जब तक मिले न राम

जब तक मिले न राम – 2

चलना पड़ेगा तुझको प्यारे – 2

सुबह दोपहर और शाम

ले ले प्रभु का नाम

कर्म और भक्ति है दो किनारे – 2

रख संतुलन इसमें प्यारे – 2

हो जायेगा भव से पार

ले ले प्रभु का नाम

आया भी है अकेला – 2

जायेगा भी अकेला – 2

फिर क्यों ले विश्राम

ले ले प्रभु का नाम

वो राह तके तेरी – 2

तू मुँह मोड़े बैठा – 2

जन्मों-जन्मों के फेरे पर लगा विराम

ले ले प्रभु का नाम

संसार से प्रीत निभाई – 2

अब कर ले इससे जुदाई – 2

वो प्रेम का सच्चा नाम

ले ले प्रभु का नाम

चार धर्म में बँटी यह मात्रा – 2

धर्म अर्थ काम मोक्ष की यात्रा  – 2  

 अब जीवन लक्ष्य साध

ले ले प्रभु का नाम

आसक्ति के बाद विरक्ति – 2

राम की भक्ति है मुक्ति – 2

उस साथ में है सुख-धाम

ले ले प्रभु का नाम

तू जिसकी कृपा से चले – 2

तू जिसकी कृपा से फले – 2

वही आत्म-ज्ञान वही तत्व-ज्ञान

ले ले प्रभु का नाम

इस माया ने तुझको पकड़ा – 2

तू बंधनो में जकड़ा – 2

काहे न समझे तू माया से ऊपर राम

ले ले प्रभु का नाम

शुभ मकर सक्रांति

श्री नारायण भगवान

सूर्य रथ पर गोचर उत्तरायण

नव ऊर्जा नव शक्ति का सोपान

शुभ गुंजन ऋतु परिवर्तन एकसमान

प्रकृति के अद्भुत दर्शन

स्नान-ध्यान दान ससम्मान

खिचड़ी नवान्न घर-घर पकवान

नर नारायण नज़ारा नवीन निधान

नव उमंग नव तरंग नव प्राण

पतंगबाजी पर परवान

पर्व एक अनेकों वरदान

जागृति सुख-समृद्धि व उत्थान

मकर संक्रान्ति का आगमन

सदा शुभ मंगलमय व सौभाग्यमान

Happy new year

Happy new year
Let’s dance and cheer
For bright and golden year
Happy new year
Embrace tightly all dear
Happy new year
Hold on strong hand near
Happy new year
Smile wholeheartedly without fear
Happy new year
Step firmly without tear
Happy new year
Stay in positive sphere
Happy new year
Kick challenges full gear
Happy new year
Look in front no rear
Happy new year
Act actually than appear
Happy new year
Grow gain and glare
Throughout the year
Happy new year
God’s grace is here
Happy new year

