कृष्ण जन्माष्टमी बधाई

कृष्ण कन्हाई जन्म बधाई

जी भर कृष्ण ने लीला रचाई

कृष्ण कन्हाई अवतरण बधाई

जी भर कृष्ण ने बांसुरी बजाई

कृष्ण कन्हाई प्राकट्य बधाई

जी भर कृष्ण ने माखन चुराई

कृष्ण कन्हाई आगमन बधाई

जी भर कृष्ण ने प्रेम नगरी बसाई

कृष्ण कन्हाई दिव्य शक्ति बधाई

जी भर कृष्ण ने अर्जुन को गीता पढ़ाई

कृष्ण कन्हाई अदभुत दर्शन बधाई

जी भर कृष्ण ने हर ह्रदय में जगह पाई

कृष्ण कन्हाई रूप रघुराई बधाई

जी भर कृष्ण ने संसार में सत्य धर्म अहिंसा सिखाई

कृष्ण कन्हाई चारों युगी महायोगी बधाई

जी भर कृष्ण ने दया करुणा स्नेह विश्वास की डोर बढ़ाई

कृष्ण कन्हाई त्रिलोकी अनुभूति बधाई

जी भर चाहा कृष्ण तूने अब मेरी बारी आई

दिल बंजर दुनिया खारा समंदर

बंजर जमीन पर हम

दिल का पौधा लगा चुके है

भावनाओं का पानी देते देते थक गए है

फल की उम्मीद लगा बैठे है

जमीन भी वही है हम भी वही है

एक सूखे बेजान जड़ पौधे पर न जाने क्यों नज़र गड़ाए बैठे है

बस एक आस अभी टूटी नहीं है

साँसे न जाने क्यों उस बेजान से माँग बैठे है

सब सहते है सबसे कहते है

दिल के सौदे बड़े महँगे है हम सब गवां बैठे है

दिल लगाना मज़बूरी है शौक नहीं है

पर दिल के पौधे कहाँ और कैसे लगाना है जानना को हम भी बेताब बैठे है

सब समझाते है रोज़ सुनाते है और उलझाते है

उठ चल यह जमीन बंज़र है यह रोज़ का मंज़र है फालतू यहाँ बैठे है

खुदी उखाड़ दिल का पौधा लगा कही ओर नरम दिल जमीन पर

वक़्त के साथ बदल हम क्यों दिल छोड़ बैठे है

कैसे बताए सबको आदत और इंतज़ार कहां बदले जाते है

दिलों के लेख और मुकदर पर सब फैसले छोड़ बैठे है

Happy Teacher’s Day

Divine duties no one can pay

Could you imagine on this earth ?

