संसार की रचना करने वाली शक्ति न पुरुष है न नारी बल्कि एकलिंग, शिवलिंग या शिवशक्ति के रूप में जानी जाती है | दो भागो में व्यक्त यही परम शक्ति आधी प्रकट होती है पुरुष रूप में और आधी प्रकट होती है नारी रूप में और संयुक्त रूप व भाव से, अर्धनारीश्वर का सौम्य रूप कहलाती है | शिव ने वरण किया हर जन्म में पार्वती का और पार्वती ने शिव का | शिव अधूरा पार्वती के बिना, पार्वती अधूरी शिव के बिना | जब दोनों हुए अलग और रहना पड़ा एक दूसरे के बिना, तब-तब सृष्टि में विध्वंस हुआ | जब दोनों पुनः मिले, दोनों शक्तियाँ, एकाकार होकर, पूरक, सम्मोहक व सम्पूर्ण बनी | एक दूसरे में समाहित होने पर, आलौकिक संसार की रचना कर, एकनिष्ठ व बलिष्ठ शक्ति का अद्वित्य रूप कहलाये | एक बना बाह्र्य शक्ति का सुदृढ़ आवरण, दूसरा बना आतंरिक शक्ति का कोमल भरण | संगठित भाव से, समर्पित भाव से जुड़, एकमय हो, एक दूसरे के प्रेमाधीन हो, एक दूसरे से संचालित हो, अर्धनारीश्वर का सुंदर रूप बन, एकमैव व एकल शक्ति का प्राकट्य रूप कहलाए |
एक बना शरीर तो दूसरा बना आत्मा ,एक बना आकाश तो दूसरा बना पृथ्वी, एक बना पुल्लिंग तो दूसरा बना स्त्रीलिंग, एक बना स्वार्थी तो दूसरा बना निःस्वार्थी, एक बना क्रूर तो दूसरा बना कोमल |
जब दिव्य शक्तियाँ परस्पर प्रेम और विश्वास को आधार बना चलती है, तो सृष्टि की रचना होती है और यह बखूबी चलती है | शक्ति का प्रारूप एक से दो भागो में बँट कर असंख्य रूप में परिवर्तित हो जाता है और सृष्टि कल्याण सम्मत हो जाता है, तब भी यह सदैव एकरूप, एकलिंग, शक्तिलिंग ही कहलाता है |
ये शक्तियाँ दिखती और कार्य अलग-अलग रूप से करती है पर उसके तार,संचार और प्रसार माध्यम एक ही रहते है |
स्वर्ग सी रचना और परिकल्पना का यह दैव्य रूप धरती पर प्रकट होते ही बदल जाता है |
अंबर में यह शक्तियाँ टूटकर भी जुड़ी रहती है और सदैव अखण्ड रहती है | पर यही दोनों शक्तियाँ धरती पर जन्म लेते ही अलग रूप से परिभाषित व संचालित हो जाती है | न तो यह भली भांति जुड़ पाती है न यह भली भांति टूट पाती है, अक्सर विघटित होकर निर्बल रूप में बिखर जाती है |
पुरुष अलग एकल शक्ति और स्त्री अलग एकल शक्ति में बँट जाते है और यही अलगाव, बिखराव, विभाजन व असंतुलन, मानवता की दुर्बलता का कारण बनता है | यह परंपरा सदियों से, युगों-युगों से कहर ढा रही है और मानव जीवन की सबसे बड़ी विडंबना और त्रासदी का कारण है | दो रूपों में बँट कर यह शक्तियाँ, दो हिस्सों में बँट कर रह जाती है | यँहा दिव्यता नहीं, मनुष्यता की भूमिका बड़ी हो जाती है | एकम का यह भाव व अर्थ पृथ्वी पर आते ही सुप्त, कुपित व विलुप्त अवस्था में रह जाता है |
ये शक्तियाँ पैदा तो एक समान होती है पर न स्वीकारी जाती है, न दिखती है, न चलती है, न सामंजस्य, न विकसित होती नजर आती है | दोनों रूप परस्पर बोधि, विरोधी और क्रोधी हो जाते है | एक शक्ति का दूसरी शक्ति से घर्षण, प्रतिस्पर्द्धन, हनन और विघटन ही सम्पूर्ण मानव जाति के पतन का कारण बन जाता है | जब यह एकाकार होती है तो मानव जाति का निर्माण, विकास, उत्थान व परम कल्याण होता है और प्रतिरोधी हो जाए तो विध्वंसकारी हो सब नष्ट कर देती है |
