice.I always tried to write down on burning issues ,current events and interesting life matters.Whatever I noted down in my diary I kept on sharing with you, firstly through hand written notes on whatsapp,then audios and then all of you pushed me to this great digital platform of blog writing.I took your suggestion seriously and reached here on this big portal of social media with your blessings.You kept reading my thoughts through my writings and I kept on moving smoothly after getting your encouragement and inspiration.This mutual exchange brought some wonderful results in the form of blog writing which came into existence formally on 7 April 2019.

Now because my writing journey has completed two years today (24 January 2020).So here I am to thank you all for making my journey delightful,fruitful and meaningful.It has given me immense pleasure of writing and has provided me tremendous personal growth that I can’t explain in words except that it made me a total different person what I was two years before and blessed me with a total new outlook to see the world.You have dug out a writer from a very simple human being that I never ever imagined in my life.

Whatever I wrote I got the strength of writing from super power which I strongly believe in.It was the real divine power that helped and forced me to write in a particular manner.I wrote all the plights of life and some were answered beautifully.I delivered the writing grace exactly the way I got it from God to my dear ones.So the mutual exchange with God was phenomenal I can say.

To become a blog writer you need ample time,empty mind,ready to capture new thoughts,meditation to focus,knowledge of the subject and good vocabulary.One of the most important ingredients is you “yourself”.You should be detached from the world to write about the world.The credit goes to you dear friends for showing me the correct direction and channelizing my energy and potential.As I am on my way to a new learning path to become a good narrator.

My dear friends,I wrote this kind and heartfelt note to acknowledge and thank all of you who became the part of my writing journey and made it worthwhile.Please keep guiding,motivating and inspiring me in future too as you did in the past.If I didn’t get your love,support and consideration,I will be alone in my endeavors.

Stay happy,together and blessed I wish for my friends and my blog journey.