A life without a protector

A journey without a guide

A ship without a navigator

A vehicle without a driver

A sport without a mentor

A fight without a master

An artist without a trainer

An institution without a director

An aimbition without a coach

A school without a teacher

An education without an educator

A learning without a tutor

A wisdom without a preceptor

A growth without a planter

A mission without a leader

A step without a friend

One pure soul inspires many pursuits

One power soul acquires many venerations

One noble soul aspires many generations

One positive soul desires many creations

A role model, a virtuous figure or a facilitator

A great humanity lover and a strong motivating factor

Each mind and soul is just like an unburnt lamp

Until kindled and enlightened by a super champ

Happy teacher’s day to all wonderful hearts

 A kind gratitude for a simple attitude who willingly starts

रक्षा बंधन विष्णुमहाबंधन

अटूट कुछ रिश्ते अनमोल कुछ बंधन

जज़्बात में भीगे और पिरोए गए एक सार एक मन

जैसे सुच्चे मोती जड़ी एक माला में दमकता स्वर्ण

यह देव तार बंधे और सुनाते सदा दिलों की धड़कन

न वक्त न उम्र न औपचारिकता न जुबान के मोहताज

बसते है भाई बहन के रिश्ते दोनों की आंखों  में रहते सदा नम

फिक्र और फक्र का सुंदर अद्भुत वा गहरा लिए अहसास

जब भी मिलते बैठते बतियाते दोनों भाई बहन हिलमिल  

वक्त बेवक्त फुर्सत निकाल पूछते दिलों का खयाल हर हाल

पल सदा वह अंकित हो जाता सदियों तक यादों में संभाल

खास खूबसूरत और खुशी में जुड़ते रिश्ते कोमल मनोभाव

अलग अलग बातें अलग अलग अंदाज कभी कमाल या कभी धमाल

याद दिलाने को यह पावन वा गरिमापूर्ण रिश्ता

आता रक्षा बंधन का त्यौहार श्रावणी पूर्णिमा के वार

कितना गूढ़ कितना जरूर प्रेम बढ़ता दृढ़ विश्वास वा सुप्रयास

मनाने हर्षोल्लास न कही शिकवा न गिला धूल जाता सब गुबार

बचपन में बोये यह स्नेह के पौधे सपरिवार वा सुसंस्कार

सदा खिलते महकते चहकते जैसे वृक्ष सदाबहार हर्षृंगार

बाल पके तो पके यह रिश्ते न पकते न थकते न मुरझाते

बस रहते सदा शानदार रंगदार वा ख़ुशगवार

भाई की कलाई जब सजती राखी से प्रेम से नाजों से लाडो से

शुभ वेला करती बहना भाई से दिल से मान मनुहार

फिर से जीवंत हो जाते जागृत हो जाते सभी सुप्त भाव गुलों गुलज़ार

बांध शगुन का धागा भाई को एक मीठा गीत सुनाती बहना

सदा पास रहना सुख दुःख सब एक साथ सहना परस्पर मानना कहना

कृष्ण सी प्रीत कृष्ण सी रक्षा कृष्ण सरीख सखा सदा तुम रहना

लेती बलाई बहना भाई पर होती निहार देती सबकुछ वार क्या कहना

सुन प्यारे तुम कभी नटखट कभी सयाने इस अटपट स्नेह के गहरे मायने

लाई बहना लाल रंग में भर अपार स्नेह

पीले रंग में दिव्य कृष्ण रूप स्वयं में उपहार

हरे रंग में सजी हरियाली यही रंग है खुशियों का सार

तीन रंगों में सिमटा त्रिगुणी भाव स्नेह साथ और सुविश्वास

माथे पर अक्षत वा चंदन का मंगल टीका करती बहना

तुम चंदा समान चमकना भाई सर्वश्रेष्ठ वा सर्वगुणसंपन्न

मिष्ठान से बढ़े प्रेम का जायका और आरती से ईश लगन

यह सुंदर भाव तृप्त करे चाहे संसार चाहे नैया भव पार

आजीवन चले हम जैसे चले आती जाती श्वास

दुनिया भले ही हो जाए बेगानी रहे हंसती बसती रहे हमारी कहानी

हर बंधन के कुछ मायने कुछ शुभ गुण कुछ संस्कार

कुछ प्यार कुछ तकरार लेकिन सिर्फ थोड़ा सा थोड़ी बार

सच्चे प्रेम में भक्त या भगवान दोनों ही पुलकित हो बंधे रहते ससम्मान

रेशम के धागे या दिल के धागे बंधे दोनों एक वचन एक समान

एक स्थूल तार एक सूक्ष्म तार पर दोनों में भरा गहरा भाव संचार

रक्षा बंधन सर्वोपरि बंधन आलौकिक बंधन फलता शुभ कर्मन

महाप्रेम रचित महाबंधन यह रक्षा सूत्र अभिन्न जीवन अंग सिर्फ प्रेम सूत्र

पर्व मनाते सगर्व सब संग जिसमें विष्णु महाअवतारी प्रकटे स्वयं

स्थूल से सूक्ष्म मेरी यात्रा (अंतिम भाग क्रमांक 6)

