बोल साचे दरबार की जय

बोल साचे दरबार की जय

⛩️🔔🌹♥️🙏😍🥰

फिर भक्तों के प्राणों में करने को संचार

अंबे पहुंची धरती पर हो शेर पर सवार

शक्ति प्राण चेतना जागृत दिव्य स्वरूप

मां पहुंची देखने बच्चों का बेहाल रूप

तुम पुकारों न पुकारों कृपा से है भरपूर

कर्म ज्ञान भक्ति के भरेगी प्याले जरूर

आओ महामाई के दिल खोल गुण गाए

सुख भरे दुःख हरे मन से शक्ति ध्याय

नवरात्रों की मची धूम जीभर झूम प्रचूर

नौ दिन असंख्य कामनाएं है अब मंजूर

“जय माता दी” 🧘‍♀️🙌💃

मेरी जान मेरा जहान तू भगवान

हे जगदीश ! हे भगवान !

मेरे छोटे से इस जीवन काल में

मैं तुझे काहे न समझ सका घोर अज्ञान

कैसे भूला तेरी अनोखी पहचान

मेरे पैरों तले तू रहा आजीवन बन भूमि

मैं चला बड़ी शान बड़े आराम

मेरे सिर पर तू बैठा छत स्वरुप गगन विशाल

मैं न जाना तेरा रूप तेरी कृपा महान

मेरी श्वास में बहता निश दिन तू बन साँसे

प्राण वायु का ओजोमय संचार

मेरे तन में जठराग्नि और सूर्य का बन प्रकाश

तू अपनी ऊष्मा से रहा मुझे सेंकता हर ऋतु

मुझे रखने को पवित्र बना कभी गंगा कभी जमुना

स्वच्छ पावन जीवन रखने को प्रतिबद्ध करुनानिधान

मैं तुझे क्यों न देखूँ क्यों न चाहूँ तेरा दीदार

हे भगवान ! कृतज्ञता ही जीवन आधार

मेरी अनभिज्ञता को तू कर माफ प्रेम स्वरुप जान

अकेले के मेले

अकेले ही तुझे चलना है
अकेले ही संभलना है
अकेले ही पढ़ना है
अकेले ही समझना है
अकेले ही कमाना है
अकेले ही खाना है
अकेले की ही मदद है
अकेले के ही दर्द है
अकेले ही हमदर्द है
अकेले ही हर डर से लड़ना है
अकेले ही हर हाल में जीतना है
अकेले ही रोना है
अकेले ही हँसना है
अकेले ही आए है
अकेले ही जाना है
अकेले तय करनी सबने अपनी मंजिल है
कहने को है सब अपने हैअपनी बड़ी सी दुनिया
पर दरअसल हर शख्स की अकेले की यहाँ दास्ताँ है
जिंदगी बस एक इतना छोटा सा अफसाना है

माँ की झोली

माँ की झोली 🌸🌿🌺🌹👩‍👧👨‍👩‍👧‍👦🙏🥰😘🤗

हमनें सदा ही देखी

हरी हरी भरी भरी माँ की झोली

हमें दिखाती जैसे बैठी

सदा फ़ूलों की डोली

जो माँगो झट से दे देती

न कभी ना बोली

उम्र गुजरी सदिया बीती

वही मुस्कराहट वही तसल्ली

मैं हूँ न मत करो चिंता

वही प्रेम भरी बोली

जब छूटा माँ का आँचल

देखनी पड़ी उसकी बेशकीमती झोली

मैं हैरान मैं परेशान मैं नादान

कहाँ है वो फ़ूल जो उसने बाँटे भर भर झोली

माँ ने सदा छुपा के रखी अपनी खाली झोली

अंत में झोली से निकले कुछ तराशे पत्थर

जो संसार ने उसे दिए भर भर समझ भोली

आशीर्वाद के सारे फ़ूल हमारे हवाले कर वो तो चली

अभिशाप के सारे पत्थर ले गयी साथ

आखिर तक छुपा के रखी अपनी करामती झोली

माँ तू सचमुच भोली माँ तू सचमुच भोली

जी जाती कुछ और जो चुन लेती सिर्फ एक मतलब की गोली

क्या मैं निर्वंशी ?