मेरे मरने के बाद

वो सब देने आये मुझे भावभीनी श्रद्धांजलि प्रेमस्वरूप ओढ़ा कर शाल

मेरे मरने के बाद

जिन्हें सम्मानपूर्वक बिठाना चाहता था मैं अपने पास

वो सब लेकर आये ढेरों फ़ूल और हार मुझ पर चढ़ाने

मेरे मरने के बाद

जिन्हें थामने के लिए मैं करता रहा जिंदगी भर इंतज़ार

वो सब लेकर आये मेरे लिए ढेरों दुआएँ प्यार भरी खुशियों की सौगात

मेरे मरने के बाद

जिन्हें पाने के लिए मैं तरसता रहा आँखे पथराई कई बार

ढेरों फ़ोन और शोक सन्देश पहुँचे देश विदेश से

मेरे अचानक मरने के बाद

जिन्हें सुनने के लिए तरसते थे मेरे कान राह देखती थी नज़रें बारम्बार

वो सब आये मुझसे मिलने तक़लीफ उठाकर आखरी बार

मेरे मरने के बाद

जिनसे रोज़ कहता था मिल लो देख लो बस नज़र भर कर एक बार

वो सब जो नदारद रहे आजीवन अपने होने का भरते थे दम

मेरे मरने के बाद

वो सब प्रकट हो गए रोक न पाए मुझसे मिलने का कष्टदायी कदम

वो सब स्वादिष्ट व्यंजन परोसे गए जिन्हें खाने को तरसता था मेरा मन

मेरे मरने के बाद

माँगने पर मिलती थी मुझे नसीहत व डाँट फटकार

मेरी प्रशंसा में पढ़े गए कसीदे मेरे गुणों का किया बड़ा बखान 

मेरे सामने पर मेरे मरने के बाद

शब्दों की नहीं थी मेरी भूख बस मैं चाहता था अपनों से अपनत्व का भाव

मेरे अस्तित्व मेरे होने का था जिन्हें बड़ा नाज़

मेरे चुपचाप मरने के बाद

निःशब्द खड़े है वो सब मेरी अनुपस्थिति से है नाराज़

मैं जिन्दा था तो मुझे अपनी बातों व यादों में दबा दिया

मेरे मरने के बाद

 अब यादों से निकल मुझे धरती में दबाने को है तैयार

सच तो कहते है सब पर अब पता चला मुझे

मेरे मरने के बाद

“बिना मरे स्वर्ग की प्राप्ति नहीं होती”

स्वर्ग सा महसूस कर रहा रहूँ

“मेरे खुदा” मैं मरने के बाद

A tribute to a legend

Divine form
Saint norm
Heavenly feature
Father figure
Human light
Supreme delight
Pure flora and fauna
Magnetic persona
Gentle aura
Unique presence modern era
Heart full of love
Soul like a dove
Humanity driven
Genius proven
World a big platform
Strong character bring reform
All can’t be same
Accept reality with lame
High Spirit justify
Struggle for sky
One man army thunder
Inside outside wonder
Believe in Gratitude top flag
Things taken Granted low tag
Suffer than being selfish
Past or present capture good wish
Intact in my sweet and loving memory
Daddy ‘s grace exemplary