स्थूल मतलब भौतिक संसार और सूक्ष्म मतलब आध्यात्मिक संसार

गहरा अर्थ व गहरा सामर्थ्य स्थूल भाव व सूक्ष्म निष्कर्ष

निष्काम भक्ति व निःस्वार्थ कर्म यही तो है मानव धर्म

इस व्यर्थता भरे जीवन की सार्थकता उस दिव्य प्रेम के दर्शन है

जन्म से लेकर मृत्यु तक अज्ञानता से लेकर ज्ञानता तक

 स्थूल से लेकर सूक्ष्म तक और ब्रह्माण्ड से बिंदु तक

सभी मनुष्य यह जीवन यात्रा कैसे करते है यह पूर्णतया व्यक्तिगत है

संसार में श्रेष्ठ कर्म करने आए थे और पदार्थ से स्वयं को भरने बैठ गए

प्रेम से ऊपर कोई चीज़ नहीं प्रेम से जग भी अपना मैं भी अपना

नफरत से बुरी कोई चीज नहीं न जग अपना न मैं अपना

प्रेम से जीवन भरना था नफरत से भर लिया

प्रेम कमाना लक्ष्य हो तो भव सागर से तर जाए

पदार्थ कमाने की कामना से बहुत डूब गए

सर्वप्रथम हम स्वयं को संसार से खूब भरते हैं

और फिर इस भरे शरीर वा संसार को खाली करने की प्रक्रिया शुरू होती है

वानप्रस्थ अवस्था में जीवनभर बुने इन संबंधों और लगाव को

वक़्त के साथ साथ ढीला वा अलग करना श्रेयस्कर होता है

कोई इस मोह माया के बंधन से सदैव स्वतः मुक्त हैं और कोई चाह कर भी नहीं हो पाते

कर्म बंधन वा कर्म मुक्त होना ही जीवन की एकरसता व नीरसता है

एक कर्म हमें जमीं से जोड़ता है और एक कर्म हमें आसमां से जोड़ता है

जितना संसारी उतना ही मुश्किल लगाव से अलगाव की ओर जाना है

वृद्ध अवस्था में प्रारब्ध स्व आत्मा और परमात्मा शेष रह जाते है

स्थूल भारी तो सूक्ष्म हल्का होने का अहसास है

जितनी तैयारी और सामान कम रखेंगे उतनी जल्दी जीवन यात्रा संपूर्ण सफल वा सिद्ध होगी

सम भाव शांत भाव सरल भाव इसकी पहचान स्थूल से सूक्ष्म यह यात्रा मानव से मिट्टी कण इसका प्रमाण

जैसे जैसे हम बूढ़े होते जाते है प्रारब्ध भी पीछे छूटता जाता है

अंत में सिर्फ स्व आत्मा और परमात्मा रह जाते है

और एक दिन आत्मा परमात्मा में समाहित हो जाती है

और यहां स्थूल से शुरू मेरी सूक्ष्म रुप में पहुंचने की यात्रा समाप्त होती है

स्थूल से सूक्ष्म मेरी यात्रा (क्रमांक 5)

संवेदना और विवेक बहुत बड़े और गहरे दो दुर्लभ शब्द ही नहीं

अपितु विलक्षण प्रतिभा वा सद्गुण का मिश्रित रुप है

यह दिव्य गुण मनुष्य को प्रत्येक प्राणी से अलग करते है

और ईश्वर से भरपूर जोड़ते है

जीवन की जिस यात्रा को लोगों ने धन वैभव से पूरा किया

मैंने उसी जीवन यात्रा को पूरे तन मन से वैराग भाव से जिया जितनी जरुरत थी संसार से बस उतना ही लिया

लोग पृथ्वी से आकाश मार्ग होते हुए ईश्वर से मिलने जिस गंतव्य स्थान पर पहुँचे

मैंने उसी यात्रा को पाताल लोक के जरिए कर ईश्वर से मिलने उसी गंतव्य स्थान पर पहुंच उनसे फिर से जा मिला

बचपन से प्रौढ़ अवस्था शुरू से शिखर तक और फिर ढलान की ओर नीचे जाने जैसी थी न फैलाव न बहाव बस बिछुड़न वा सिकुड़न का भाव रहा प्रबल

श्रृंगार समाज परिवार कार्य क्षेत्र भ्रमण पर्यटन मिलन समारोह सब बंधन औपचारिक हो चुके थे

एक सांस में दूसरी सांस डालने का दस्तूर बस जारी था

आस पास का निरंतर शोर व पारिवारिक जिम्मेवारियां  सीमित हो गईं थी

सब ओर शांति थी सिर्फ जिस्म और जान एक दूसरे की ख़बर रख रहे थे

प्रकृति संपदा जैसे कि धरती गंगा ज्ञान गायत्री गीता जगत जननी ने मुझे सदैव प्रभावित वा पोषित किया

संसार से खाली और विरक्ति हुई तो दिव्य शक्तियों ने स्पष्ट रुप से उजागर होकर मुझे चकित कर दिया

स्थूल से सूक्ष्म मेरी यात्रा (क्रमांक 4)

अधेड़ उम्र की ओर बढ़े तो घटे लगाव वा ऊर्जा स्तर

दोनों जहां मुट्ठी में बांध सब चल भी और उड़ भी रहे थे

 न धरती न आसमां मुझे तो दोनों न मिले थे

धर्म कर्म में असंतुलन होने से दोनों पांव जमीं से उखड़ रहे थे

मैं शून्य में विचरता संसार मुझे पैसों के गणित में उलझाता  

लोग नया पाने को बेताब थे मैं पुराने मसलों से नैराश्य भाव में डूबा था

प्यार संवाद फिक्र मदद दिखावे में भरपूर थी पर दिल में नदारद थी

अकेले चलते है सब पर साथ निभाना थोड़े ही छोड़ते है

भावनाएं व्यवहारिकता के नीचे दब घुट गई काम निकले रिश्ते हुए फीके

अंधाधुंध दौड़ वा जीवन की आपाधापी में क्या कुछ सही गलत नज़र आता है

माया की मैल चढा सब खुश थे केवल मैं कर्मो से मैल निकालने में व्यस्त था

जीवन आधा मिला आधे में से भी आधा सबको बांटा

जो बचा उसे कैसे जीना है किसने आज तक बांचा

स्थूल से सूक्ष्म मेरी यात्रा (क्रमांक 3)