“वसुधैव कुटुम्बकम्” का एक ही पर्याय

सम्पूर्ण संसार एक परिवार एक कुटुम्भ सर्वसुखाए

रचनाकार स्वयं वासुदेव कृष्ण भगवान

वो त्रिलोकी  रखता अपने परिवार का मान सम्मान

उस परमात्मा में सभी प्राणियों की जान

रक्षक संरक्षक शिक्षक उसकी कृपाएँ महान

ले अवतार उतरा जब धरती पर

सुख दुःख वरदान अभिशाप उसने भी झेले

वो वंशीवाला सजाता हर वंश उसकी मर्ज़ी चलती अंश अंश

झेले वंशदंश अभिशाप यदुवंशियों का न रहे वंश अंश

फिर हम और आप क्या बिसात लड़े उसकी मर्ज़ी से

बेकार ही लड़े खुद से भाग्य से परिवार से समाज से

यूँही नहीं बनाई उसने दुनिया कर्म के बड़े कठोर नियम

संसार उत्पत्ति करने वाले ने खुद भी निभाए यह कड़े नियम

वो चलाता अपनी दुनिया क्या अपने क्या पराये

हम बसा अपनी दुनिया किया उसे और उसके परिवार को पराये

उसे सुहाए सिर्फ एक ही दुनिया मिलजुल रहो एक परिवार एक मुखिया

 लाखों की एक बात प्राणी जब जुड़े एक दूजे के प्राण से कोई रहे न दुखिया

शरीर निकला सिर्फ एक यात्रा पर हम कर्म करने को आए

वंश बनाने को वो बैठा उसकी जिम्मेवारी कहाँ बढ़ाए कहाँ घटाए

हम सब तो खाली हाथ आए खाली हाथ ही जाए

वंशीवाला स्वयं प्रकटे कहीं बिना बुलाए आए कहीं बुलाने पर भी न आए

कैसे उसे मनाये वंश बेल बढ़ा हे वंशीवाले सदियों से कहते आये

पुण्य कमाना था इस वंशवृद्धि के चक्कर में पर पाप खूब कमाए

खुदा का नाम लेते लेते कब खुदा बन बैठे कोई इन्हें समझाए

एक छोटी सी गलती पर मनुख दूसरों को कैसे दंडित करे सुनाये

और जब वो ऊपरवाला हमें दंडित करे हम कैसे रोये चिल्लाए

वंशी का संसार वंशी ही वंशबेल फिर वंश का दंश क्यों सताए

लीलाधारी सब देखे उसकी लालसा में उसके प्राणी गए सताए

शरीर नहीं है वंश आत्मा है वंश उस वंशीवाले परमात्मा ने गढ़ी सब रचनाएँ

सब उसकी संतान न छोटा न महान कहे वंशों का वंश

युग युग से वंशी एक ही वंशी बजाये तुम मेरे मैं तुम्हारा हमवंश

अब न कहना मैं निर्वंशी तुम सब मेरे वंशीपुत्र कहलाए

मैं अजन्मा मैं सर्वत्र मैं ही पूर्वज मैं ही वंशज मुझमें सब वंश समाए

जय श्री कृष्ण

अविस्मरणीय माँ

माँ मेरी कविता बन गई

रोज मेरे ख्यालों में मुझे मिलती है

सुंदर वे बेहद थी

अब और भी सुंदर भाव में दिखती है

माँ मेरी चिड़िया बन गई

सुबह शाम मेरी खिड़की पर चहचहाती है

मुझे अपनी याद दिलाती है

मुझे जगा फुर्र हो जाती है

माँ मेरी प्रार्थना बन गई

जब बैठो ध्याने तुरंत स्मरण में आती है

मुझे ढाँढस बंधा आसूँ पौंछ जाती है

सुख दुःख जीवन है बिटिया खुश रहो धीरे से कहती है

साल गुजर गया उनको गए बरसी आने को है

पितृ पक्ष में उनकी उपस्थिति और तेज हो गई है

पिछले बरस संग थी अब स्मृति अंग है

माँ जागती है मैं सोती हूँ सपनों में मीठी दस्तक देती है

वक़्त मिटा रहा है उनकी यादों को हृदय से धीरे धीरे

भूलने के अपराध से रोज़ बचती हूँ

पर अपनी मूर्खता पर फिर हँसती हूँ