माँ को भावपूर्ण श्रद्धांजलि

माँ चली गयी

संसार भोग कर

हँसता खेलता परिवार

रोता बिलखता छोड़कर

अनंत दिव्यधाम यात्रा पर

अनेकों असहनीय कष्ट सहकर

अपने पीछे छोड़ गयी

अनगिनत सवाल

देहत्याग कर्मबन्धन से मुक्त हो गई

करकमलों से कर सेवा बैकुंठ धाम चली गई

कल थी आज नहीं

अविश्वसनीय है पर सत्य भी है

स्थूल से ले लिया उसने सूक्ष्म रूप

जीवन की लौ समां गई प्रभु नारायण स्वरुप

कर्म ज्ञान भक्ति में से चुना कर्म प्रधान जीवन

संघर्ष से पाया सम्मान सार्थक किया अपना जन्म

जीवन का मर्म सहज ही बतला गई भोला था उसका मन

सब कुछ वैसा का वैसा पड़ा है

बिन माँ घर निष्प्राण पड़ा है

कलयुगी दुनिया में बसाया था उसने शांतिकुंज

जाते जाते हमारे पल्लू में असंख्य सुख बांध गई

चुपचाप हमारे हिस्से का दुर्भाग्य अपने साथ ले गई

फ़ूल समान माँ फ़ूल बन गंगा में बह गई

पलभर में आँखों से ओझल हो गई

फोटो में जा दीवार पर प्रतिष्ठित हो गई

दिव्यता की मूर्त बन रही माँ आजीवन

अब आसमान में तारा बन कर रह गई

परिवार को भावनाओं में डुबो कर

स्वयं भवसागर से तर गई

घर के कोने कोने में बिखरी है उसकी महक

प्रेम से सींची घर की बगिया जिसने जीवन पर्यन्त

धर्म अर्थ काम मोक्ष हर जीव के महालक्ष्य

चारों भावों में बीज बो वंश का वटवृक्ष सुदृढ़ कर गई

चरणों में जिसके बसता था हमारा स्वर्ग

रोके रखती थी वो माँ हमारे लिए दुनिया के नर्क

पूरे परिवार की परिधि

हमारे जीवन का केंद्रबिंदु

अचानक हो गई शून्य में गुम

दिखा गई हमें दिशा

न घबराना कैसी भी हो दशा

सरल रखना सबसे प्रेम समीकरण    

कभी न भरेगा उनके जाने से उपजा सूनापन

माँ का छोड़ा रिक्त स्थान रहेगा सदैव अक्षुण्ण

पुण्यात्मा जगतमाता से थी दिखती

नौ रस नौ देवी का संजोय दिव्यरूप संपन्न

शुभ कर्म राम स्मरण कर पहुँची मुक्तिमोक्ष धाम

आश्चर्यरूप से ले लिया उसने जीवन से विश्राम            

मेरे स्मृतिपटल पर है अंकित

उनकी अनगिनत यादें सुनहरे पलों की धूल

रोज पोंछूगी नम आँखों से सहेजूँगी स्मरण में बिखरे रंगबिरँगे फ़ूल

चिंतित माँ देखो आज शांतास्वरूप हो गई

उसकी फिक्र उसका जिक्र बाँधेगा हमें समूल

गूंजेगा उनका स्वर विपरीत चलेगा जब कालचक्र कुछ क्षण

प्रार्थना में मेरी माँ अब बस गई

मेरी वाणी में मधुर कविता सी रच गई

मेरे हाथों में घर परिवार संसार सौंप निश्चिन्त हो चली गई

कँहा ढूँढूगी मैं माँ जैसी प्यार की ओट

किस पल्लू से पोंछूगी आँखे दुनिया है बड़ी खोट

आशीष है सिर पर बस नहीं है उसके गर्म नरम हाथों का अहसास

सब कहते है माँ जैसी दिखती हूँ

माँ से ही तो पाया है यह जीवन यह शरीर

माँ जैसी शक्ति व सामर्थ्य कँहा से लाऊँगी

उनके जैसा पवित्र मन मैं न रख पाऊँगी

उनकी देह में भरा था अनुपम स्नेह

साया जुदा है पर हमसाया बन रहेगी मेरे जीवन में सदैव

मुसीबतों से घबरा कर

रख देती थी माँ की गोद में सिर