वक्त सरकता रहा मैं ज्ञानी अज्ञानता की रौ में चुपचाप बहता रहा

मैने आगे चलने के लिए सीधे नही उल्टे पांव दौड़ लगाई

दिल रोया आंख भर आई जुबां लड़खड़ाई

अच्छाई और सच्चाई तो सिर्फ ईश्वर सम्मुख काम आई

धैर्य धीरे और धर्म बनते हथियार जब वक्त और हालात छोड़ते बीच मझधार

दिल और दिमाग को कर दरकिनार शरीर ने निभाये सभी जरूरी किरदार

प्रेम को सीने में कर दफन नफरत झेलना भी है एक कला जाना पहचाना

जीवन सूत्र शिक्षा सूत्र और विश्वास सूत्र से होते है बड़े अलग वा विचित्र

अपनों में बेगाने और बेगानो में अपने आ मिले जाने कब

चलना मजबूरी है पर स्वाभिमान पर आंच आज भी नामंजूरी है

निराशा मुझे डूबो रही थी तो आशा मुझे रास्ता दिखा रही थी

लोग संसार कसकर पकड़े बैठे थे पर मेरे हाथों से जैसे संसार छूटा जा रहा था

स्थूल से सूक्ष्म मेरी यात्रा (क्रमांक 2)

जीवन में आया अगला नया मोड़

जिसने तन मन सपनें सब दिए निचोड़

उमंगों तरंगों से उत्साहित जवानी के रंग

अनुभव में पाया अध्यापन विवाह में समर्पण

मानों पिंजरे में कैद पंछी को मिल गए पर

कहानी का नया आगाज़ देखना सुनना पड़ा बिना आवाज़

बंद मुठ्ठी के खुले कई राज रोज़ बेहिसाब

सरल से कठिन हो गए कई सवाल मचा खूब बवाल

घर से बेघर या बेघर से घर समझा कितने साल

ऊंच नीच का खेल चलता रहा खौलता ठंडा भाव उमड़ता रहा

पद से विपद जद से जद्दोजद अनसुलझा अनकहा रहा हर मनोभाव

चल बल ढल बदल संभल फल कल पर थी सबकी नज़र

प्रेम की बीन पर थिरकते रहे हाथ और पाँव सुहाना हम समझते रहे सफर सालोंसाल

स्थूल से सूक्ष्म मेरी यात्रा (क्रमांक 1)