धरा पर विवाह बंधन इन शक्तियाँ को मजबूत संबंधों में बांध इसे श्रेष्ठता व पराकाष्ठा की गरिमा प्रदान करता है | विवाह निबाह बेशक बेहद कठिन है और तनाव इसका धरातल है, पर सृष्टि की एकलिंग शक्ति का यह परम आधार और समर्पण भाव है | परिणय सूत्र में इन्ही छह शक्तियों का मिलान, जुड़ाव व गठ बंधन होता है | दो शिवशक्ति, दो रूप पुरुष में पुरुषस्त्री व दो रूप स्त्री में पुरुषस्त्री इस प्रकार कुल मिलाकर इन छह शक्तियों का मेल-मिलाप व आह्वान अग्नि समक्ष किया जाता है | यानि की विवाह संस्था दैविक, आध्यात्मिक व भौतिक सभी स्तरों पर जुड़कर मज़बूत बनती है | पर यह दिव्य व महत्वपूर्ण विचार, न आचार-व्यवहार में लाये जाते है, न निभाए जाते है ,न स्मरण में रखे जाते है | कंही यह भाव फलित, कंही चलित, कंही निष्फलित, कंही खंडित व कंही कलंकित हो जाते है |
विवाह का दिव्य स्वरुप इसलिए रचा गया क्योंकी पुरुष हो या स्त्री दोनों एक दूसरे पर निर्भर है और अधूरे है एक दूसरे के बिना दोनों का कोई अस्तित्व भी नहीं है, दोनों में खूबियाँ और खामियाँ भी है, जो स्वीकार्य कम और ठुकराई ज्यादा जाती है |
विवाह के बाद पुरुष केवल अपने अंदर पौरुष शक्ति को लेकर चलता है, उसके भीतर बैठी स्त्री, उसमें सामाजिक तौर पर न स्वीकारी जाती है, न विकसित की जाती है, न पोषण पाती है, बल्कि दबाई, कुचली या मार दी जाती है | जबकि स्त्री में पुरुष का भी रूप साथ-साथ स्वीकारा, विकसित, पोषित और सँवारा जाता है | अतः विवाह पश्चात् स्त्री को पुरुष में केवल पुरुष ही मिलता है स्त्री नहीं, जो उसे समझे, साथ दे और सराहे, उसके अधूरेपन को पूर्ण करे |
यंहा पुरुष का परम सौभाग्य है कि उसे स्त्री में, स्त्री और पुरुष दोनों रूप, स्वतः विकसित, पोषित और प्रफुल्लित रूप में प्राप्त होते है |
पुरुष में स्त्री का सुप्त भाव और स्त्री में पुरुष का जागृत भाव, यही रिश्तों में असंतुलन और अराजकता का कारण बनता है | क्योंकि एक शारीरिक रूप से अत्यधिक प्रबल हो गया और दूसरा शारीरिक से कम और बौद्धिक रूप से सबल हो जाता है अतः तभी विवाह में स्त्रियों को ज्यादा महत्व, बड़ी भूमिका व कठिन जिम्मेवारी दी जाती है क्योंकी भले ही वह शरीर व बुद्धि से पुरुष के मामले में क्षीण प्रतीत होती हो, पर पृथ्वी तत्व होने से उनमें सहने, दबने व बर्दाश्त करने की प्रबल शक्ति होती है और विवाह को चलाने में उसकी बड़ी गहन भूमिका और निर्वाहन शक्ति ज्यादा होती है |
सतयुग, द्वापर, त्रेता युग में यह शक्तियाँ असमान होते हुए भी, कंही न कंही एक दूसरे के समर्थन में, चाहे अनचाहे, गाहे बेगाहे, मन बेमन से, खड़ी रही और सृष्टि पलती व बढ़ती रही | पर कलयुग ने इस समीकरण को बिल्कुल बदल कर रख दिया है और एक जटिल, पेचीदा और कुंठित समाज की रचना कर दी है | क्योकिं अब यह शक्तियाँ आगे पीछे नहीं चलती, साथ साथ चलने से टकराती है | क्योंकि यह शक्तियाँ एक दूसरे के लिए और एक दूसरे की सहमति से नहीं चलती, बल्कि बराबरी की मांग, स्वतंत्रता का पैगाम, जीने का सुंदर प्रावधान और एक समान विकल्प मांगती है | अब पुरुष को अपने भीतर की स्त्री व बाहर की स्त्री दोनों से जूझना, लड़ना व संभालना पड़ रहा है | स्त्रियों ने भी भीतर के पुरुष को जागृत कर, विकसित कर, पुरुषों के संसार में घुस कर, पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती दी है | वे सभी कार्य जो अपनी अपनी दिशा व कार्य क्षेत्र संबंधी थे, अब सब बराबर-बराबर बँट गए है | युद्ध स्तर पर उतरी महिलाएँ, अब समान समान बँट गए इन कार्यों को बिना किसी भेदभाव के, बिना रोक-टोक के कर रही है, लेकिन संसार में किसकी ज्यादा जिम्मेवारी और किसकी ज्यादा भूमिका का असंतुलन कायम हो गया है | सभी प्राणी व जीव फलित हुए है या नहीं, पर सभी शोषित व पीड़ित जरूर हुए है | मनुष्य की पात्रता, शक्ति-समार्थ्य, क्षमता व काबलियत, कुछ भी इस बिगड़ी व्यवस्था को संभाल नहीं सकी | न सुधरे हालात, न संभले जज़्बात, न बदली कायनात, पर इस लचर प्रबंधन ने किसी को नहीं छोड़ा बल्कि पोषित कम शोषित ज्यादा किया है |