With love and regards

Manju Kavya

मन की पतंग

पतंग हो या मन

उड़ने को बने

किसी का न चाहे संग

आकाश में विचरते हो मलंग

सीमाओं को लांघते

वर्जनाओं को तोड़ते

दुनिया को पीछे छोड़ते

अभिलाषाओं के लगा पंख

छूने में है नाज़ुक

कोमल है अंग

रंगों और कल्पनाओं से भरे

उमंगो और उम्मीदों से सजे

क्या धरती क्या आकाश

मज़े से उड़ते स्वछंद

हवा लगी तो उड़ गए

ढील दी तो मुड़ गए

घमंड से भरे तो फूट गए

नज़र लगी तो टूट गए

किसी के हाथ न आते

दृष्टि से हो ओझल लुप्त हो गए

स्वार्थ की कच्ची डोर से बंधे

तो छिटक जायेंगे

प्रेम की पक्की डोर से बंधे

तो दूर तक जायेंगे

जानते है गर हाथ से छूटी डोर

या शरीर से छूटा मन

अनंत रास्तों में गुम हो जायेंगे

कसकर पकड़ना

पतंग हो चाहे मन

उड़ने की कीमत

कटकर न चुकायेंगे

अपनी क्षमताओं को देंगे पूरा आकाश

लक्ष्य पाने को सदैव प्रतिबद्ध

हर बार नयी उड़ान भरेंगे

उड़ने के जज़्बे को न भुलायेंगे

दुनियावी हवा रोकेगी

ख़ूब ऊँचा उड़ेंगे

आवाज़े पीछा करेंगी

हौंसले बुलंद होंगे

हालात विपरीत मिलेंगे

लड़कर आगे बढ़ेंगे

जब तक आकाश को भेद न लेंगे

चैन का लेंगे न दम

घर लौटकर फिर उड़ेंगे

बेख़ौफ़ जीने का ढंग

पतंग को बना मन या

मन को बना पतंग

अनदेखी अनछुई जगहों पर करेंगे भ्रमण

आकाश का करेंगे आलिंगन

कागज़ की पतंग या

दृश्य शरीर का अदृश्य मन

दुनिया से रहते बेपरवाह

जान की बाज़ी लगा जीतेंगे जंग

एक छोर धरती तो एक छोर आकाश

दोनो का अद्भुत मिलन

अपने अस्तित्व को भूल

काल को देंगे चुनौती

आज एक होकर

उड़ेंगे संग संग

लोहड़ी

नव वर्ष का शुभारम्भ 

प्रकृति में नव स्पंदन

शीत ऋतु प्रचंड

कड़ाके की ठंड

पारा हुआ न्यूनतम

सूर्य देते नव जीवन

साल का पहला त्यौहार

13 जनवरी लोहड़ी

ईश्वर महिमा का वंदन

हर्षोल्हास के संग

प्रकृति का करते भाव अभिनन्दन

नया साल नव ऋतु आगमन

नयी खुशियों का प्रथम जश्न

चारों दिशाओं में नव ऊर्जा का आगमन

उत्तर में लोहड़ी तो दक्षिण में पोंगल

नवान्न के स्वागत का पारम्परिक उत्सव

लोहड़ी संग मनाते

मकर सक्रांति का पर्व

सूर्य हो जायेंगे उत्तरायन

शुभ कार्यों का क्रियान्वन

त्रिवेणी स्नान ध्यान पूजन दान का प्रचलन

धार्मिक कार्यो से ईश्वर स्मरण

लोहड़ी शीत की विदाई और

मकर सक्रांति शुभता के साथ आई

त्यौहार संग-साथ मनाने का भाव

मिलजुल कर प्रेम और भाईचारे के साथ

सब से जुड़ो सुख दुःख बाँटो

प्रकृति किसी एक की नहीं

सबकी शुभचिंतक साथ चलने में भलाई

त्यौहार तो एक बहाना है

मन से मन का जुड़े भाव

खुशियों का पर्व संग मनाना है

ठंडे पड़े जीवन को स्नेह ऊष्मा से संवारना है

तो मिलकर सब बोलो

लोहड़ी और मकर सक्रांति की बधाई

ईश्वर आये दरिद्र जाये

दरिद्र की जड़ चूल्हे पाये

इस मनोकामना संग लोहड़ी के गीत गाये

लोहड़ी की अग्नि को करे समर्पित  

तिल मूँगफली गुड़ गच्चक मिठाई 

प्रेम से बड़ा आशीर्वाद कोई न मेरे भाई

श्रेष्ठ देवे श्रेष्ठ पावे

श्रेष्ठ जीवन का कर्तव्य निभाए

रेवड़ी मूँगफली संग प्रेम को बांटे प्रेम समेटे

नाच गा ढोल बजा के मीठी बोलियाँ गाये

गिले शिक़वे वैर विऱोध सबकुछ भुलाना

ईश्वर का शुक्राना आनंद से मनाना

लोहड़ी की सब को लख लख बधाई

लोहड़ी की सब को लख लख बधाई

प्याज़ करे दिल पर राज़

प्याज़ जो कहलाता सब्जियों का महाबली

गर बाज़ार और रसोई इससे हो जाये खाली

घर और दुनिया में मच जाय ख़लबली

कहने देखने को लगती सब्ज़ी बड़ी मामूली

पर दिल दिमाग़ और जीभ को लगती बड़ी भली

कर दे स्वाद सूना और बेजान खाने की थाली

सारी सब्जियाँ इस एक अकेले खली पर डुली

शाकाहारियों की जान प्याज़ पर न्यौछावर हो चली

इसके आगे बड़े बड़े लोगो की एक न चली

खाने में इसके न हो दीदार तो जिंदगी लगे खोखली

प्याज़ की कहानी कभी कड़वी कभी स्वाद की कली

इसकी परतों में मिली प्यार की सौगात निराली

कभी कच्चा कभी पका कर पायी सेहत की खुशहाली

ढ़ेर सारे आँसू ढ़ेर सारी रुलाई प्याज़ की प्रीत न गयी टाली

कभी चंपा कभी बन चमेली प्याज़ करता रहा हमसे अठखेली,

प्याज़ काटते काटते कट गयी जिंदगी अब उम्र हो चल

पर न भरा हमारा मन न छूटी बाजार की गली

इसकी सोहबत में ढूंढ डाले कई राज शक्तिशाली

प्याज़ के जब बुरे दिन आये हालत हो गयी सबकी पोली

इसने लोगो के छक्के छुड़वाए किसी की दाल न गली

भाव और तेवर दिखा कर बना घमंडी ओ हमजोली,,,

नेताओं ने लगा नमक मिर्च और प्याज़ का तड़का स्वयं की सुध ली

और देश की सियासत को बना दिया दाल फ्राई की पतीली

देसी हो या विदेशी प्याज़ की कीमतों ने आसमान छू ली

प्याज़ सबको रुला हारता रहा कभी था यह हमारा ब्रूस ली

कभी होता महंगा कभी होता सस्ता महंगाई की मार झेली

प्याज़ आदमी की भूख देख हँसता बेचारी जनता भोली भाली

एक प्याज़ का मोह न छोड़ सके कम्बख़्त देनी पड़ी कीमत मुँहबोली

क्या छोड़ोगे दुनिया और पाओगे खुदाई आज का आदमी कितना नकली

कोई न जाने किसने यह भयंकर चाल चली

नया साल मुबारक

घडी की सूईंयों ने जैसे ही बजाये बारह

नाच उठा मन मचाया सबने शोर

नया साल मुबारक़ हो सबको

नव वर्ष का बज उठा नगाड़ा  

हर जुबां से निकला अभिवादन प्यारा

नए साल के उद्घोष से हर्षाया जग सारा

जन जन ने यह संदेसा अपनों तक पहुँचाया

वक़्त बदला साल बदला बदल गयी तारीख़

लो फिर आ गयी नए साल के स्वागत की रीत

पुराने को बिसार नए के स्वागत में जुटा संसार सारा

नए के बंधन में बंधना चाहते सब  

मैं भी बंधूगा नये से मन ने हमें खूब धिक्कारा

नव की बजी घंटी नव सूचना मिली

क्या नए को पाने में छोड़ना चाहोगे

पुराने विचार पुरानी सोच पुरानी जीवनधारा ?

वाह देखो साल बीस बीस

वक़्त आज नए अंदाज़ में चल कर है आया

क्या खुद के अंदाज़ को चाहेगे बदलना

या राग अलापते रहोगे नए नए का ?

पर छोड़ोगे न रिवायतों की मोहमाया

पुरातन का प्रचलन तो सबने नकारा

वक़्त ने हमें एक नज़र भर देखा

अब तो कुछ नया कर कुछ नये नये प्रयोग

बढ़ा हाथ अपना नए अवसर की खोज

नए के लिए छोड़ना पड़ता आराम का सहारा

गर फिर भी चलना चाहता प्राचीन की जमीन 

तो पुराने संदूक में से निकाल ओढ़ ले

अपने अनुभव ज्ञान कौशल की पुरानी दुशाला

और नए लक्ष्य को साध रख पैनी नज़र का भाला

नहीं तो कर नव का सृजन क्योंकि नव की है दरकार

बना नवीन संसार नयी संस्कृति का आधार

नए लोगो से मिल नव ऊर्जा का विस्तार

पुराने में मेहनत कम और नए में ऊर्जा की खपत

चुन ले कोई एक राह अपनी शक्ति समर्थ

पुराने से कर सिंचन या नए का कर चिंतन

दोनों में मिलेगा तेरे कार्यो का आंकलन

तेरी प्रतिभा का होगा सुंदर दोहन

नया सदैव उसका हुआ

जिसने नव युग की करी कल्पना नए दृष्टि कोण संग

मेहनत लगन और निष्ठा से बढ़ाये जिसने कदम

इतिहास लिखता उसी का नाम स्वर्णिम अक्षर

जो नए से गढ़ते दुनिया और नए नियम  

काल की गोद में हुआ आज साल 2020 का जन्म

हर्षित मन पुलकित तन प्रेम की तरंगों का आगमन

कर स्वागत नए साल का अद्वित्य मुस्कान के संग

METAMORPHOSIS OF HUMAN LIFE

The process of human life is to make progress from animal form (selfish energy) to bonafide/universal figure (selfless energy/divine energy).Let’s see how the human life takes turn while going through various stages of life cycle to achieve the real goal of life i.e. to work for supreme God, to work for brotherhood and to work for oneself.

This quality of humility makes certain people unique in the crowd. Every life which takes birth on this Earth, fights for its survival and dies.But the same life is different for some people.They are born for the great cause.They not only rise high in life but create history and become popular.They know their self potential and build an attitude of humility “Live and Let Live”.

It seems so easy but quite difficult to follow.As human nature is selfish because man is just like an animal in certain ways.They work against this selfish mode and utilize their inner power to move in right and positive direction.They try to remove all human indifference and form the great human chain.They enhance their qualities and virtues irrespective of their limited resources and dire circumstances.They take the life as a challenge and work for the welfare of their society.

Stage:1

 ANIMAL : AN I MAL :AN(ONE) I(SELF)  MAL-(BAD)

AN(ONE SELF)  I(EGO)  MAL (WRONGFUL)

(A man is considered equivalent to an animal as he is driven by selfish energy.)

(Here selfish energy is prominent and dominant.)

Stage:2

MAN : MANUAL WORK / MACHINE WORK

(Here some of his selfish energy is used for physical work to survive)

Stage:3

GENTLEMAN : GENTLE MAN / MENTAL MAN

(One trait that makes him different from an animal is his brain.)
(Here his selfish energy is used for mental development too)

(Education is a big tool that helps him in moulding into selfless person )

(This stage makes him aware of oneself,the others and the environment)

Stage:4

HUMAN BEING : HU(GE) BEING / HUMBLE BEING

H (HARMONIOUS) U (UNIVERSAL) MAN  BE(BENIGN)IN(GROUP)

HUM (WE) + AN (HIS OWN SELF)= HUMANE

(He is a self dependent,confident and self focused for his mission and passion.)

(His selfish energy is utilized in constructing him as a strong,positive and compassionate man.)

Stage:5

HUMBLE : HUM(WE) BLE(ABLE)

 HUMANIST ABILITIES

(Here Self is fully awaken as he is ready to accept all challenges and possibilities.)

(He possesses all human qualities love,care,share,compassion,cooperate,connect,kind,honest,courteous,friendly etc. that makes him a true gentleman.Here his persona becomes wider, better and brighter.)

Stage:6

DIVINE MAN : DIVINE(SUPREME POWER) MAN(HUMANE)

(Here the world is fascinated by his charisma.He becomes a divine figure in the form of a simple man.Some does this journey with inborn talent or god gifted and some does this journey by awakening those divine power within their body.)

(He rises from a common man to become an extraordinary man and a light house for others.)

SUPER HUMAN BEING

SUPER(DIVINTY) HUMAN(HUMANITY) BEING(HIS SELF)

The tough stages of human life makes a common man to rise from selfish mode to selfless mode.Here the journey of life is accomplished with a very positive goal like you want to give your best to the world. .His life cycle moves from animal to man, man to human, human to super human being.It exactly works like an immature stage to a mature stage of life cycle to make him a complete man.He looses his own selfish energy and becomes selfless universal energy.The whole process is not to stop anywhere but keep polishing oneself till you reach your destination. He needs supreme power not only for his own strength but for the betterment of the society.So we can see how a selfish energy man can transform oneself to a selfless energy man to make a big difference in his life.