बचपन यौवन अधेड़ बुढ़ापा

सीधी सपाट सड़क नही यह जीवन यात्रा

लड़खड़ा कर खो देते है बड़े बड़े आपा

झटपट अटपट रही यह सुपात्रता या कुपात्रता

जीवन पथ पर मैं कुछ विचित्र चला

आड़ा तिरछा टेढ़ा मेढा मेल बेमेल कुछ मात्रा

मैने बांधे कुछ सपने कुछ आशा

निकल पड़ा मैं ओढ़ कर विश्वास भरा लबादा

परिवार पास पड़ोस विद्यालय पार्क बाज़ार

बस इतनी छोटी सी थीं मेरी बचपन यात्रा

खेलता खाता प्यार झगड़े से अटूट मेरा नाता

शिक्षा कौशल विकास से सबने मुझे भरा

बचपन अल्हड़ गुजरा यौवन में संसार जा पहुंचा

मैं नहीं ज़माने ने मुझे बदला है

इश्क़ बदला है मेरा मुकद्दर नही
काफिला बदला है मैंने मंजिल नहीं
शौक बदले है मेरे कुछ मिजाज़ अब भी है वही
जरुरतें कम हुई तो सांस लेने की थोड़ी फुर्सत मिली
हसरतें देती हैं उलाहना ऐ शायर ! जिंदगी बेहद कम मिली है तुझे
कदम आज भी न चाहते हुए बहकते और लड़खड़ाते है
मंदिर या मयखाना सफर का मिजाज खुद ही तय कर लेते है
अहसास न जाने क्यों मुझे बार बार टोकता रोकता वा तौलता है
रोज बिगड़ता है मुझ पर दिल तेरा क्या नजराना है
जो तू उसे बांटने को बाशिंदा गली गली ढूंढता है
खुदी से कभी गहरी दोस्ती खुदी से कभी गंभीर नाराजगी
खुदी से यह दीवानगी कभी सस्ती कभी मंहगी पड़ती है
सयाना या पागलपन तू कैसी अजीब छाप दूसरों पर ओ निर्मोही छोड़ता है
बेवफ़ा जिंदगी से न जाने कितने वादे कर लिए तूने
अपनी आवाज़ में अपने लिए ही अपनापन नहीं भाव कुछ गर्म सर्द है
जुबां सबके पास है बस अपने लिए एक हमदर्द जुबां तलाशने का मुद्दा है
नज़रे पाक साफ रखने को लगा लेता हूँ रोज गहरा काजल
पर खुद की नज़र से खुद क्या खुदा तक को कर देता हूँ बेसाख्ता घायल
दर्द दोष दरिद्र अब है मेरे बड़े पुराने सयाने और घनिष्ठ मित्र
अमीरों को सलाम ठोक अपनी खोली में दुबकने का खूब जज़्बा रखता हूँ
वक्त से क्या शिकवा गिला वक्त सबको देता एक सी खैरात बांटता सबको एक नज़र एक साथ
कोई इसे पाई पाई जोड़ तो कोई इसे दिल से खर्च करता है बेहिसाब
मंजर बदलते हैं लोग वही है जज्ज़बात बदलते हैं रगो में खून वही है
बस हाथ पैर मारना है यह जिंदगी या हाथ को मरहम बनाना भी है जिंदगी
बेमकसद इस जिंदगी में कुछ मकसद ढूंढ लेना शायद है जिंदगी
किसी के लिए लूटना तो किसी के लिए लुटाना है जिंदगी
सुकून खुदा है बाकी सब कहानी और किरदार जुदा दिखाती है जिंदगी
इंसान वा इंसानियत दोनों की सलामती की दुआ से खुबसूरत बनती है यह जिंदगी
इससे पहले वक्त बना दे मुझे एक रेत का निशां तू एक निशां दिलों में बना दे कहती है जिंदगी
जो बचा है इस उम्र में बस अब वो ही तेरी पहचान व खज़ाना है
जीवन की सारी व्यर्थता तो स्वयं बह गई कोशिश कर कुछ सार्थकता छोड़ जाना है बाकी जिंदगी

जिंदगी से कुछ रंग ले तो कुछ रंग भरे भी

जिंदगी मुझसे मिलती है रोज और पूछती है बरबस कुछ सवाल

मेरे जिंदा होने के माँगती है पुख्ता सबूत जिंदादिली के साथ

सहारे निर्बलता है जड़ता है नीरसता है उठ चल बहुत बल है तेरे पास

घोर संघर्ष कर ना बैठ चुपचाप बदहवास हताश या खुद से कहता काश

बस बहुत हुआ सबका इंतजार कुछ ठोस कदम उठा कर आगाज़

आरामतलबी से लड़ना है अब तुझे पुरजोर काम को बना हथियार

क्षण प्रति क्षण बदल रहा है जमाना तू झुझ समझबूझ से काबू कर हालात

खुद को संवार कर्म-कर्तव्यों का बजा बिगुल सर्वत्र एकसार

प्रेम में न बन कैदी तुझी से तेरी आज़ादी मांगती है कुछ तो रख सरोकार

मनगढ़ंत बातों और बंधनों से कब होगा तू मुक्त संयुक्त और आबाद

नेमतें मिली है बेशक बेशुमार तो कीमत भी देने को हो जा तैयार

                             मुफ़्त में और हल्के में लेने से प्रकृति होती नाराज़ शुक्र फिक्र करते सब धमाल                     

पुरानी स्मृतियां पुरानी सोच पुराने रीत रिवाज़ कर विध्वंस जर्जर तेरे हालात

नए के लिए बना जगह नई सोच नयी आशा नए भाव से नई शुरुआत

तेरी कहानी तूझे ही लिखनी पढ़नी और सुनानी लोक सभ्यता में कर प्रचार

कुछ भाग्य ब्रह्मा ने लिखा कुछ तू भी लिख कर्मरूपी कलम सदा तेरे हाथ

सक्षम संबल सशक्त रचते इतिहास टूटते बिखरते फिर भी बसते आकाश बन प्रकाश

मनोबल तनोबल आत्मबल गिरे तो फ़िर से उठना न भूलना चेष्टा व बल प्रयास

स्व तृप्ति से ऊपर उठ वसुधैव कुटुम्बकम् तृप्ति से उपजे देवत्व भाव

चाह राह वाह वालों को किसकी परवाह कुछ खुद कुछ खुदा की बँदगी में छिपे है सारे राज

Independence Day

Be Indian buy Indian and brave Indian that’s all about being a true Indian. let’s feel good, proud and polite for breathing in independent nation confidently.
“a patriotic expression on the occasion of Independence Day””
Independence day 2
15th August long live India ! proudly we say
honor and freedom we enjoy today
freedom fighters willingly laid their heads to slay
Fearless breath on free soil we wanted no foul play
Happiness and privilege we demanded before time decay
Freedom spirit highlights unity in diversity is evergreen not color of grey
love peace and harmony daily we all pray
Colors of patriotism vividly portray
Proudly humbly gladly we Indians sway
Bravery chivalry glory run in our blood so do we obey
Martyrs fought intensely our national flag will always stay
Innumerable sacrifices were made and witnessed to make this day
Hope sustains life no-one can deprive autonomy simply display
Independence is our soul need we rigidly convey
We preserve we deserve we serve our nation in great loving way
Tearful reverence for immortal souls we can’t forget them and repay
Light and strength of freedom highly blessed on us in a divine ray
Independence Day 2