माँ बेटी का रिश्ता अटूट है मैं यह सोच संभलती हूँ 

यह शरीर मन आत्मा तो उसने मुझे दी

परमात्मा का रूप बन कर

फिर क्यों यह सोच कर पिघलती हूँ

माँ का अंश हम सबमें है थोड़ा थोड़ा अब मैं तसल्ली से जीती हूँ

दर्द ढूँढे हमदर्द

दर्द से भरे तुम दर्द से भरे हम

न दर्द तुम्हारा कम न दर्द हमारा कम

आँख तुम्हारी भी नम आँख हमारी भी नम

तुमने भी झेले हमने भी झेले दोनों ने झेले जमाने भर के गम

जो भी होगा तेरे मेरे बीच कहने सुनने को होगा बहुत कम

राहत कहने से या काम करने से दोनों की क्या हो जाएगी कम

बात टूटने बिखरने और बर्बाद होने की नहीं है हरदम

बात समझना है सिर्फ बेशकीमती जिंदगी का मूल मर्म

वक़्त रहा निर्मम ताकि छूटे न मानवता का कर्म व धर्म

और बात इतनी सी है कि इतना सब झेल के भी जिन्दा बचे है हम

तुम कहोगे मेरा गम बड़ा मैं कहूँगा नहीं मैं भी तो जिंदगी भर लड़ा खूब अपने दम

कोई पूरा का पूरा घर में खपा कोई पूरा का पूरा संसार में झूठ जो बोले मैं सर्वम

एक दूसरे से ही पाते एक दूसरे से ही लेते हम गम तो क्यों भूले हम जीवन का नाम संयम

गम देना खुशी लेना यह है समाज का बड़ा ही अनूठा व पुराना नियम

दुनिया के इस दस्तूर का क्या करे दोस्त पाने से पहले पड़ता है खुद को खोना अधिकतम

अपने अहम् वहम सहम के लिए सब चढ़े सूली पर हरदम बिना धर्म

जो जीता वो नाम जो हारा वो बेनाम चलता यही सिलसिला दुनिया सिर्फ एक भ्र्म

कोई कहानी सुखद नहीं चाहे चलो सीधे चाहे चलो टेढ़े मेढ़े कदम

कोई अकेले में ही संपूर्ण संसार कोई संसार में अकेला बैठा बेदम

खुद को बिगाड़ना था जरुरी जिंदगी संवारने को तो खुदा जो बैठा था सामने बन नियम

पुरानी साँसे क्यों निकल रही आह बन छोड़ दे अब इन्हे धुआँ है यादें जाने दे एकदम

जिंदगी बुलाती तुझे हर कदम नई ऊर्जा से भर नए सिरे से शुरू कर बढ़ा कदम

नयी साँसों में भरा है सकरात्मक भाव और दम आ जी ले इससे पहले हो जाए ख़त्म

यही है फलसफा यही है जिंदगानी सब निभाते हँसते रोते जन्म जन्म

गांधी शास्त्री जयंती पर खास संदेश

दिव्य गांधी आलौकिक शास्त्री देश के दो वीर नौनिहाल

थमा गए हमें स्वतंत्रता की अनंत जलती मशाल 

सरल भाषा सादा व्यक्तित्व लड़े दोनों भिन्न पर बेमिसाल

एक आंधी एक विश्वास हर हाल में रहे देश खुशहाल

देश की आजादी लिखी अपनी हर सांस एक लाठी एक नारा खुद को संभाल

गांधी ने दिखाया एकता ही रास्ता तोड़ विदेशी मायाजाल

शास्त्री ने कहा कर्तव्य प्रेम निष्ठा ही हमारा भाल

दो अनोखी सोच दो गजब मार्गदर्शन किया कमाल

एक सशक्त एक संबल दोनों ने झुकाया अंग्रेजों का घमंड बन काल

गर्वित शोभित नमित भाव से करते उन्हें याद हर जन्मदिवस हर साल

मानव से महामानव साधारण से असाधारण दोनों की कहानी भारत के दो जुझारू लाल

जो आजादी जो विरासत डाली हमारी झोली में फूले फले भारतवासी सोन कृपा निहाल

वही सहेजे वही संभाले वही श्रद्धा वही देशभक्ति भाव भारत का तिरंगा रहे ऊंचा और विशाल