The combination of three energies together(self energy,mass energy and divine energy) result into the great positive movement of the world.For example the revolt of 1857,India’s struggle for freedom ,Chipko movement etc.

This stage also explains about the evolution of a simple man towards the making of a person who is above all the cardinal sins and is bent upon working selflessly for the society. When he gains the will power by believing in God and in oneself and works with different perspective that is beyond the imagination of a normal human being. The results are tremendously fruitful.These outstanding people, who achieve their goal of life with sheer hard work and dedication, are entitled as legendary and they do their duty for the big change required in the society.

“A MAN LIGHTS UP HIS OWN LIFE TO BRIGHTEN UP LIGHT IN THE LIFE OF OTHERS”

SELF ILLUMINATION IS A MUST CONDITION TO ACHIEVE ANYTHING

AS YOU CANNOT BE GUIDING LIGHT FOR OTHERS

IF YOU DON’T POSSESS SELF POTENTIAL ENERGY”.

The journey of ‘I’ in becoming ’we’

Here the salutation also changes as the person grow higher and higher in life.

Stage1:ANIMAL(MALICIOUS/MAL/MALICE/MALPRACTICE)

Stage2:MAN(HEY/HELLO/EXCUSE ME/BROTHER/SISTER)

Stage3:GENTLEMAN(SIR/MADAM,MR/MRS)

Stage4:HUMAN BEING(DEAR SIR/MADAN, LADIES/GENTLEMAN)

Stage5:HUMBLE(RESPECTED/HONOURABLE SIR/MADAM)

Stage6:DIVINE MAN(SUPER HUMAN BEING)

(SHRI,DR.FATHER,MOTHER,DADA,PANDIT,GURUDEV,MAHATMA,SWAMIJI,)

           To sum up,we have great and huge example of those people who rose from common person to become legendry figures like Guru NanakDev,Mahatma Gandhi,Swami Vivekanand,Sri Aurobindo,Mother Teresa,Guru Rabindranath Tagore,Dr.S.Radhakrishnan,Babasaheb Ambedkar, Baba Amte etc.

All these divine people work on the principle of “Vasudhaiva Kutumbakam” which means “the world is one family.”We are the souls of one supreme soul.We are the children of one God.We are one. We are human beings.”

So “live and let live” this common phrase becomes quintessential and needful in present era.

Thanks

2020 की पुकार

वक़्त ने बढ़ाया सुनहरा नया कदम  

नये साल बीस बीस का आगाज़ शुभम

देखा वक़्त ने मेरी ओर

और कहा चल चलते है साथ

क्यों है न तैयार ?

दुनिया को पीछे छोड़ देंगे हम

गर तू चल सका मेरे साथ

देख भई बीस उन्नीस तो निकल गया

अब बीस बीस का पकड़ ले हाथ दम साथ

बनेगी कुछ बात जो कर बंद मुट्ठी दौड़ेंगे साथ

वक़्त का देखकर यह अंदाज़ और संवाद

डर कर कांप गया मैं सिर से पाँव

रह गया दंग देख वक़्त के यह सवाल

न बाबा न मैं तो एक कदम भी न चल सकूँगा तेरे संग

फिर यह तो है साल भर की बात दिन रात

उसकी मुस्कुराहट उसके निमंत्रण से

चौंक गया मैं साल की अंतिम थी वह रात

मैं अदना सा आदमी

क्या जुर्रत करूँगा ?

वक़्त के हाथ में हाथ डालने की करामात

वक़्त की ठिठोली

क्या कर लूँ स्वीकार ?

वक़्त ने कहा तू चिंता न कर

मैं हूँ तेरे साथ

बीस बीस दो सदी हुई पूरी

कालांतर की पुकार

अंतिम सुनहरा अवसर तुरंत निर्णय ले बिना सोच विचार

यह वक़्त न आएगा बार बार

कर स्वीकार चुनौती भरोसा तो कर एक बार

बराबरी का यह साल बराबरी कर मुझसे

फिर देख चमत्कार

मैं नज़र चुराता रहा वक़्त छेड़ता रहा मुझे बारबार

मैं न पड़ता इस चक्कर में चाहे मनाये सारी कायनात

वक़्त ने कहा कमर कस ले याद रहेगा यह साल

जम कर करेंगे मुक़ाबला मुसीबतों के साथ

मैं चुप मुसीबत की न कर बात

बड़ी मुश्किल से निकाली संघर्ष की रात

हारने पर न रोयेंगे न होंगे दुःखी फिर लड़ेंगे बारबार

मैं दुःखी मुझसे न होगा प्रयास बार बार

भाग्य के पीछे भागना छोड़ दे हो जा मेरे साथ

मैं निगोड़ा भाग्य को कोसता मन को मिलती तसल्ली हर बार

अरे ओ दुखी आत्मा खुलकर हसेंगे सबके साथ हर हालात

मैं खामोश हँसना गुनाह है

यँहा नज़र लग जाती है जनाब

नहीं पता तुझे यह बात

कौन देता है ख़ुशी में साथ ?

किस उलझन में डूब गया ?

वक़्त ने चेताया उठ बरख़ुदार

कुछ नया सोच कुछ नया कर काहे आलापे पुराना राग

नए में छिपे डर से रहा डरता हर बार पुराने पर एतबार

वक़्त बुलाता रहा साल दर साल

पर सुस्त रही हमेशा मेरी चाल

तेरे साथ तेरी बराबरी की क्या बात

मैं तो एक कदम का भी हमक़दम न बन सकूँगा

माफ़ कर दो मुझे आज

हर बार की तरह परवरदिगार

वक़्त देता रहा चुनौती पर मैं जानता था खुद की पनौती

कैसे कर लूँ वक़्त पर विश्वास ?

आज संग है तू

क्या होगा कल जो छोड़ देगा मेरा साथ ?

वक़्त से बस इतना कह पाया

तू साथ दे न दे पर मेरे अपनों का न छूटे साथ व विश्वास

बस तू करना इतनी मेहरबानी

बने न बने मेरी कहानी पर मीठी जुबान से संवार सकूँ

किसी की जिंदगी किसी का संताप

किसी एक की आँख का आँसू दिल की परेशानी बाँट

प्रेम के धागों में जब बंधेगी जिंदगी हो जायेगा सुहाना साथ

वक़्त मुस्कुराकर चल दिया

तेरी होगी सब ख़्वाहिश पूरी

जो तूने दुसरो के लिए माँगी दुआ निःस्वार्थ

एक स्त्री के स्वतंत्र विचार

मैं स्त्री हूँ

स्त्री बनकर जीना चाहती हूँ

स्त्रीगुणों से घर संसार चलाना चाहती हूँ

मुझे नहीं अपनानी भेड़चाल

मुझे नहीं बनना आदमी

न पैसे कमाने वाली मशीन

संसार में सब कमाने को नहीं होते पैदा समझती हूँ

परिवार की शक्ति बनकर जीना चाहती हूँ

दो कश्तियों में सवार होने की बजाय

एक कश्ती को आराम से खेना चाहती हूँ

बड़ी ख़्वाहिश नहीं एक छोटी सी ख़्वाहिश है 

नामी लोगों की फेहरिस्त में आने से ज्यादा

एक अच्छा प्यारा इंसान बनना चाहती हूँ

पैसा जीने के लिए जरुरी है

मेरे परम कर्तव्यों के मार्ग का मील पत्थर नहीं

पैसा सुख है

पर मेरे अपनों की ख़ुशी व साथ से बढ़कर नहीं

पैसा ताक़त है

पर स्वशक्ति व स्वजन से बढ़कर कुछ नहीं

पैसा स्वाभिमान है

पर उस मान का क्या करुँ जो दिलों में भर दे अभिमान

पैसा रुतबा है

पर नही चाहिए वो पद प्रतिष्ठा जो फासले बढ़ा रिश्तें कर दे ख़त्म

पैसा ऐश्वर्य है

पर नहीं चाहिए वो सुख आराम जो अकेले भोगने हो

पैसा आज़ादी है

पर नहीं चाहिए वो आज़ादी जो मुझे कर दे सब बंधनो से मुक्त

पैसा समय का सदुपयोग है

पर अपनों के साथ समय बिताऊँ सुख सुकून के हो पल

पैसा संसार को चलाता है

पर मैं घर संसार चलाना चाहती हूँ

मेरी जगह पैसा ले ले क्या होगा मुझे मंजूर ?