ये आजादी

ये आजादी – 2

खुशियों की वादी – 2

ख़ून से लिखी

कहानी ये न सादी

संघर्ष बुनियादी

ये आजादी – 2

खुशियों की वादी – 2

हर साँस आभारी

बंदी बने योद्धा सौंप आजादी

खिलती रहे बगिया गुलाबी रंग आबादी

ये आजादी – 2

खुशियों की वादी – 2

सपनों के पंखों को रखो न कैदी

वीरों ने दी उड़ानें रुके न कदम गादी

तिरंगे की शान बढ़े दिन राती हर दिल जैसे शहजादी

ये आजादी – 2

खुशियों की वादी – 2

देश का गौरव

शहीद उन्मादी

सब पर पड़ी भारी गाँधी की खादी

ये आजादी – 2

खुशियों की वादी – 2

दिलों में बगावत कहीं न हो बर्बादी

अपने वीरों का सीना यहाँ फौलादी

इस कुर्बानी का देखो न अंत न आदि

ये आजादी – 2

खुशियों की वादी – 2

न हीरे न मोती न सोना न चाँदी

अपना हिंदुस्ता गुलिस्तां है सौहादी

15 अगस्त को जहाँ में की मुनादी

ये आजादी – 2

खुशियों की वादी – 2

जिंदगी एक मायने अनेक

जिंदगी क्या है यारों ?

एक किस्सा एक कहानी

कहते सुनाते सब जुबानी

वक़्त की कारस्तानी

या कायनात की बेहतरीन रवानी

एक सुहाना सफर

घूमो फिरो मस्त बेफिक्र

ना ना टिककर बैठो यह है एक तपस्या

बिना प्रयास बिना जतन केवल यह समस्या

क्या है यह एक मोटी किताब ?

पढ़ो लिखो समझो रखो पल पल का हिसाब

एक सुनहरा ख्वाब बड़ी लाजवाब

जो चाहो जो सोचो मिले बेहिसाब

बेहद स्वाद बहुत मज़ा है इसमें नहीं है यह सजा 

नहीं पहाड़ के जैसी जिसे करना हो फतेह कल या आज

मेहनत का काम रोज़ कुँआ खोदो पानी भरो ढेरों काम

प्यार कारोबार या धोखे का धुऑं धुऑं संसार

जितनी पकड़ में आये ठीक बाकी बेकार

सयाने कहते जिंदगी एक अनमोल तोहफा

सब्र से खोलो सहेज के रखो शुक्रिया का दो मौका

शैतान ने कहा खज़ाना है जिंदगी लूट लो कूट लो फूट लो

सब कर्मों का खेल हार जीत हर पारी जोश से खेलो

अनमोल मोती सा संभाले रखना कम वरतना अनोखी इसकी सुंदरता

एक रहस्य एक पहेली एक चक्रव्यूह एक कांच की गोली

 अनसुलझे किस्से खोजो अकेले या संग सहेली

रंगीन बंद लिफाफा ज्ञान जानकारी से भरा फलसफा

पुरखों की सौगात हलके में न लेना बनेगी कैसे बात

वरदान जिंदगी नादान जिंदगी मेहरबान जिंदगी

कभी वाह कभी आह बस जिंदादिली है जिंदगी

ध्यान से सोचो तो खुद में खुदा की बन्दगी है जिंदगी

क्यों पत्थर रह गए तेरे लिए भगवान ?