सिर पर हाथ फेर हर लेती थी हर पीड़ा हर रुग्ण स्वर

सक्षम संबल कर देता था उनका लाड़-दुलार

प्यार देना व प्यार ही कमाना बच्चों

माँ के जीवन का रहा मूलमंत्र      

जब तक था माँ का साथ व सानिघ्य

कँहा ईश्वर को ध्याया कँहा भक्ति में मन रमाया

करना होगा अब मुझे ईश्वर की और रुख

माँ सी ओट माँ सा प्यार देगा अब माँ को रचने वाला त्रिलोक

जग मनाना पड़ेगा तनमन की शक्ति जगानी पड़ेगी

माँ जैसी न कोई अलौकिक शक्ति जिसकी उपस्थिति विश्व विराट स्वरुप

नाम अनुरूप जिया जीवन अपने दम पर खूब

“राज रानी” ने किया सबके दिल पर राज बखूब

प्रेम विश्वास समर्पण भाव से किये सब काज

देवी माँ की रजा में रही राजी रखा निस्वार्थ भाव

ओजस व्यक्तित्व सच्ची हितैषी सबकी हमदर्द

हर जन्म में मिले माँ तेरी गोद हाथ जोड़ माँगू ईश्वर से तेरा निश्छल प्रेम भरपूर

ॐ शांति

अर्धनारीश्वर

कलयुग में हुआ संबंध विच्छेद

अर्धनारीश्वर नहीं अब एक

अब जुदा है उसके रूप

नर के कंधे पर अब न टिकती सबला सुरूप

 आधा रह गया है अब नर  

आधी रह गयी है अब नारी

कल सीता थी अब है चंडी अवतारी

बदल गया है युग बदल गयी है नारी

अन्तर्मुख शक्तियाँ है अब विमुख

काल की ताल से अलगाव व अनभिज्ञ

हाथ साथ बात केवल निभाते है स्वार्थ

पुरातन है बेमतलब है अब शब्द निस्वार्थ

खड़े है अलग अलग बमुश्किल एक धरातल

एक छत के नीचे छतीस के आँकड़ो में सूखता प्रेमरस

दामन जुड़े है पर दिल मुड़े है

अहम में दबे पड़े है नर नारी के अद्भुत सद्गुण

नर नारी अब परस्पर शक्ति नहीं

टूटकर विध्वंस है परिवार शक्ति स्तम्भ

एक और एक ग्यारह से होता जीवन समाधान

एक से एक टकरा शून्य हो गया इंसानी मन

नारी अब सुप्त विलुप्त शक्ति नहीं

बलपूर्वक दबाने से अब दबती नहीं

अपने तपने का फल है माँगती

अपनी प्रतिभा का बल है जानती

स्व को न तजेगी गर्व से सजेगी खुश्बु मेहँदी अंग

बराबरी नहीं हिस्सेदारी का चाहती है गहरा हरा रंग

सतयुग नहीं अब कलयुग है संसार

संघर्ष पीड़ा दर्द व्यर्थ न सहने को तैयार

अपने त्रिपदचिन्हों से जग में होती साकार

प्रत्यक्ष रूप स्वीकारो मेरी उपस्थिति परोक्ष रूप अप्रसन्न

छाया से निकल सूरज सी दिखती प्रखर प्रचंड

नाप ली उसने धरती अब नज़र आसमान में उड़ते पँख

चाह की बेल पर उसने कुछ नए पत्ते उगाये

पर उसी बेल पर फ़ूल से दिल के रिश्ते मुरझाए

दिव्य रूप नर नारी में उभरे राग द्वेष के द्वंद

चाहे हो छिन्न भिन्न समाज नारी न होगी अब नज़रबंद

प्यार मिला सम्मान मिला तो ठहर गयी

वर्ना सब छोड़ अपनी मंज़िल पर निकल गई

नर न बदल सका सोच न कर्म न स्वभाव

नारी न रुक सकी कल्याणी का करुणा भाव

आधे बंटे संसार में लड़ते भिड़ते आधे आधे दुःखे सबअंग

त्याग समर्पण व विश्वास के गहरे रंग भूल भरते फीके रंग

कलयुग का है भयानक सत्य सच्चे किरदार झूठे प्रसंग

एक दूसरे को छोड़ने व पछाड़ने की सजा है अनंत