मेरी अनुपस्थति पैसे से पूरी हो जाये क्या सह पाऊँगी ?

मैं नदारद रहूँ घर परिवार जिम्मेवारियों से दूर

क्या पैसों के मोल में अनमोल परिवार को छोड़ सकूँगी ?

पैसा बड़ी पहचान है पैसा बड़ा मुक़ाम है

क्या पैसे की पहचान में अपनों की पहचान खो दूँगी ?

मैं स्त्री हूँ

स्त्रीधर्म ही निभाऊंगी

अपनी ऊर्जा समय गुणों को वंशवृद्धि में बोना चाहूँगी

पैसा कमाने की होड़ में सब कुछ दावँ पर नहीं लगाऊँगी

पैसों की सड़क पर सब चलते है

मैं घर की ओर जाने वाली पगडंडी पर कदम बढ़ाऊँगी

अब मेरी भी सुनो

सब आवाज़ों के बीच सुनी उसने अपने दिल की आवाज़

उसका दिल चाहता था स्वयं के दम पर चलूँ दुनिया के साथ

घर का पंछी बनूँ न की बंदी ज़रूरत पड़ने पर पंख सकूँ पसार

दुनियावी सत्यों के सामने एक ओर परम सत्य से जूझना था आज

पैसा कमाने के विषय में लेनी होगी सब की मंजूरी सबका साथ

दुनिया की दौड़ में शामिल होने से पहले स्वशक्ति की पहचान

आत्मनिर्भर होने के लिए पैसा कमाना पहली शर्त पीछे रखने होंगे जज़्बात

स्वयं की उन्नति परिवार की आर्थिक शक्ति देश के कार्यो में योगदान
सब तथ्यों से भलीभांति हो परिचित उठाना होगा कदम आत्मविश्वास

खुद की सेहत शक्ति सामर्थ्य का रख ध्यान करुँगी काम का चुनाव  

अपने कर्त्तव्यनिर्वहण करने से पहले हर पहलु पर करुँगी सोच विचार

मुझ से शुरू होगी दुनिया घर व बाहर की रखना होगा संतुलन पैनी धार

त्याग और समर्पण की कहानी नहीं सहयोग और समर्थन से बनेगी सबकी बात

खुद के कर्तव्यों की पूर्ति में सबकी न हो अनदेखी रखना होगा ख़्याल

स्वयं को कर मज़बूत घर को कर मज़बूत परिवार को कर मज़बूत

जब होंगी चारों ओर से मज़बूत तभी लक्ष्य तक पहुँच पाऊँगी साकार

फुर्सत के क्षणों में करुँगी कामकाज़ ऊर्जा का सही इस्तेमाल  

गृहिणी बनूँ या कामकाज़ी दोनों में से एक का सगर्व चुनाव

कमाने के अवसर नहीं होते बंद सही अवसर की राह का इंतज़ार

अपने रोल को समझ न्याय के पथ पर होऊँगी अग्रसर लगातार

पैसा कमाना चाहे हो मेरी प्राथमिकता बहुत बड़ी कीमत न दूँगी सरकार

मैं परिवार की शक्ति परिवार जब बनेगा मेरी शक्ति तभी उठेंगे कदम बाहर

अपनी खुशियों के साथ परिवार की ख़ुशी दुगनी ताक़त का होगा अहसास

तभी स्वयं व ईश्वर को सच्चे दिल से शुक्रिया कहूँगी हर बार

स्त्री हर मोर्चे पर विजयी स्त्रीशक्ति का परचम रखूँगी बरक़रार

कमाई पैसों की या रिश्तों की मैं खुद की तक़दीर खुद लिखूँगी शानदार

पैसा कमाना है स्त्री तो बन आदमी (भाग 3)

जिंदगी भर सुनती रही बेचारी एक ही ताना

लो पढ़ लिख कर घर बैठ गयी

क्या पैसा नहीं कमाना ?

उसकी समझ को दुरुस्त करना चाहता था जमाना

पढ़ाई का मतलब और होता ही क्या है ?

सिर्फ पैसे कमाना  

दुनिया के कठोर सत्य को पहचाना

मूर्ख मूल्यांकन कर अपनी पढ़ाई का 

संसाररथ पैसे के पहिये पर पड़ता चलाना

सब उसके कान में पिरोते रहे शब्द पुराना

पैसे कमाना सबसे बड़ा पुरुषार्थ

वर्ना व्यर्थ ही तेरा इस धरती पर आना

धनार्जन से ही जीवन सफल बनाना

मज़बूरी ,जरूरत ,शौक या व्यस्त रहने का बहाना

जग ने कब यह जाना ?

वक़्त की मार से बचना है तो कमाना

एक की कमाई से नहीं चलता घर बार

जिंदगी की खींचतान कर देगी दीवाना

समाज का दस्तूर झट से अपनाना

मेरी कमाई ही मेरा हथियार

अपने दम पर जितनी होगी जंग वीरांगना

छोड़ यह हरकत बचकाना

हुक़ुम बजाना या हुक़ुमत करना

दोनों में से एक पड़ेगा चुनना हुकुमनामा

मुठ्ठी में हो पैसा तभी मुस्कुराना

क्या होगा तुझे मंजूर ?

गर दुनिया के सामने तुझे पड़ेगा हाथ फैलाना

ज़माने के कदम से कदम मिला कर हो चलना

या दुनियादारी हो निभानी  

पैसा हर सुख का मूल जानना

बाहर की दुनिया की बागड़ोर संभालना

छूट न जाये कोई छोर वर्ना

किस्मत से रिश्ता हो जायेगा बेगाना

उठ दुनिया से कर आँखे चार उनका चेताना

कमाऊ शब्द के वज़न के नीचे दबती दुनिया

संसार की रीत हँस कर निभाना

कलयुग में बंद कर सतयुग का गाना

माया जीती तो जग जीता

रब से ज़्यादा ख़ुद पर विश्वास बनाना

गरीब की रोटी ,आम आदमी का जीविका कमाना

रईस की आरामगी ,पैसे के विभिन्न समीकरण

बिन पैसे होशोहवास पड़ेगा गँवाना

इससे पहले खुद का मन व जरुरत समझूँ

सबकी आवाज़ ने तय कर दिया उसका ठिकाना

मेरी जिंदगी की बागड़ोर मैं कैसे पकड़ूँ समझाता रहा जमाना

मेरी प्रतिभा,जरुरत,क्षमता से अनजान

सिखाते रहे पैसा कैसे कमाना

जीवन के दो ही रास्ते स्वार्थ या निःस्वार्थ

दोनों में से चुनना होगा पैसा कमाना

अंतिम निर्णय आज स्त्री तुझे है बताना

अब सुन ध्यान से कर्म की क्या परिभाषा ?