गर तोड़ने पड़े तुझे पत्थर पग पग जीवन में

पाषाण हृदय के लोगों से जुड़े तेरे तार और संचार

तो समझ लेना मानूख पत्थर बन के रह गए तेरे भगवान

न पाए तूने सौभाग्य में न बदल सका अपना कटु भाग्य नियति मान

सिर्फ पत्थर के बन के रह गए तेरे लिए भगवान

इंसान भी पत्थर भगवान भी पत्थर दोनों ही तेरे लिए पत्थर समान

तुझे पत्थर बनने में कितना समय लगा होगा भोले नादान

लाख मिन्नतें की हजार बार हाथ जोड़े

सैकड़ों बार प्रार्थना की अनगिनत रखे व्रत उपवास

क्या रुख बदल सके यह सब प्रयास दुनिया का तेरे वास्ते विश्वास

रेंग रेंग घुटनों के बल चलना पड़ा तुझे सलामत भले ही थे तेरे हाथ पांव

क्या गलती की थी जो न संभलती थी न संवरती थी

क्षमा प्रायश्चित दंड मुंड सब झेल लिए बिना संवाद

शायद पिघल जाए दोनों में से एक इंसान या भगवान

पत्थर के निकले दोनों ही क्या समझा पगले पहचान

इंसान को समझा भगवान और भगवान को समझा इंसान

कर्मों की खेती में अज्ञानतावश फेंके बीज भर भर पंच विकार

जो फसल काटी वो न मिली न खिली न फली सब जत्न बेकार

भूख से व्याकुल रहा जीवन खाली रही भोजन थाली

तू पत्थर पर जल अर्पित करता रहा तू पंचामृत से अभिषेक करता रहा

तू श्रृंगार करता रहा तू भोग लगाता रहा निराकार को कर साकार

तू स्वयं जीव होते हुए भी पत्थर बन दोनों पत्थर में प्राण फूंकता रहा

तू स्वयं रोता रहा भगवान को भिगोता रहा और इंसान को पोषण देता रहा

तेरे कर्म का मर्म था इतना भारी न उठा सका तू और तेरी समझदारी

तराजू में तूल गया जीवन पर कर्ज न चुका पाया हर बारी

मनुष्य पाषाण युग से तो निकल आया

पर पाषाण के बीज की पोटली में साथ बांध लाया

दिल के हर पत्थर पर लिखी है एक अनमोल कहानी

जो पढ़ सके निर्मल मन से मिला न ऐसा परम ज्ञानी

नए जन्म नई खेती नए कर्म की ओर फिर से गमन

नई आशा की मिलेगी राह में नन्ही किरण

अगली बार कर्म की तख्ती पर दिल खोल के लिखना

कुछ ऐसा सुनहरा कर्म करना मानवता को मान धर्म

कहना न पड़े तुझे पत्थर के मेरे भगवान

पत्थर के मेरे सनम

251st post on blog

life through poems

In little steps I witnessed that writing is a huge journey

I started lonely without guidance and my honey

Reading is fun writing is like holding Sun I got pretty afraid

What would I interact in the course black gold or mermaid

I had put pen and paper in my lap

Chaos world challenged me to map

Initially everyone supported me wholeheartdly

I was naïve still they promoted my work soundly

I wanted to say so much with great feel

No one had time and interest in my appeal

Rushing from kitchen platform to social platform

Maybe a writer took a birth inside me after I became a mom

Fortune asked me to follow the weird path

Public wants to see you how deeply you take sunbath

Before I could utter them my helplessness

They said write on the subjects of entertainment without fuss

I wanted to write on life’s harsh reality

But they wanted to read light stuff without penalty

Some willingly said hi when I wrote the matter of quality

Some said bye you sound so absurd, outdated and frivolity

 I assumed all my well-wishers always behind me

When I looked back I found my shadow only kind enough to encourage me

During five years of writing and uploading 251posts

I met some angels as well as some ghosts

A breakthrough came in the fifth year that brought me fame

One of my poems got wider recognition and I became a big name.

For me, it was indeed sweet fruit of perseverance.

 Writing is god-gifted I accepted it largeheartedly with reverence.

In fact, I enjoyed each milestone I located and still enjoying my blog website.

Black gold wrapped in white paper really delights me as universe vibes send me new invite

Negatives have more role to play in judging a writer’s strength

Thanks and regards to all my kind readers who became my divine wavelength

प्रभू प्रेम प्रचुर प्रकटे

प्रभू ने कहा

खुश रहो

गुरु ने कहा

जपते रहो

पिता ने कहा

जीते रहो

मां ने कहा

प्रेम से रहो

भाई ने कहा

जुड़े रहो

बहन ने कहा

फलते रहो

दोस्त ने कहा

मस्त रहो

शिक्षक ने कहा

पढ़ते रहो

साथी ने कहा

खेलते रहो

डॉक्टर ने कहा

स्वस्थ रहो

पति ने कहा

समझते रहो

यात्री ने कहा

चलते रहो

बच्चों ने कहा

पकाते रहो

शुभचिंतक ने कहा

खिलते रहो

पड़ोसी ने कहा

मिलते रहो

बैंक ने कहा

भरते रहो

सौदागर ने कहा

खरीददते रहो

वक्त ने कहा

संभलते रहो

जब तक संसार में रहो

लेने देन से खुशियां बांटते रहो

मैं में न रहो

सब संग रहो

राम में रमे रहो

प्रभू भात से पात्र भरते रहो

शोहरत कहां कीमत बिना

शोहरत का यह जो रस्ता है ना

क्या सीधा-सादा, सरल-सपाट और सस्ता है ?