संसार रथ दो पहियों का एक क्यों पड़े दूसरे पर भारी

प्रश्न है विचारणीय न नर उच्च न नारी नीचे आभार अभाव जीव दंश

अर्धनारीश्वर एक परिपूर्ण स्वरुप नैसर्गिक रूप

सर्वगुणसंपन्न दिल सदैव रखता सबको अभिभूत

दीपोत्सव का सत्व

पग पग पर अज्ञानता

एक दिया जलाए ज्ञान का

सक्षम सम्बल स्वाभिमान का

कठिन संघर्ष की राहें

एक दिया जलाए आशा व दृढ़ विश्वास का

मंजिल सबकी ईश्वर सफल सुदृढ़ जीवन का

सूने व खाली दिल के कोने

एक दिया जलाए प्रेम अपनत्व  भाव का

मानवता रहे पोषित हाथ रहे सुशोभित सबका

असत्य के कठोर वचन फैले

दिया जलाए सत्य के प्रकाश का

शुभ वाणी असंख्य लाभ का सुप्रताप का

अविद्या का छाया घनघोर अँधेरा

एक दिया जलाए विद्या व संस्कारों का

स्व के जीवन को सँभालने की कला का

अधर्म व अन्याय की काली छाया

एक दिया जलाए धर्म व न्याय का

मैं रथ आत्मा अर्जुन  सारथी प्रभु राम का

ऊर्जा ऊष्मा व उजाला का वो महास्त्रोत्र

आओ मिलकर स्वयं में अलख जगाये

पर पहले ईश्वर से लौ लगाए

शरद पूर्णिमा

शांत हुई वर्षा की बौछार वसुंधरा अति प्रसन्न

शीत ऋतु का प्रथम प्रहार ऊष्मा में लघु सकुंचन  

शरद पूर्णिमा की शीतलता का स्वाद बड़ा उन्माद

शिखर पर मुस्कुराता चंचल  चाँद सँवरता अवसाद

श्यामल पृष्ठभूमि शोभा व आभा का श्वेतपीत रंग

श्यामश्वेत सोच के विपरीत उठती उमड़ती उमंग

 श्यामसुन्दर की मधुरता देख आह भरे सब कंठ स्वर

शोकाकुल मन चेता कान्हा की बाँसुरी ने छेड़ी प्रेमलहर

शनै: शनै: तपती देह में नव शक्ति का पुनः उत्सर्जन

शापित कुपित निस्तेज ऊर्जा का अकस्मात शमन

शशिधर की तेजोमय दृष्टि का दिव्य वातावरण

शुष्क पलकें तृप्त जब गिरी नन्ही नन्ही शुभ किरण

शरद चंद्र दर्शन अत्यंत दुर्लभ सुधारस सुस्वादन

शीश पर हाथ फेरती चाँदनी हृदय में भरे स्नेह पोषण

शुभ्रवर्ण करने को वरण अन्धकार पर बिछा आसन

शीघ्र फैलता दूधिया चाँद भावार्थ बिना विष न मिले सोमकण

शेषनाग की गोद में उज्जवलता का आलौकिक दर्शन

श्वेत परिधान में लिपटा चंद्रमा चकोर बंधा सम्मोहन

शूल बन जाए फ़ूल गर चाँदनी बिना करना पड़े शयन 

शील शब्द है शाश्वत प्रभुता स्पष्टरूप उसका कण कण

शरद शक्ति है एक गौरीशंकर अंग नर नारी का अटूट बंधन

शुक्र है प्रकृति में आज भी है प्रेमाभाव असीम अनगिनत पुंजकण

दशहरा

दशहरा पर्व की शुभकामनाएं

दशावतार मे व्यापत

दशों दिशाओं को जीतने वाला

दशमंगलाचार धारण करने वाला

विष्णु महावतार है प्रभु श्री राम

दशानन वध

दश विसंगतियां

दश दोषों का प्रतीकार करने वाले

जगव्यापी जगप्रिय जगदीश श्री राम

महायुगी

महायोगी

महात्यागी

त्रिलोकी त्रिशक्ति त्रिभुवन श्री राम

राम पथ पर

राम रथ पर

राम शपथ लेकर

राम बाण लेकर

चलो राम नगरी

शक्ति भक्ति मुक्ति धाम

राम भरोसे

राम की दुनिया

राम वरण कर ससम्मान

बापू विस्मृति

गाँधी की आँधी बिजली सी कौंधी

अंग्रेजी सत्ता बड़े विश्वास से रौंधी