संसार रचा माया का तो माया से पड़ेगा चुकाना

इस पैसे के आगे सब माथा टेकते

क्या अनपढ़ ज्ञानी ध्यानी संसारी पहनावा

मन की बात यदि आज न की तो पड़ेगा पछताना

पैसा कमाना है स्त्री तो बन आदमी (भाग 2 )

कलयुग की स्त्री ने चार पैसे कमाने की ख़ातिर

किये त्याग बलिदान और आत्मसमर्पण बेशुमार

पैसा कमाने की धुन में सब कुछ कर दिया वार

घर छूटा चौका-चूल्हा छूटा पति-बच्चे छूटे बुजुर्ग छूटे

परिवार की जिम्मेवारियाँ छूटी पास-पड़ोस तो पहले से ही छूटे

साज-श्रृंगार छूटा लंबे बालो को कहा अलविदा भारी परिधान छूटे,

प्रेम भक्ति कला सौंदर्य वात्सल्य की अभिव्यक्ति छूटी

अपने बेगाने सभी छूटे जब गृहलक्ष्मी हुई कमाई के घोड़े पर सवार

सेवा सत्संग साहचर्य समता छूटे मानव धर्म के चार प्रमुख संस्कार   

छोड़ी शील व लज़्ज़ा आदमी की वेशभूषा को किया स्वीकार

तोड़ी हर रस्म मान मर्यादा आड़े जब आये धर्म संस्कार

पार कर गयी सब विघ्न बाधा रुकने न दी जीवन रफ़्तार

स्त्री से आदमी फिर आदमी से स्त्री लिंगपरिवर्तन में फँसी नार

उभयलिंगीं बन गया उसका स्वभाव दो नावों की कश्ती में सवार

वक़्त देखता रहा उसकी हर युग में बदलती चाल व किरदार

आदमी जैसा लगा दिमाग आदमी जैसी रख बुलंद आवाज़

आदमी जैसे रख जज़्बात आदमी का सा व्यवहार

आदमी समान कर बराबरी आदमी समान कर मुक़ाबला

आदमी समान कमाकर ला मज़बूरी में स्त्री बन गयी आदमजात

जिंदगी की गाड़ी पैसों के ईंधन से बन गयी दौड़ती फर्राटेदार कार

पैसे कमाने और जोड़ने में स्त्री संतुलित करती रही घर बाहर

पैसा कमाने की जद्दोजहद में ख़र्च कर दिये वक़्त के स्वर्णिम हार

दरकिनार किए व्यर्थ बातें लोग जीवन शैली अभद्र व्यवहार

आदमी से आँख मिलाकर करती काम पर आँखों की शर्म रखी बरक़रार

आदमी को परमेश्वर मानने वाली स्वयं में ढूंढ परमेश्वर संसार का करने चली उद्धार

जज़्बात को न हावी होने दिया फ़ैसले लेती रही बिना इंतज़ार

पैसा कमाने की होड़ में एक कर दिए दिन रात समय से मिलाती तार

जमीन आसमान के अंतर को कर गयी पार निस्संकोच दृढ़ विचार

अब सब कुछ है पैसों का रचा सुंदर सुव्यवस्थित संसार

बस नहीं बचा जीवन जीने का उत्साह उमंग रिश्ते विश्वास प्यार  

संवेदनाशून्य बन स्त्री कमा लाई पैसे चार मन को मार

पर अब सबसे संवेदना की अपेक्षा उसके प्रश्न उसी पर करते वार

झूठ या सच बेईमानी या ईमानदारी कुकर्म या सत्कर्म को बना हथियार

कुछ भी आजमा पर स्वयं के होने को कर पायी सिद्ध जब कमा कर लायी पगार

घरवालों के हाथ धनलक्ष्मी देकर ही गृहलक्ष्मी ने पाया आदरसत्कार

पैसा कमाने के चक्कर में खुद की ख़ुशी दांव लगायी बार बार

अपने स्वास्थ्य रखरखाव जरूरतों से अनभिज्ञ स्त्री बनी बेचार

संसार की रीत स्त्री देने को बनी उसके लेने पर प्रश्नों की चलती तलवार

आदमी कमाता सिर्फ पैसा कर्म को समर्पित सिर्फ एक आचरण व्यवहार

स्त्री कमाती न केवल पैसे बल्कि प्यार के रिश्तों की दौलत अपार

स्त्री को हर युग में काहे देनी पड़ी सीता समान परीक्षा बारम्बार

स्त्री का कर अपमान आदमी प्रकृति पृथ्वी देव के कोपभाजन का हुआ शिकार

संसार को अपनी मुट्ठी में रखने वाली अपनों से सदा हारती आई किस्मतमार

हिमालयपुत्री हिमालय सा मन और आत्मविश्वास रख जीतती शत्रुहार

न दो उसे ताने बाते नसीहतें खुद की दुनिया की खुद मालकिन न चाहे मददगार

पैसा न कमाने वालो ने ही उसके अस्तित्व व आत्मविश्वास से किया अनुचित व्यवहार

पैसों की शक्ति जानती पर स्वशक्ति की अवहेलना करती हर बार

पैसा कमाने में पहले बनी आदमी फिर बनी मशीन चलती लगातार

स्वयं की छवि पुरुषो के मुक़ाबला बेहतर व मज़बूत बनाती शानदार

स्वंगर्वित स्त्री तुम श्रेष्ठ थी श्रेष्ठ हो और श्रेष्ठ रहोगी कालांतर की पुकार

घर हो या बाहर दोनों भूमिकाओं में स्त्री तुम स्वयंसिद्धा नार

तुम्हें पैसा कमाना लगा आसान पर आदमी का दिल जीतना असंभव हारती बार बार

सदैव आदमी की नज़रो में प्यार सम्मान ढूँढ़ती व्यर्थ इंतज़ार

सक्षम संबल सशक्त स्त्री स्वयं की कुशलता का माँगे प्रमाण सअधिकार

कौन देगा उसे ? मौखिक या लिखित कागज़ के प्रमाण रख मान प्यार

ऐ स्त्री तू सत्य की कसौटी पर उतरी खरी बार बार

अपने आँसू पौंछ स्त्री ने अपनी पीठ स्वयं थपथपाई बन समझदार

अम्बा पृथ्वी स्त्री तीनों देवकृति संसार को संपूर्ण करती दे सदाचार

स्त्री संसार में नहीं बसती संसार स्त्री में बसता ले विस्तार

संसार स्त्री को नहीं स्त्री संसार को चलाती कुशल खेवनहार

स्त्रीजंग अभाव से शुरू संघर्ष कर बराबरी तक पहुंची बनी दमदार

अब स्त्रीशक्ति का परचम विश्व में फैला कर करती चमत्कार

आदमी के दिल पर राज करने वाली आज आदमी को पीछे छोड़ खड़ी गर्वित साकार

अब स्त्री संसार के पीछे नहीं संसार स्त्री के पीछे दौड़ रहा हाथ पसार

यही है वास्तविकता यही है सच्चाई केवल स्त्री ही जीवन आधार

पैसा कमाना है स्त्री तो बन आदमी(भाग 1 )