वन्दे मातरम्

क्लेश और महेश

मेरे जीवन के दो अभिन्न अंग क्लेश और महेश

एक से परास्त मेरी शक्ति दूसरी शक्ति संभाले समस्त निवेश

क्लेश में मैं का समावेश

और महेश में मैं का निषिद्ध प्रवेश

क्लेश स्वयं की ऊर्जा से उजागर

 महेश सशक्त ऊर्जा से भरी गागर

क्लेश और महेश में झूलते सभी कभी रंक कभी राजेश

प्रारब्ध ऊर्जा जब खींचे बचे न सिर पर केश

लक्ष्य सदा मेरा रहा महेश पर मैं कहलाया सदा क्लेश

पदवी प्रेम सम्मान की पहनने को घूमा देश विदेश

कभी दिली ख्वाहिश पूरी करने को मैं भिड़ा  

कभी धर्म सत्य न्याय के लिए निबटाता झगड़ा

जिस दिन मैं बचा कहीं न हो जाये क्लेश

तो कोई और आ कर ले लेता रूप क्लेश

न भीतर के न बाहर के सुलझा सका मैं क्लेश

संतुलन बनाने में झेलने पड़े दुःख द्वंद और द्वेष

क्लेश में उभरे भंयकर शब्द

 महेश में ठहरे परम शक्ति निःशब्द

एक ऊर्जा का उफान तो दूसरा शांति का पैगाम

एक विध्वंसकारी शक्ति तो एक कल्याणकारी शक्ति

जो ऊर्जा न संभली वही बनी क्लेश

जो ऊर्जा भाव में की समर्पित सदा बनी महेश

रौद्र रूप से भद्र रूप शायद कुछ बने बेहतर और विशेष

असंतुलन झेलना और संवारना नियति का चक्र रचे अनेक भेष

एक हाथ निबटाता क्लेश दूसरा हाथ संभालता महेश

शांति स्थापित करने को खुद महेश ने झेले अनेकों क्लेश

अब जब सामना होता है क्लेश तो समझता हूँ यही संदेश

उठकर कार्य करना है चुना है तुझे महेश ताकि मानवता रहे शेष

एक कप गर्मागर्म चाय

एक कप गर्मागर्म चाय

मामला सीधा सादा था पर हम क्यों न भूल पाए

वे लूट कर ले गए दिल

और हम हाय भी न कर पाए

चाय पकती रही किचन में

और हमारे दिमाग में पकती रही अनगिनत कहानियां और कविताएं

एक कप भरी चाय और एक भरपूर व्यक्तितव

क्या है दोनों में समानताएं

यह बात आज तक न समझ पाए

कि क्या उस एक कप चाय ने हमें लूटा

या बनाने वाले के हाथ के हुनर पर हम रीझ आए

तलब तन की थी या मन की थी या आत्मा की थी

क्यों तीनों भाव गहरे उमड़ते आए

खुश्बू और रंग जैसे खिलखिलाते उसके अंग

स्वाद और गर्माहट हूबहू जैसे उसकी उपस्थिति और मुस्कुराहट

चाय में दिखी हल्की सी उसकी आभा वा आत्मीयता की परछाई

उसने हमें केवल चाय पिलाई पर न जाने क्यों हमारी दुनिया हिलने पर आई

चूल्हे पर चढ़ी चाय कढ़ती रही

और मैं उसके चेहरे को पढ़ने का यतन करती रही

गर्म चाय देती है दिल को बेहद ठंडक और सुकून

पर इस चाय ने तो हमारे अच्छे खासे होश उड़ाए

उसके प्यार ने अंदाज ने बेबाकी ने मेजबानी ने

मुस्कान ने निश्चल भाव ने या विश्वास ने

किसने हमे ज्यादा लूटा अपनी समझ पर खिसियाए

तभी तो जब घर आए तो क्यों लगा कुछ कीमती वही छोड़ आए

महफ़िल लूटना तो हमारी फितरत थी

आज लूट कर क्यों लग रहा है हम जरूर आबाद हो कर आए

With whom to link or delink ?