हमें मिली आजादी बड़ी चकाचौंधी  

स्मृति की मिट्टी की खुश्बू बड़ी सौंधी

तेरा समर्पण तेरा भाव स्मृति में न बाँधी

बापू तुम बहुत याद आए

केवल एक छुट्टी के दिवस में दिखे तुम गाँधी

विस्मरण कैसे हुए तुम महात्मा गाँधी

इंसानियत में बेजोड़ तुम सा न समाँधी

तेरी अनमोल सीख भूल हमने मर्यादा लाँघी

आँखों में कैसे उतरी अज्ञानता की रतौंधी

बापू तुम बहुत याद आए

नयी सदी अति भौतिकता से लदी

ज्ञान का चक्रव्युह खबरों का बवंडर

मशीन का डंडा नाचे आदमी नंगा

सत्य का बोध बड़ा बेढंगा बेहद क्षीण

असत्य का बाजार भला-चंगा सदा नवीन

बापू तुम बहुत याद आए

न्याय सिमटा बड़ी बड़ी किताबों में

अन्याय पर गहरी चर्चा दिखावे भर को उठाते खर्चा

दबी है सच की जुबान क्योंकी ऊँची है जान पहचान 

झूठ के पलड़ों में तुलता है यँहा न्याय और इंसान

बापू तुम बहुत याद आए

अपना-अपना धर्म समर्पित सब कर्तव्यनिष्ठ

मानवता धर्म से अनभिज्ञ कैसे सब प्रतिष्ठ

अपनी-अपनी सुनाने में है सब गुम

ऊँच-नीच, भेद-भाव कमजोर है दिल के कोने  

एकता की बात नकार शत्रुता के दामन में है मगन

बापू तुम बहुत याद आए

सादगी का प्रपंच सम्मान में चाहे मंच

कुर्ता पहने स्वाभिमानी अहंकार की टोपी है वही पुरानी 

प्रेम प्रार्थना प्रायश्चित मूलमंत्र दिव्य शस्त्र समान रखे अंग-संग

गजब का था वो शांतिदूत सत जीता सत्ता नहीं सादगी में लिपटा देवदूत

क्योंअशांत है आज दुनिया सुविधा-संपन्न है घर का हर कोना हर अंग

बापू तुम बहुत याद आए

दिव्य है देवी

तुम श्वास

मैं विश्वास

तुम खास  

मैं आस

तुम आस-पास

मैं प्रयास

तुम आभास

मैं निवास

तुम जल निकास

मैं प्यास

तुम सुखरास

मैं दास

तुम लौ निवास

मैं कपास

तुम बारहों मास 

मैं अमलतास

तुम उल्लास  

मैं हुल्लास

तुम भोग-विलास

मैं बिंदास

तुम सरस

मैं अभ्यास

तुम सुवास

मैं बास

तुम मिठास

मैं बांस

हे देवी बदल दे मानव इतिहास 

तेरी कृति का न हो उपहास

भूलें न भगवान ऋण

पंच तत्वों में समाहित भगवान

भूमि, गगन, वायु, अग्नि, नीर कण-कण  

शक्ति, प्राण, चेतना में रहता वह निर्गुण

पहला ऋण भूमि, सुन मूढ़ मति सज्जन

जीव, वन, स्वर्ण-चाँदी, वस्त्र और अपारअन्न-धन

 भूमि सहती भार, व्यर्थ पदार्थ करते सब विसर्जन

 स्वछता में छुपा वो सद्गुणी, चुका पहला ऋण

अस्वछता रखने का है भारी दंड प्रकरण

दूसरा ऋण गगन, नीली छतरी का सुरक्षा आवरण  

देवी-देवताओं, गुरुओं, ग्रहों, पितृ और भर्ता ऋण

सूर्य, चंद्र और वर्षा-ऋतु की बौछार पावन

नभ का बहुत आभार, बरसती कृपा घन-घन

झुका सिर, नहीं तो सिर पर मुसीबतों का आगमन

 तीसरा ऋण वायु का साफ, निर्मल व शीतल हवा का आलिंगन

बिना प्राण-वायु ,एक क्षण भी, न अस्तित्व, न जीवन

पर्यावरण को दूषित करने से बिगड़े जीवन के समीकरण

एक नादानी से कंही न हो जाये, मानवता छिन्न-भिन्न्न

हरियाली लाने को, हल चला या निकाल हल, घोर जतन