क्या हम ऐसे समाज की रचना करे जिसमें पुरुष अलग और स्त्री अलग रहे यदि ऐसा हो जाए तो संसार में कुछ नहीं बचेगा यह तो दूसरे की गलती पर खुद को दंड देने जैसा हुआ |
सृष्टि का निर्माण ही मानवता के लिए हुआ है जिसमें जुड़ाव, फैलाव व प्रभाव जरुरी तत्व है | उस एक महाशक्ति को आप बाँट सकते है पर उसे तोड़ना, मरोड़ना और दुरुपयोग करना कंही भी, किसी भी समाज में अनिवार्य व स्वीकार्य नहीं है |
लिंग भेद, सत्ता भेद, शक्ति भेद ने समाज को तितर बितर कर रख दिया है | बराबरी की इस लड़ाई में, औरतें पुरुषो से भी आगे निकल गयी, पर पुरुष सत्ता वैसी की वैसी है, जस की तस और कोरी की कोरी है | न बदले तुम, न बदले हम, दोनों का भारी नुकसान हो गया | शक्ति-मद और अहंकार में दोनों का सब छूट गया, दिल टूट गया और ज्यादा खामियाजा औरत सत्ता को भुगतना पड़ा क्योंकि उसके जीवन के सभी समीकरण बिगड़ गए और विध्वंस हो गए |
लिंग सरंचना की सृष्टि में अपनी अपनी भूमिका को समझने की बजाय, दोनों इस में इस कदर उलझ कर रह गए और सारी सृष्टि शंकित, भयभीत और आतंकित हो गयी | यह वर्गीकरण व पृथककरण, स्त्री पुरुषों के समलैंगिक विवाह के रूप में देखा जा सकता है | (LGBT) इसका जीवंत उदहारण है | यह सभी स्त्री का केवल स्त्री से पोषण व पुरुष का पुरुष से पोषण, अर्धनारीश्वर रूप का कलयुगी दर्शन व परिवर्तन दर्शाता है | समलैंगिक विवाह इन सभी प्रश्न व प्रकरण में अर्धनारीश्वर के बनते बिगड़ते स्वरुप है | अपने ही अस्तित्व के प्रश्न में अधिकतर लोग उलझे, परेशान, हैरान, फँस कर रह गए है | आपरेशन द्वारा लिंग परिवर्तन अपनी काया में स्त्री को मारता पुरुष और पुरुष को मारती स्त्री, यह सब स्वयं, परिवार व समाज सभी के लिए घातक और यक्ष प्रश्न जैसा हो गया है |
अपनी पहचान, अपने अस्तित्व व अपने प्रकृति प्रदत्त स्वरुप को लेकर इतना होहल्ला मचा है कि लगता ही नहीं हम इसी पृथ्वी के जीव है, बल्कि अंतरिक्ष लोक से उतरे प्राणी लगते है |
दोनों स्त्री पुरुष प्रकृति की तुला के दो हिस्से है न कम न ज्यादा, कभी एक भारी कभी दूसरा हल्का, कभी एक ऊपर कभी दूसरा नीचे, शक्तियों में बराबर, पर फिर भी जुड़े रहते एक टाँके से, सहचार्य, संतुलन, सम्पूर्ण आनंद हेतु, काहे की तुतु मैंमैं और अगर है भी तो, आनंद लो और चलो भाई आगे |
अर्धनारीश्वर का एक बड़ा उदहारण किन्नर जाति के लोग है जो द्विलिंगी कहलाते है जो प्रकृति की संयुक्त सरंचना अर्धनारीश्वर की जीवंत मिसाल है | संसार से विरक्त व निष्काषित यह जाति, शक्तियों में उन्नत और वरदान या अभिशाप देने में सशक्त है | ईश्वर का प्रारूप, अनोखा, सम्पूर्ण पर फिर भी सामाजिक अस्वीकृत रहता है यह रूप |
यानि की बेकार की लड़ाई में पुरुष व स्त्री दोनों ने उम्र गवाईं |
सारा तांडव तो काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार का चल रहा है | सभ्यता सँवारने से पहले इंसान को खुद को संभालना व सँवारना होगा, यह उसकी नैतिक, बौद्धिक व सामाजिक जिम्मेवारी है |
शक्तियों का द्वंद, छंद व फंद चलता रहेगा जब तक रहेगी यह दुनिया | नर नारी में अर्धनारीश्वर की दिव्य शक्ति का रहेगा पलड़ा भारी, स्वीकारों सब भाव आनंद, हाथ जोड़ प्रभु से करते सब गुजारिश आँख बंद |
ॐ नमः शिवाय