Life is a small moment

Live thoroughly before time blink

Write daily you require only

Half the paper and half the ink

White attracts and greatly pulls

But black absorbs all your pink

Some links always heart connected

Some links only to balance your life so delink

Positive vibes rule full life no drill

Negative vibes distract shock and shrink

Input is output a cosmic rule

Actions become smoother when we think

Either create build or maintain heaven

Believe in nature wholeheartedly for deep link

Fight voice and make aware what you deserve

Rise in life before time make your heart sink

Life is a big screen either you work or write about it

A nectar with little poison a mandatory drink

संजोग सरल या कठिन योग

बिन संजोग सब वियोग

भारी संजोग तो सौभाग्य योग

ढीले संजोग तो बड़े बड़े प्रयोग

गर ढीले संजोग ढीले प्रयास और ढीले मनोयोग

तो छोड़ कश्ती ऊपरवाले पर वही करेगा जो हित में और संभावना योग

गर हाथ एक उसका है तो एक तेरा भी है दो हाथ का सुंयोग

संजोग में भोग जोग सोग रोग किसके हाथ क्या लगे न जाने कोई लोग

माना लेखनी के लेख उसने लिखे कुछ गलती हमारी भी तो होगी तभी बना हठयोग

जो तेरे बस में तू कर बाकि उस पर छोड़ यही तो है सुंदर कर्मयोग

जो तू फला तो स्वयंसिद्ध योग गर तू मानवता में घुला तो महामानव योग

Perfect or defect

A perfect life

A perfect education

A perfect job

A perfect career

A perfect salary

A perfect partner

A perfect house

A perfect life style

A perfect figure

A perfect thinking

A perfect move

A perfect shot

A perfect adjustment

Perfection is absurd and impossible

Nobody is perfect we all know

Defects in subjects are common

Defects have possibility and growth

There is hardly any story of perfects

But there are various stories of defects

To chase perfection is motivation in gratitude

but to have perfection is sheer attitude

त्रिव्यायाम सफल अभियान

तन का व्यायाम खूब घरेलू काम

मन का व्यायाम योगा वा ध्यान

आत्मिक शांति के लिए व्यायाम मंत्र भजन सत्संग

जिसने कर्जस्वरूप किए यह तीनों व्यायाम

तो सुख ही सुख आराम ही आराम

जनाब कोई शक नहीं ना

तो बस लग जाइए जो छूट गया कोई भी व्यायाम

मन वचन कर्म सब तंदुरुस्त जो कर ले नित्य यह व्यायाम

27 नाम कृष्ण

गुरु कृष्ण

सखा कृष्ण

बंधु कृष्ण

बाल कृष्ण

माखन कृष्ण

गोपी कृष्ण

यशोदा कृष्ण

वासुदेव कृष्ण

दिव्य प्रेम कृष्ण

राधा कृष्ण

मीरा कृष्ण

द्रौपदी कृष्ण

लाज कृष्ण

भागवतम् कृष्ण

मनोरथ कृष्ण

डोर कृष्ण

भोर कृष्ण

श्याम कृष्ण

राम कृष्ण

मान कृष्ण

बलराम कृष्ण

मथुरा कृष्ण

गोकुल कृष्ण

वृंदावन कृष्ण

द्वारका कृष्ण

त्रिलोक कृष्ण

आलौकिक कृष्ण

कण कण विराजे श्री कृष्ण हरे रामा हरे कृष्ण

एक साधे सब साधे

मानव शरीर है मात्र एक यंत्र

बिन दिव्य शक्ति न चले इसका तंत्र

मन वचन और कर्म है इसके सूक्ष्म तार

जब तक न जुड़ेंगे यह तीनों एक साथ न होगा शक्ति संचार

असंतुलित वा अवयवस्थित ऊर्जा खाली रखे सब प्रसंग

मन जुड़ा आराम वचन जुड़ा कपट कर्म जुड़ा स्वार्थ कैसे संभव कारज व्यर्थ सारे पंथ

तीनों भाव जुड़े जब एक साथ दिव्य शक्तियां करे चुपचाप भीतर प्रवेश

बिन बोले बिन मांगे बिन यतन मनोकामनाओं के द्वार खुले बिना निवेश

साधे शरीर मन और आत्मा तो साधना हो आराधना हो संपूर्ण कामना हो

वरना तो प्राणी बन कर रह जाय जीव निर्जीव बिन आधार बिन संचार कैसे स्व निर्माण हो

एक शरीर को साधे सब सधे कह गए पीर फकीर बिन शक्ति संचार शरीर सूखी बेल

मन वचन और कर्म का है सारा खेल बिन तैयारी सब फेल

योग बनाए संजोग इसके बिना रोग वियोग सब भांति दुर्योग

योग गहरी साधना नित्य मांगे थोड़ा समय करे मनोयोग सदुपयोग

You and I

You lived your life with quality and sanity

I lead my life in little quantity with insanity.

You made and applied rules and regulations

I worked to folllow those rules and regulations.

You made your self-identity in yesteryears.

I fought for my identity everyday in past years

You got salary and vacation leave for your potential skill

I got nothing not even leave but asked polish your skill

You ruled the world with great pleasure

I built my small world with painful gesture

You were always called a wise man

I was always called a nice man

You lived in an open space and walked at good pace

I was confined and could hardly move at slow pace

You were the center of attraction for every action

I was called for each action and was kept mostly under tension

You came home happily when you got time

I was available at home waiting all the time

You made your life wonderful and worth

I struggled for my existence on this earth

You and I can’t be the same person and the same pole

You and I are the opposites the north and the south pole

You and I one rich one poor one ruler one bearer

You and I one white one black one superior one inferior

You and I one always in the front one always at the back one power man one hard worker

You and I both make and balance the two sides of this world but in absurd manner

अर्धनारीश्वर

संसार की रचना करने वाली शक्ति न पुरुष है न नारी बल्कि एकलिंग, शिवलिंग या शिवशक्ति के रूप में जानी जाती है | दो भागो में व्यक्त यही परम शक्ति आधी प्रकट होती है पुरुष रूप में और आधी प्रकट होती है नारी रूप में और संयुक्त रूप व भाव से, अर्धनारीश्वर का सौम्य रूप कहलाती है | शिव ने वरण किया हर जन्म में पार्वती का और पार्वती ने शिव का | शिव अधूरा पार्वती के बिना, पार्वती अधूरी शिव के बिना | जब दोनों हुए अलग और रहना पड़ा एक दूसरे के बिना, तब-तब सृष्टि में विध्वंस हुआ | जब दोनों पुनः मिले, दोनों शक्तियाँ,  एकाकार होकर, पूरक, सम्मोहक व सम्पूर्ण बनी | एक दूसरे में समाहित होने पर, आलौकिक संसार की रचना कर, एकनिष्ठ व बलिष्ठ शक्ति का अद्वित्य रूप कहलाये | एक बना बाह्र्य शक्ति का सुदृढ़ आवरण, दूसरा बना आतंरिक शक्ति का कोमल भरण | संगठित भाव से, समर्पित भाव से जुड़, एकमय हो, एक दूसरे के प्रेमाधीन हो, एक दूसरे से संचालित हो, अर्धनारीश्वर का सुंदर रूप बन, एकमैव व एकल शक्ति का प्राकट्य रूप कहलाए |

एक बना शरीर तो दूसरा बना आत्मा ,एक बना आकाश तो दूसरा बना पृथ्वी, एक बना पुल्लिंग तो दूसरा बना स्त्रीलिंग, एक बना स्वार्थी तो दूसरा बना निःस्वार्थी, एक बना क्रूर तो दूसरा बना कोमल |

जब दिव्य शक्तियाँ परस्पर प्रेम और विश्वास को आधार बना चलती है, तो सृष्टि की रचना होती है और यह बखूबी चलती है | शक्ति का प्रारूप एक से दो भागो में बँट कर असंख्य रूप में परिवर्तित हो जाता है और सृष्टि कल्याण सम्मत हो जाता है, तब भी यह सदैव एकरूप, एकलिंग, शक्तिलिंग ही कहलाता है |

ये शक्तियाँ दिखती और कार्य अलग-अलग रूप से करती है पर उसके तार,संचार और प्रसार माध्यम एक ही रहते है |