चौथा ऋण अग्नि का, लकड़ी, कोयला व ईंधन

ऊर्जा, ऊष्मा और उजाला का करते भरपूर सेवन

बिन उष्णता के ठंडा, मृत व निर्जीव तन-मन

दिव्य प्रेम के देते जाए, छोटे-छोटे कंठ स्वर से ऋण

पाँचवा ऋण नीर का, पोषण गंगा का वर्ना पाषाण जीवन

 कुँए, झरने, नदियाँ और सागर, आद्रता से संपन्न

बिन पानी सब सून, कहे कबीर सुवाणी, जल ही है जीवन

भगवान बिखरा पोषित करने हर घर हर आँगन

आओ चुकाए थोड़ा-थोड़ा प्रत्येक ऋण प्रतिदिन

अपनी शक्ति सामर्थ्यनुसार यह पांच ऋण

भगवान के प्रति जताए आभार कर्म भाव-वंदन

 परम सत्य है भगवान ऋण मुश्किल व नामुमकिन

पर फर्ज़ समझ करे पावन घर, धरा और पर्यावरण

Bank with Ram

Open account with Ram

Life investment just put daily alarm

Learn its full form carefully

Remember Almighty Mindfully

Ram takes care of emotions well

Handle with care with warning bell

See thorough window called believe

Easily get connected once you perceive

Body, heart and soul greatly blessed

Deep rooted mutual trust expressed

Bank of RAM welcomes all request

Good and golden deal without test

Ubiquitous, unique and useful

RAM believers remain peaceful

 Action, thought and speech worthwhile

Deposit its installments with smile

Save money, energy and time

 Goodwill always redeems goodtime

Health, wealth and happiness assured

Small expenditure big profits secured

Ram graces investors each pence

Criteria wholeheartedly one’s presence

Respond affinity miraculously

Rendezvous altruistic mystically

So bank with Ram speedily

Experience truth so lovely

5G Gimmick

Life is wonderfully alive

Happy onscreen time

Laptop TV mobile

  Beautiful images in no time

Half truth half lie

 Forget facts welcome pass time

 Virtual land true mirage

All surrender willingly engage

 Download smile from head to toe

Fight without arms friendly foe

Materialism decorate stark naked

Hunger widely cooked and baked

Suppressed sensitivity Mars gravity

Dream world overpower humility

Corrupt mind cheerful activity

Mindful expression physical captivity

Techno driven cosmic bodies

Education work culture and foodies

Search engine pulls info coaches

 Fools paradise self approaches

Knowledge tree peace flee

Tasty fruit body ache free

Machine in hand well done man

Human touch slowly abandon

जी जीवंत जीवन

शोक नहीं आलोक है जीवन

अंत नहीं प्रारम्भ है जीवन

काल नहीं कृष्ण है जीवन

उपलब्धि नहीं प्रयास है जीवन

डूबना नहीं तैरना है जीवन

अकेले नहीं सबके साथ है जीवन

सहेजना नहीं त्याग है जीवन

रुकना नहीं धाराप्रवाह है जीवन