घर की स्त्री कल तक दो पैसो में खुश थी

राजा की रानी थी या घर की मालकिन थी  

रानी या दासी दोनों में सुख की कहानी थी

स्नेह सम्मान संतोष सुरक्षा की चारदीवारी थी

अपने होने का भरपूर अहसास था परिवार की धुरी थी

पुरुष को बना सूर्य स्वयं धरती सी इर्दगिर्द घूमती थी

स्वयं की पहचान की बजाय परिवार की पहचान में विलुप्त थी

बाहर की दुनिया पुरुष को सौंप भीतर की स्वयं संचालिका थी

जीवनपर्यन्त घर में कैद रहकर भी अपने किले की बेगम थी   

कर्त्तव्यनिर्वहण में सब कुछ लुटा सुखसुकून की हक़दार थी  

दुनिया के झमेले झेलते आदमी की पीठपीछे शक्ति बन खड़ी थी

स्वार्थ से ज्यादा परमार्थ की धर्मशक्ति से चलती थी

वक़्त की आबोहवा ने स्त्री के जीवन की दिशा व दशा बदल दी थी

पुरातन स्त्री ने नवयुग की स्त्री के अवतरण की सोची थी

पहले देश को अंग्रेज़ो की गुलामी से बचाने की कवायद थी

अब बदलते युग में खुद की स्वतंत्रता दांव पर लगी थी

घर से बाहर निकली तो दुनिया बदली बदली लग रही थी

संसार को देते देते मानो संसार से अलविदा हो गयी थी

अपनी पहचान गवां मानो सब कुछ गवायाँ देख रही थी

घर परिवार देश को संवारा अब बारी खुद को संवारने थी

घर के मोर्चों को संभालती जल्द बाहर की दुनिया में पदार्पण करने लगी थी

खुद की तलाश में दुनिया के लम्बे सफ़र पर जाने को तैयार थी

घर परिवार को व्यवस्थित करते करते संसार को व्यवस्थित करने की पहल थी

पुरुष के पीछे रहने वाली अब पुरुष से कंधा मिलाने चली थी

पुरुष का वर्चस्व प्यार से सहने वाली उसकी ज्यायती से घबराई थी

दुनिया में अपनी पहचान सम्मान और मुक़ाम पाने को ललालियत थी

समाज में अपनी भूमिका को लेकर शंकित भ्रमित और आतंकित थी

घर की लक्ष्मी अब वीरांगना लक्ष्मीबाई का रूप धरे खड़ी थी

अपने ज्ञान गुण व अनुभव की बना के ढ़ाल निकल पड़ी थी

घर की देहरी लाँघ कर्मयुद्ध के मैदान में योद्धा पहुँच चुकी थी

संसार समक्ष खुद के अस्तित्व को नए मायनों में गढ़ना चाहती थी

मर्दानी की भूमिका में औरतों के प्रति नकरात्मक रवैया के खिलाफ़ जंग छेड़ी थी

खुद की छवि पर हटाने धूल फ़ूल सी नाजुक स्त्री चुनौतियों से भिड़ गयी थी

हर नारी के संघर्ष को दुनिया के समक्ष पहचान दिलाने को प्रतिबद्ध थी

केवल लिंगभेद के सवाल नहीं उठाये अधर्म अज्ञान अमानवता से संघर्षशील थी

तन मन धन विद्या गुण व कौशल से लैस युद्ध के मैदान में कूच करने को तैयार थी

तब कँहा सोचा था घर आकर विश्राम करुँगी युद्ध के परिणाम से अंजान थी

जब कदम निकल पड़े सोच व दृष्टि बड़ी होती गयी आवाज़ बुलंद होने लगी थी

दिल और दिमाग़ के मंथन में कुछ कर गुजरने को कमर कस ली थी

दुनिया के समक्ष स्त्री स्वयं का इतिहास बदलने को आतुर थी

सतयुगी स्त्री कलयुग की कालिमा से लड़ने बन कालरात्रि निकल पड़ी थी

गुलदाउदी प्रेम

शीत ऋतु के आगमन का स्वागत करती प्रकृति

गुलदाउदी के फ़ूलों की पारंपरिक दर्शन वंदन स्तुति

साक्षात् रूप में धरा पर ईश्वर की सुखद अनुभूति

दिव्य रंग रूप आकार के फूलों की हृदयस्पर्शी प्रस्तुति

अनुपम दृश्य अद्भुत सुगंध अद्वित्य संस्कृति

ईश्वर प्रकृति मानव के मिलन की संयोजित कृति

इस बहुरंगी छटा को देखने उमड़ी लोगो की पंक्ति

तम से मुक्ति सकरात्मक ऊर्जा की सहज प्राप्ति

गुलदाउदी से सजा बागान केवल गुलदाउदी प्रेमियों को अनुमति

मानो गुलदाउदी राजा दरबार लगा देते प्रजा को सुमति

मंत्रमुग्ध जनसमूह गुलदाउदी प्रेम में पाते जीवनशक्ति

 प्रेमी बनी प्रकृति प्रेमिका सारा संसार अलौकिक सुप्रीति

निश्छल प्रेम का आदान प्रदान व्याकुल मन को मिली शांति

मौन संवाद मौन प्रेम मौन भाव गुलदाउदी को प्रेमांजलि यथाशक्ति

गुलदाउदी की गोद में महक रहा संसार अजब प्रेमासक्ति

प्रेमपाश में बंधकर भी खुला महसूस होने की तृप्ति

        गुलदाउदी सैर में ईश्वरबोध प्रकृति प्रेम मानव की नियति         

गुलदाउदी प्रेम ने कराया प्रभु साक्षात्कार पुलकित मन आभारव्यक्ति

आज फिर से प्रकृति ने करा दी सच्चे प्रेम की यथार्थ अनुभूति

मैं घर की ओर चल दिया यादों की दिल में रख मधुर स्मृति

दिवाली का तोहफा – नया सोफा

दिवाली पास आते देख माँ ने सबको चेताया

पुराने सोफे का छोड़ो मोह नया सोफा माँ को भरमाया

माँ का सुनते एलान पूरा परिवार सकते में आया

ठीक तो हो माँ यह क्या तुमने नए सोफे का राग अलपाया ?

पुरानी चीज़ो में रहने की आदत ने नई चीज़ को ठुकराया

अब नये की क्या जरुरत ? नए सोफे पर खर्च ने डराया

पुराने से काम चल तो रहा है तुम्हें किसने भड़काया ?

व्यर्थ पैसों को पानी की तरह न जाए बहाया

बच्चों ने समझाया नए सोफे के विचार का विश्लेषण बताया

हमारे यँहा आता ही कौन है ? सोफे की अहमियत का पाठ पढ़ाया

हम सोफे पर बैठते ही कितना है ? बेकार ही घर का बजट बढ़ाया

हमारे जीवन में ऐसा कौन महत्वपूर्ण महानुभाव घुस आया ?

जिसको नए सोफे पर बिठाने का विचार दिमाग़ में आया

माँ सब जानती समझती थी पर अपना पाठ फिर दुहराया

माँ की अकस्मात् जिद के आगे घर में कोहराम मच आया

नया सोफ़ा तो आएगा ही माँ की प्रतिज्ञा ने हमें खूब सताया

इस बार तुम्हारी बातों में न आऊँगी बार बार हमें धमकाया

माँ की इस घोषणा से घर कुरुक्षेत्र के मैदान सा नज़र आया

सब अपने अपने मोर्चे पर अड़े थे महाभारत का बिगुल किसने बजाया ?

पति कम जरुरत व ख़र्च का वास्ता दे रहे थे प्यार का अस्त्र भी काम न आया

सबने अपने अपने विचार अपनी अपनी राय को सुनाया

सबकी सयानी बातें सुन नासमझ माँ का क्रोध और बढ़ आया

जरुरत या इच्छा ,पैसे जोड़ना या ख़र्च करना, गुजारा या ख़ुशी ,में चुनाव आया

पति ने ठंडे लहज़े से कहा इस पुराने सोफे पर तरस खाओ भाया

आज के ज़माने में पैसा बचाना सबसे बड़ी अक्लमंदी कितना समझाया 

पुरानी बढ़िया चीज़ पर फालतू की मोहर लगाना मेरी समझ न आया

घर में मचे घोर विरोध ने माँ की जिद को और गहराया

अपने पैसों से ज्यादा दुसरों के आराम को अनुचित ठहराया

नए सोफे की जरुरत एकदम कँहा से आन पड़ी प्रश्न उठाया ?