नही ना, जनाब तो ठीक समझे आप

नामुमकिन को मुमकिन बनाने में अच्छा खासा वक्त, दिमाग वा मेहनत लगती है

तब कहीं जाकर मुकद्दर सूरज सा चमकता है

सबको कहां मिलता, रास आता और पचता है

बड़ो-बड़ो को धूल चटा गुमनामी में पटकता है

कभी यह नाग बनकर डसता है

कभी कभी तो मूर्ख बना कर हंसता है

स्वर्ग से पहले नर्क से जो होकर गुजरता है

ताजपोशी, तिलक समारोह और सम्मान की फूलमाला गले में पहनने से पहले साहब

बहुत कुछ पकता है, बिकता है, छलता है, गलता है, बदलता है, टूटता है, बिखरता है, परखता है

वक्त की नज़रे इनायत वा नेक नीयत दोनों जब मिले

तब जाकर यश-धन, मान-सम्मान, ईनाम मिलता है

क्योंकि यारों एक बात यह अच्छे से समझ लो

नाम की चाशनी में डूबने से पहले बंदे को

जलेबी की तरह गोल -गोल घूमना पड़ता है

गर्म-गर्म तेल में डूबकर पकना पड़ता है

फिर दुकान के खानों में वा डिब्बों में सज-धज कर सबको लुभाना पड़ता है

खरीदार की भूख वा उत्तम स्वाद के पैमानों पर खरा उतरना पड़ता है

तब जाकर शोहरत की चाशनी वा जायके का असली स्वाद पता चलता है

आदमी हो या मिठाई बाजार देखकर दोनों को तुलना पड़ता है

शून्य का महत्व

एक दिन मैं सच में शून्य हो गया

मुझमें मैं गायब हो गया

सब ठीक ठाक चल रहा था

अचानक न जाने मुझे क्या हो गया

वक्त अपना था मैं घर में आराम से बिखरा था

बिना खबर न जाने वक्त क्यों तिरछी नजर कर गया

खुद से टूटा रिश्तों से बिखरा बेसुरा सा जीवन हो गया

अहसास में घर कैसा अजनबी सा हो गया था

न चाहते हुए भी सबकी नजरों का शूल बन गया था

अपनी सोच अपने कर्म अपनी रवानगी में न जाने कितनी दूर तक बह गया था

अपनों को लेकर जो गुमान था

पलभर में मिट्टी का सा हो गया था

अच्छा हूं अच्छी नीयत रखता हूं

अच्छे से दुनिया समझता हूं

अच्छाई के दो लफ्जों में फिर अकस्मात खुद ही उलझ कर क्यों रह गया था

अकेला और उदास मै खड़ा था

पानी मेरे सामने था बुझा न सका मेरी प्यास को मैं काहे को प्यासा रह गया था

 क्या करूं पछतावे की अग्नि में न चाहते हुए भी जलना पड़ा था

सच लेता है बड़े बड़े इम्तिहान

कड़ी परीक्षा में असफल हो जाते अच्छे भले इंसान भूल गया था

झूठ से डरता था मैं फिर कैसे असफल हो गया था

खुदा से क्या कहता खता मेरी अपनी थी

सच भारी था दुनिया ने मुझे हल्के में ले लिया था

गलती कहो या अपराध सत्य की सजा तो दोषी को मिलनी थी

मन विरक्ति की अनगिनत सीमाएं लांघ चुका था

जीवन का महत्व जैसे पल भर में चूर चूर हो गया था

जब मन बुद्धि और आत्मा बिछुड जाते है परमात्मा से तो कैसे जिएं

रास्ता भटक जाते है राहीगर बिन कसूर जीवन से भागते भागते कैसे माने

मानो न मानो दुनिया से कट मेरा अस्तित्व ही जैसे खो गया था

चिंता बेचैन कर रही थी प्रतिपल प्रतिक्षण प्राण हर रही थी

मैं सारा दिन काम में व्यस्त होने का ढोंग करता रहा था

हार कर संध्या को मैं टहलने निकल गया था

मैं कदम दर कदम नापता गया था

दिन भर का अवसाद स्वत: धीरे धीरे हवा में घुलता गया था

वापिस घर पहुंचा तो मैं एकदम खाली और हल्का महसूस कर रहा था

बेवजह के धुंए के बादल छिटक कर उड़ गए थे

आईने में मैं खुद से मिल बहुत खुश था

मुझे शुन्य से एक बनने में बहुत समय वा ऊर्जा लगी थी

आदमी से इंसान की दूरी पल भर में समझ गया था