स्वर्ग सी रचना और परिकल्पना का यह दैव्य रूप धरती पर प्रकट होते ही बदल जाता है |

अंबर में यह शक्तियाँ टूटकर भी जुड़ी रहती है और सदैव अखण्ड रहती है | पर यही दोनों शक्तियाँ धरती पर जन्म लेते ही अलग रूप से परिभाषित व संचालित हो जाती है | न तो यह भली भांति जुड़ पाती है न यह भली भांति टूट पाती है, अक्सर विघटित होकर निर्बल रूप में बिखर जाती है |

पुरुष अलग एकल शक्ति और स्त्री अलग एकल शक्ति में बँट जाते है और यही अलगाव, बिखराव, विभाजन व असंतुलन, मानवता की दुर्बलता का कारण बनता है | यह परंपरा सदियों से, युगों-युगों से कहर ढा रही है और मानव जीवन की सबसे बड़ी विडंबना और त्रासदी का कारण है | दो रूपों में बँट कर यह शक्तियाँ, दो हिस्सों में बँट कर रह जाती है | यँहा दिव्यता नहीं, मनुष्यता की भूमिका बड़ी हो जाती है | एकम का यह भाव व अर्थ पृथ्वी पर आते ही सुप्त, कुपित व विलुप्त अवस्था में रह जाता है |

ये शक्तियाँ  पैदा तो एक समान होती है पर न स्वीकारी जाती है, न दिखती है, न चलती है, न सामंजस्य, न विकसित होती नजर आती है | दोनों रूप परस्पर बोधि, विरोधी और क्रोधी हो जाते है | एक शक्ति का दूसरी शक्ति से घर्षण, प्रतिस्पर्द्धन, हनन और विघटन ही सम्पूर्ण मानव जाति के पतन का कारण बन जाता है | जब यह एकाकार होती है तो मानव जाति का निर्माण, विकास, उत्थान व परम कल्याण होता है और प्रतिरोधी हो जाए तो विध्वंसकारी हो सब नष्ट कर देती है |

धरा पर विवाह बंधन इन शक्तियाँ को मजबूत संबंधों में बांध इसे श्रेष्ठता व पराकाष्ठा की गरिमा प्रदान करता है | विवाह निबाह बेशक बेहद कठिन है और तनाव इसका धरातल है, पर सृष्टि की एकलिंग शक्ति का यह परम आधार और समर्पण भाव है | परिणय सूत्र में इन्ही छह शक्तियों का मिलान, जुड़ाव व गठ बंधन होता है | दो शिवशक्ति, दो रूप पुरुष में पुरुषस्त्री व दो रूप स्त्री में पुरुषस्त्री इस प्रकार कुल मिलाकर इन छह शक्तियों का मेल-मिलाप व आह्वान अग्नि समक्ष किया जाता है | यानि की विवाह संस्था दैविक, आध्यात्मिक व भौतिक सभी स्तरों पर जुड़कर मज़बूत बनती है | पर यह दिव्य व महत्वपूर्ण विचार, न आचार-व्यवहार में लाये जाते है, न निभाए जाते है ,न स्मरण में रखे जाते है | कंही यह भाव फलित, कंही चलित, कंही निष्फलित, कंही खंडित व कंही कलंकित हो जाते है |

विवाह का दिव्य स्वरुप इसलिए रचा गया क्योंकी पुरुष हो या स्त्री दोनों एक दूसरे पर निर्भर है और अधूरे है एक दूसरे के बिना दोनों का कोई अस्तित्व भी नहीं है, दोनों में खूबियाँ और खामियाँ भी है, जो स्वीकार्य कम और ठुकराई ज्यादा जाती है |

विवाह के बाद पुरुष केवल अपने अंदर पौरुष शक्ति को लेकर चलता है, उसके भीतर बैठी स्त्री, उसमें सामाजिक तौर पर न स्वीकारी जाती है, न विकसित की जाती है, न पोषण पाती है, बल्कि दबाई, कुचली या मार दी जाती है | जबकि स्त्री में पुरुष का भी रूप साथ-साथ स्वीकारा, विकसित, पोषित और सँवारा जाता है | अतः विवाह पश्चात् स्त्री को पुरुष में केवल पुरुष ही मिलता है स्त्री नहीं, जो उसे समझे, साथ दे और सराहे, उसके अधूरेपन को पूर्ण करे |

 यंहा पुरुष का परम सौभाग्य है कि उसे स्त्री में, स्त्री और पुरुष दोनों रूप, स्वतः विकसित, पोषित और प्रफुल्लित रूप में प्राप्त होते है |

पुरुष में स्त्री का सुप्त भाव और स्त्री में पुरुष का जागृत भाव, यही रिश्तों में असंतुलन और अराजकता का कारण बनता है | क्योंकि एक शारीरिक रूप से अत्यधिक प्रबल हो गया और दूसरा शारीरिक से कम और बौद्धिक रूप से सबल हो जाता है अतः तभी विवाह में स्त्रियों को ज्यादा महत्व, बड़ी भूमिका व कठिन जिम्मेवारी दी जाती है क्योंकी भले ही वह शरीर व बुद्धि से पुरुष के मामले में क्षीण प्रतीत होती हो, पर पृथ्वी तत्व होने से उनमें सहने, दबने व बर्दाश्त करने की प्रबल शक्ति होती है और विवाह को चलाने में उसकी बड़ी गहन भूमिका और निर्वाहन शक्ति ज्यादा होती है |