माँ ने दुनियादारी की बातें को सिरे से नकार उत्तर फरमाया

अपनी वर्षो से दबी कुचली इच्छा को पूर्ण करने का फैसला सुनाया

माँ ने सबको प्रेम से शीशे में उतारा और खुद की बुद्धि को खूब घुमाया

देखो सब परिवर्तन संसार का नियम है तुमने सब भुलाया

नए सोफे की महत्ता का पाठ बड़े धैर्य से समझाया

तुम लोग रोजाना सिर्फ भागते दौड़ते हो बैठना भी जीवन क्रम बताया

बिस्तर से उठे दौड़े थके फिर बिस्तर पर साथ संग बैठने का कायदा न निभाया

जीवन की इस आपाधापी में विश्राम जरुरी क्या समझ आया ?

नए का आकर्षण तुम्हें एक साथ लाएगा नए की माया का तत्व समझाया

खुद की ख़ुशी खुद का आराम बहुत जरुरी खुद को तुम लोग ने बहुत सुखाया

बरसों की भागदौड़ की तपस्या हुई पूर्ण अब प्रेम से बैठेंगे बतियाएंगे कुछ समझ आया ?

माँ की हुई जीत नया सोफा शान से घर आया माँ के कलेजे को बड़ा ठंड़ आया

दीपावली पर्व

शरीर शिथिल

मन मलिन

अंध आत्मा

पाप का संताप

जीवन तेज निस्तेज

ज्ञान की लौ मंद

रागद्वेष प्रतिद्वंद

कांपता जीवन

डगमगाए कदम

वक़्त का छलावा

हालत बमुश्किल

लीलता मोहमाया का संसार

निरीह बेबस लाचार प्राणी

रोग जकड़ता जी भर

त्रस्त हुआ जीवन

वाणी का पाखंड

प्रेम व विश्वास खंड खंड

कर्मों ने रचा चक्रव्यूह

कँहा तोड़ पाया फँसा अभिमन्यु ?

बुराइयों का अतिक्रमण

अवगुण बने पतन

अन्नपूर्णा का प्रकोप

लक्ष्मी हुई लोप

कुबुद्धि कंठ कंठ तक

डसे राक्षसी शक्तियों के दंश

जीवन की हुई घोर दुर्दशा

निराशा की कालिमा चहुँ ओर

धुँधली दृष्टि निर्बल दृष्टिकोण

मुक्ति का मार्ग खोजे बेजान शरीर

तो ध्यान से सुन ऐ सखी

घर आँगन तनमन कर स्वच्छ

मंदिर में एक घी का दीपक जला

निश्छल भाव से प्रभु श्रीराम नाम का

एक दीपक भीतर जला एक बाहर जला

कार्तिक अमावस की आयी है रात

पर्व दिवाली का मना रख मन में आस

दीपक की लौ ही है ईश्वर के होने का अहसास

परम शक्ति परम ऊर्जा का महास्रोत  

राम नाम का दीपक हर लेगा

तेरे सब दुःख दर्द द्वन्द के दोष

जब जीवन की लौ हो जाये मंद

तब राम नाम की लौ देगी भर

आनंद के प्रकाश पुंज का सवेरा अनमोल

रोशन हो जायेंगे सुख शांति समृद्धि के द्वार

श्री रामाय नमः” का मंत्र जप बार बार  

अपार ऊर्जा का होगा स्पंदन

अनंत ऊष्मा का फैलेगा उत्कंठ

दृश्यमान होगा त्रिशक्ति का आलोक

दिव्य भव्य अलौकिक प्रभु के प्रारुप

राम शक्ति का नाम स्मरण है उत्कर्ष रूप

धरती का सबसे शुभ मंगल पावन त्यौहार 

सबसे बड़ा प्रकाशोत्सव है दीपावली मनाते सपरिवार

प्रभु राम के साक्षात् दर्शन का सौभाग्य अपार

हर पाप बुराई निराशा का होता सदैव अंत

दीपक की लौ में है राम की शक्ति अनंत

ख़त्म कर देगी नकरात्मक शक्तियों का मोह

जीवन का निचोड़ सिर्फ राम नाम का जोड़

सर्वशक्तिशाली राम की भक्ति में ही है

शक्ति बेशुमार बहुल व बेजोड़

श्रीहीन श्रीमती

देह दुर्बल

कुंठित मन

कलुषित आत्मा

भंग जीवन उमंग

बोझिल वातावरण

बड़ा पाप का आतंक

हौंसले पस्त

जीवन के द्वंद

अज्ञानता की फुँकार

बुझता ज्ञानदीपक

घर अपना डसे बेगानापन

चले परिवार की चक्की

पिसती मैं और मेरा मन

मैं घर में घर मुझ में

खींचतान यह जीवन

संसार अबूझ पहेली

घर का संघर्ष मेरी सहेली

रेत की मुट्ठी सा वक़्त

फिसलता मसलता हर क्षण

दाँव लगा पूर्ण जीवन शक्ति का

सहेज घर आँगन

थकहार हर बार

अश्रु बहे विफलता बन

न जाने कँहा से प्रकटी

बीमारी लगी तन मन

जो बचा था छुपा था

चुपचाप ले हुई अदृश्य

खोखला हुआ पुनः जीवन

कैसी यह लड़ाई ?

कैसा यह संग्राम ?

कैसा यह युद्ध ?

कैसा यह कोहराम ?