सतयुग, द्वापर, त्रेता युग में यह शक्तियाँ असमान होते हुए भी, कंही न कंही एक दूसरे के समर्थन में, चाहे अनचाहे, गाहे बेगाहे, मन बेमन से, खड़ी रही और सृष्टि पलती व बढ़ती रही | पर कलयुग ने इस समीकरण को बिल्कुल बदल कर रख दिया है और एक जटिल, पेचीदा और कुंठित समाज की रचना कर दी है | क्योकिं अब यह शक्तियाँ आगे पीछे नहीं चलती, साथ साथ चलने से टकराती है | क्योंकि यह शक्तियाँ एक दूसरे के लिए और एक दूसरे की सहमति से नहीं चलती, बल्कि बराबरी की मांग, स्वतंत्रता का पैगाम, जीने का सुंदर प्रावधान और एक समान विकल्प मांगती है | अब पुरुष को अपने भीतर की स्त्री व बाहर की स्त्री दोनों से जूझना, लड़ना व संभालना पड़ रहा है | स्त्रियों ने भी भीतर के पुरुष को जागृत कर, विकसित कर, पुरुषों के संसार में घुस कर, पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती दी है | वे सभी कार्य जो अपनी अपनी दिशा व कार्य क्षेत्र संबंधी थे, अब सब बराबर-बराबर  बँट गए है | युद्ध स्तर पर उतरी महिलाएँ, अब समान समान बँट गए इन कार्यों को बिना किसी भेदभाव के, बिना रोक-टोक के कर रही है, लेकिन संसार में किसकी ज्यादा जिम्मेवारी और किसकी ज्यादा भूमिका का असंतुलन कायम हो गया है | सभी प्राणी व जीव फलित हुए है या नहीं, पर सभी शोषित व पीड़ित जरूर हुए है | मनुष्य की पात्रता, शक्ति-समार्थ्य, क्षमता व काबलियत, कुछ भी इस बिगड़ी व्यवस्था को संभाल नहीं सकी | न सुधरे हालात, न संभले जज़्बात, न बदली कायनात, पर इस लचर प्रबंधन ने किसी को नहीं छोड़ा बल्कि पोषित कम शोषित ज्यादा किया है |

क्या हम ऐसे समाज की रचना करे जिसमें पुरुष अलग और स्त्री अलग रहे यदि ऐसा हो जाए तो संसार में कुछ नहीं बचेगा यह तो दूसरे की गलती पर खुद को दंड देने जैसा हुआ |

सृष्टि का निर्माण ही मानवता के लिए हुआ है जिसमें जुड़ाव, फैलाव व प्रभाव जरुरी तत्व है | उस एक महाशक्ति को आप बाँट सकते है पर उसे तोड़ना, मरोड़ना और दुरुपयोग करना कंही भी, किसी भी समाज में अनिवार्य व स्वीकार्य नहीं है |

लिंग भेद, सत्ता भेद, शक्ति भेद ने समाज को तितर बितर कर रख दिया है | बराबरी की इस लड़ाई में, औरतें पुरुषो से भी आगे निकल गयी, पर पुरुष सत्ता वैसी की वैसी है, जस की तस और कोरी की कोरी है | न बदले तुम, न बदले हम, दोनों का भारी नुकसान हो गया | शक्ति-मद और अहंकार में दोनों का सब छूट गया, दिल टूट गया और ज्यादा खामियाजा औरत सत्ता को भुगतना पड़ा क्योंकि उसके जीवन के सभी समीकरण बिगड़ गए और विध्वंस हो गए |

लिंग सरंचना की सृष्टि में अपनी अपनी भूमिका को समझने की बजाय, दोनों इस में इस कदर उलझ कर रह गए और सारी सृष्टि शंकित, भयभीत और आतंकित हो गयी | यह वर्गीकरण व पृथककरण, स्त्री पुरुषों के समलैंगिक विवाह के रूप में देखा जा सकता है | (LGBT)  इसका जीवंत उदहारण है | यह सभी स्त्री का केवल स्त्री से पोषण व पुरुष का पुरुष से पोषण, अर्धनारीश्वर रूप का कलयुगी दर्शन व परिवर्तन दर्शाता है | समलैंगिक विवाह इन सभी प्रश्न व प्रकरण में अर्धनारीश्वर के बनते बिगड़ते स्वरुप है | अपने ही अस्तित्व के प्रश्न में अधिकतर लोग उलझे, परेशान, हैरान, फँस कर रह गए है | आपरेशन द्वारा  लिंग परिवर्तन अपनी काया में स्त्री को मारता पुरुष और पुरुष को मारती स्त्री, यह सब स्वयं, परिवार व समाज सभी के लिए घातक और यक्ष प्रश्न जैसा हो गया है |

अपनी पहचान, अपने अस्तित्व व अपने प्रकृति प्रदत्त स्वरुप को लेकर इतना होहल्ला मचा है कि लगता ही नहीं हम इसी पृथ्वी के जीव है, बल्कि अंतरिक्ष लोक से उतरे प्राणी लगते है |

दोनों स्त्री पुरुष प्रकृति की तुला के दो हिस्से है न कम न ज्यादा, कभी एक भारी कभी दूसरा हल्का, कभी एक ऊपर कभी दूसरा नीचे, शक्तियों में बराबर, पर फिर भी जुड़े रहते एक टाँके से, सहचार्य, संतुलन, सम्पूर्ण आनंद हेतु, काहे की तुतु मैंमैं और अगर है भी तो, आनंद लो और चलो भाई आगे |

अर्धनारीश्वर का एक बड़ा उदहारण किन्नर जाति के लोग है जो द्विलिंगी कहलाते है जो प्रकृति की संयुक्त सरंचना अर्धनारीश्वर की जीवंत मिसाल है | संसार से विरक्त व निष्काषित यह जाति, शक्तियों में उन्नत और वरदान या अभिशाप देने में सशक्त है | ईश्वर का प्रारूप, अनोखा, सम्पूर्ण पर फिर भी सामाजिक अस्वीकृत रहता है यह रूप |

यानि की बेकार की लड़ाई में पुरुष व स्त्री दोनों ने उम्र गवाईं |

सारा तांडव तो काम, क्रोध, लोभ, मोह व अहंकार का चल रहा है | सभ्यता सँवारने से पहले इंसान को खुद को संभालना व सँवारना होगा, यह उसकी नैतिक, बौद्धिक व सामाजिक जिम्मेवारी है |

शक्तियों का द्वंद, छंद व फंद चलता रहेगा जब तक रहेगी यह दुनिया | नर नारी में अर्धनारीश्वर की दिव्य शक्ति का रहेगा पलड़ा भारी, स्वीकारों सब भाव आनंद, हाथ जोड़ प्रभु से करते सब गुजारिश आँख बंद |

ॐ नमः शिवाय

मैं प्रारब्ध और खुदा कैसी ऊर्जा कभी न होते जुदा

प्रारब्ध का नाद

बजता है दिनभर जगाता है रातभर निर्बाध

प्रारब्ध से घिरा हूं

अपनी ही उर्जा से बिफरा हूं

मैं न बाहर देख पाता हूं

न बाहर वाले मुझे देख पाते है

प्रारब्ध की कैद में छटपटा रहा हूं

बेबसी में यूं ही जीए जा रहा हूं

आंखों से आंसू अब सूख गए है

फिर भी पगला सा रोए जा रहा हूं

न खुद तोड़ पाता हूं

न मदद ले पाता हूं

अपने बुने जाल में रोज फंसता जाता हूं

प्रारब्ध पुरानी ऊर्जा है

मेरे पुराने बीते छोड़े कर्मों की मुझे मिली सजा है

न श्वास है न आस है न विश्वास है

जन्मों जन्मों की अनबुझी अनकही प्यास है

पीढ़ियों कड़ियों में गुंथी आत्मा की पुकार है

न लड़ सकता हूं न छोड़ सकता हूं

न पकड़ सकता हूं न चल सकता हूं

प्रारब्ध का कर्ज दुनिया का मर्ज है दवा सिर्फ फर्ज है

मुझे खुद को ही समझना वा निबटना है

काश मैं स्वयं को जगा पाता

सोया जी भर कुछ बेहतर कर्म कर पाता

कर्मों का निबटान कर्मों से होगा

पुरानी उर्जा का निष्कासन नई उर्जा से होगा

मदद को सिर्फ खुदा होगा

सुन लेगा तो कर्ममुक्त हो जाऊंगा

नही तो फिर प्रारब्ध बढ़ा कर्मबंधन में बंध जाऊंगा

काश में सब प्राण फंसे है काश में जीवन प्रश्न लटके है

प्रारब्ध की इस लड़ाई में संसार के सब क्रियाकलाप उलझे है

शांत एकांत क्रांत और कालांत में सभी उत्तर छिपे है

खुदा एक परम शक्ति है बाकी सारा संसार उसमें धंसी उर्जा के नश्तर है

A writer at the age of 55

When l reached at the age of 55
I felt blessed l am healthy alive and can easily survive
When I looked back at the age of 55
I found countless grey hair reflected by my mirror but uncounted smiles hidden on my face lines
When l weighed my strength at the age of 55
I coughed and laughed at myself l can
still exercise and walk for few miles
When l calculated money in my wallet at the age of 55
I knew it would be empty as my investments were humanities than amenities that l willingly chose
When l noticed plus and minus of my efforts at the age of 55
I remembered l cried more and struggled hard but l never deviated from the divine light
When l saw people of my age still raw at the age of 55
I had no repent in my life as l live with people of wonderful hearts who help me to drive my life
When l realized the hold of life in my hand at the age of 55
I cherished cheered and felt confident l could hold myself very well in any situation and at every pitfall
55 is just a number l read and rejoiced
55 blessings might not be there in my life
But 55 good reasons should be there to smile in my whole life if not still l would try
At the age of 55 at least l can take 55 mini steps to become a reason of smile in someone’s life