न दुश्मन सामने

न शस्त्र न हथियार

न कोई रणनीति

न मौका हो जाऊँ फरार

दिन भर लड़ती रहती

न कोई युद्ध विराम

न बजता बिगुल कर विश्राम

काम क्रोध लोभ मोह अहंकार

रचते जीवन का चक्रव्यूह

घुसना आसान निकलना बमुश्किल

व्यथित दिन व रात

मेरे सद्गुण बने मेरे अवगुण

चकरघिन्नी बन करती काम

न होता काम ख़त्म न चैन की साँस

घुट घुट कर जीती

कहने को न कोई हमदर्द न साथी

न काम में कोई मददगार

अन्न भंडार भरते भरते

हुआ खाली तनमन धन

चूक गए रुपये पैसे

पर चूका न जीवन ऋण

कुबुद्धि पाती चहुँ ओर

घोर अविद्या चितचोर

अदृश्य शक्तियों का प्रपंच

निगलता मुझे बन भुजंग

संसार कठिन परीक्षा

मैं कूदती फाँदती भाँति कुरंग

दशहरा

जब जब धरती पर पाप अत्याचार अधर्म का बढ़ा आतंक पुरज़ोर

मानवता हुई घायल “त्राहि माम” “त्राहि माम” का स्वर गूंजा हर ओर

तब तब ईश्वर धरती पर हुए अवतरित मानवता की रखने लाज हो आत्मविभोर

असत्य अज्ञान अंधकार का नाश करने परम शक्ति उतरी धरती की ओर

मनुष्य का रूप धर पृथ्वी पर जन्मी सच्चाई की स्थापना पर दिया जोर

त्रेता युग की अमर कहानी भगवान राम के जीवन चरित्र की चर्चा चहुँ ओर

मर्यादा पुरुषोत्तम राम बने संरक्षक मानवता को पहुँचाया नवयुग की ओर

लंकापति रावण जो था ज्ञानी ध्यानी शिव भक्त परम शक्तिशाली सब ओर

एक भूल पड़ी उस पर भारी नारी का सम्मान न कर सका दुराचारी मन का चोर  

खोया जीवन सम्मान पत्नी भाई संतान प्रजा और गवाईं लंका की डोर

न केवल लाज की लाँघी सीमा रेखा अपितु अज्ञानता में अस्त हुई जीवन सुख की भोर

ईश्वर से पाया अमर वरदान पर अपने ही दुष्कर्म की पायी भयंकर सजा घोर

भगवान राम ने कर वध ख़त्म की दम्भी रावण की कहानी का जोर  

जो काम क्रोध लोभ मोह अहंकार में पहुँचा नर्क द्वार की ओर

धर्म न्याय अहिंसा की होती देख हानि ईश्वर संभालता रक्षा की बागडोर

संसार को बुराई से बचाया आदर्श जीवन व आदर्श मानव का संदेश बताया प्रेमविभोर

विष्णुअवतार भगवान राम स्वयं बने उदहारण पालन किया वचन चले धर्म की ओर

कर रावण संहार धर्म न्याय सत्य अहिंसा का प्रकाश कायम रखा प्रतिबद्धता की ओर

दशहरा पर्व उसी विजयगाथा की याद दिलाता भगवान राम प्रेम की ओर

हर वर्ष रावण का पुतला जला हम बुराई पर अच्छाई की विजय का मचाते शोर

क्या स्वयं से पूछा हमने ईश्वर के प्रति अपनी जिम्मेवारी कब निभाई हे चित्तचोर ?

कब हम मुक्त करेंगे भीतर के रावण से खुद को ?

कब देखेंगे खोजेंगे पाएंगे भीतर बैठे राक्षशो पर विजय ?

कब स्वयं में छुपे राम को पहचान पाएंगे ?

कब भीतर की बुराईओं से लड़ना सीखेंगे ?

कब जीवन की नकरात्मक ऊर्जा को झेलना सीखेंगे ?

कब अपनी ही कमजोरियों पर ताक़त का जश्न मनाएंगे ?

हम राम बनेंगे या रावण खुद की क्या पहचान बनाएंगे ?

सुंदर पर्व की सुंदर बात ईश्वर को समझो और रख लो मन में यह बात

सही मायनों में दशहरा बाहर तो मनाये पर भीतर के रावण का भी करे बहिष्कार

कर्म ज्ञान भक्ति की ऊष्मा से भीतर के रावण को जलाये

प्रेम निष्ठा व विश्वास में बसे राम को हर पल जगाये

तभी भगवान राम की विजय होगी सफल व संपूर्ण

जब तक मानव उस परम शक्ति से स्वशक्ति को नहीं लेता जोड़

धरती पर लंका नहीं अयोध्या बसाये राम गुण गाये

भगवान राम की धरती पर राम राज्य बसाये

त्यौहार का मर्म जीवन में उतार लाये

आओ सब मिलकर दशहरा पर्व मनाये भीतर की लौ जलाये 

महालक्ष्मी अवतरित गृहलक्ष्मी का रूप

हे महालक्ष्मी महासुंदरी महादेवी महाज्ञानी महाविराट रूप 

तीनो लोकों की स्वामिनी हे महाशक्ति तुम्हारे अनंतरूप 

दिव्य भव्य अलौकिक गुण मनमोहक छवि व्यापे विश्वरूप

अद्वित्य अनमोल अद्भुत कृपा तुम्हारी धरे विभिन्न रूप

स्वयं का रूप धरती पर उतारती कन्या स्त्री प्रौढ़ा तीन रूप

महालक्ष्मी बन गृहलक्ष्मी तृप्त करती सुख शांति समृद्धि स्वरुप

बन लक्ष्मी धन कमाती जोड़ती मितव्ययी धन संचय के तीन रूप

बन सरस्वती स्वज्ञान से घर परिवार संतान संवारती बहुलारूप

बन अन्नपूर्णा पोषित करती परिवार की धुरी जिसका न कोई अनुरूप

धरती की अम्बा आठ क्रियाओं में रहती विद्यमान रसोई से ऑफिस नवेलारूप 

मंदिर से बाज़ार पति बच्चे सासससुर नाते रिश्तेदार के अष्ट रूप

आठ भुजाओं से करती दुर्गम काम धरती की दुर्गा के असंख्य रूप

स्नेह और मान की अधिकारी धरती पर सब न्यौछावर करती शुद्ध रूप

महामाया के दर्शन दुर्लभ व दूर तो क्यों न घर की अम्बा को रखे प्रसन्न रूप

ऊँचा स्थान माँ अम्बे का पर नीचा स्थान कलयुग नारी का विडंबना कुरूप

भेदभाव से ऊपर उठे तभी खिलेगा धरती पर अम्बे का सच्चा स्वरुप

न कम न ज्यादा नारी को मिले बराबरी का दर्जा दे सम्मान स्वरुप

माँ की गरिमा मन में धारे तो आज की नारी का न बिगड़े स्वरुप

उस अम्बे से इस अम्बे करे जो फर्क मानवता की सबसे बड़ी भूल का रूप

सार्थक जगदम्बे की अर्चना जो माने दोनों को एक ही शक्ति का रूप

गृहलक्ष्मी का अर्थ हो सार्थक जब अम्बे की प्रतिछाया का स्नेह मान से हो स्वागतस्वरूप

असुरनिकंदन देवी के अंतर्मन दर्शन

पावन नवरात्र सदैव हरे जीवन संताप पाप और बँधन

प्रति पल मृत होते संसार में माँ भरे अमृत के जलकण

अम्बे हर क्षण हर ओर हर जगह मिटाती तमस की घुटन

माँ गौरी से माँ काली धरे हर रूप विधाता के हो दर्शन

हर राक्षस का करती विनाश सत और संतो का सरंक्षण

अम्बे माँ का संदेश कँहा समझती दुनिया कुबुद्धि के लक्षण

सत और तम की शक्ति से बना शरीर दोनों में चले संघर्ष अंतर्मन

शुम्भनिशुम्भ हमारे अहंकार और गर्व का है प्रतीक

रक्तबीज अभिलाषा और वासना का है प्रतीक

धूम्रलोचन क्रोध और हिंसा का है प्रतीक

चण्डमुण्ड ताक़त और लोलुपकता का है प्रतीक

माँ लड़ी इन राक्षसों से बाहर की दुनिया में हम जानते

हमे लड़ना है इनसे भीतर की दुनिया में मनुख ले सीख

यदि हम भीतर से हो कमजोर लूट जायेंगे तन और मन

गर हम भीतर से हो मजबूत जीत लेंगे हर संघर्ष अपने दम

काम क्रोध लोभ मोह अहंकार डेरा डाले हरदम रह चौकन्न

 आत्मिक शक्ति का परमात्मा की शक्ति से दिव्य मिलन

महाशक्ति व स्वशक्ति की ढाल का बचायेगा आवरण

बाहर की दुर्गा के संग भीतर की दुर्गा का कर जागरण

कैसे होगा जीवन सफल जब तक न होंगे परब्रह्मा के दर्शन ?

अंतर्मन की शक्ति न हो कमजोर यह सीखे और सिखाये

मन की अम्बे ज्ञान सत्ता संपत्ति स्वर्ग मोक्ष से नवाये

शक्ति का वरदान पा खिले जीवन पुष्प समान हो मन

जैसे कीचड़ में कमल का फूल होता उत्पन्न

अंतर्मन की अम्बे को नमन बाह्रामन की अम्बे को नमन