धोखा नहीं विश्वास है जीवन

घृणा नहीं आत्म-प्रेम है जीवन

बोलना नहीं समझना है जीवन

आराम नहीं कर्म भाव है जीवन

हारना नहीं दौड़ना है जीवन

रोना नहीं हँसना है जीवन

अहंकार नहीं विनम्रता है जीवन

कठिन नहीं बहुत सरल है जीवन

गणना नहीं व्यवहार है जीवन

जीवन लौ बुझाना नहीं जलाना है जीवन

विषपान नहीं अमृततुल्य है जीवन

द्ररिदता नहीं सुदृढ़ बनाना है जीवन

स्वपन नहीं साक्षात्कार है जीवन

निर्बल देह नहीं दुर्लभ है जीवन

कंकर नहीं शंकर सा जीना है जीवन

जी जुबान पर हाथ जगन्ननाथ है जीवन

अपने दम पर जी भर के जी जीवन

कर ले जहान अपने नाम तभी सर्वश्रेष्ठ है जीवन

शिक्षक वंदन

सिर झुका है माँ सरस्वती अभिनंदन

मस्तक पर है दिव्य-ज्ञान का चंदन

दिमाग केंद्रित है लक्ष्य पर करे सूक्ष्म-आंकलन

भौंहे तनी है समय पर नियम का हो कठोर पालन

आँखों में है निष्पक्ष जन-समर्थन

कान जागरुक सकारात्मक ध्वनि का सुने स्पंदन

चेहरे पर बिखरी है प्यारी मुस्कान

मुख में विद्या और कौशल का स्वर गुंजन

कंठ में मधुरता वाणी में ओज चित प्रसन्न

बाज़ुओं में अदम्य बल उसके विशिष्ट चिह्न

उँगलियों में आलौकिक पथ-प्रदर्शन

हाथों में पालक सा नाजुक सरंक्षण

दिल में सहृदयता मानव-कल्याण

घुटने टेक दे दुश्मन देश-भक्ति में लिप्त मन

पैर नापते मंजिल हिमालय सूरमा सा गमन 

स्वयं बन दीपक अंधकार का करता शमन

पशु या भिक्षु सा न हो शिशु जीवन

शिक्षा का बना पालना खेंचे सकल जीवन

भूत वर्तमान व भविष्य हाथ जोड़ खड़े

शिक्षा गुण संस्कार सब कैसे एक रचना में गढ़े

हरि गढ़े गुरु और गुरु गढ़े हरि सब विधि संपन्न

नतमस्तक हरि भी शिक्षक शिशु का अद्भुत हरिमण

श्री गणेश चतुर्थी

मैं में बसे गोबर गणेश
अज्ञानता की मैल
अंधकार की बाधा
असत्य रुपी पाप

तुम में दिखे श्री गणेश
कर्ता शुभेष
हर्ता विघ्नेश
भर्ता महेश

सुख मोदक
दुःख मूषक
संतुलन विवेक
कर्म नेक

त्रिशूल क्रांति
दूब शांति
सद्गुण कांति
हरे भ्रांति

महाशक्ति नायक
सिद्धि विनायक
मंगल दायक
दीन सहायक

आदि ॐ
मध्य गं गणपते
अंत नमः
श्रीफल सुफल सफल गणेश

कृष्ण कन्हाई

केवल एक

कारागार में जन्मे

कठोर समग्र जीवन

कोर-कोर संपूर्ण गाथा

कण-कण में है व्यापत

कृष्णमय है ब्रह्माण्ड

कलाएँ सोलह संपूर्ण

कर में सुदर्शन

कान में माया

कर्ता हर्ता भर्ता

 करतार बने चारों युगी

कृष्ण अखंड अनंत असीम

कृष्ण आधा राधा

कृष्ण प्रेम है मीरा

कमलापति संग बैकुंठ

कहे सब तुम्हे लीलाधारी

कृष्ण है सृष्टि दिव्य दृष्टि

क्रांतिकारी है कृष्ण

कुँजबिहारी

कुंदन आभा

कपुरवर्ण रंग

काया में सजा चंदन

केशव अति सुंदर

कमलनयन होंठ अधीर

केसरीवसन सिर मोरमुकुट

कंठ वैजयन्ती

कंचन आभूषण

कौस्तुभधारी

कांतिमहापुरुष

कानन में गैया चराते श्री मन

कृष्ण अंग महाशक्ति

कल्पवृक्ष में हरि दर्शन

कामनापूर्ति मोहन

कल्पना में सम्मोहन

कोमल भाव स्वभाव

कंठ मधुर स्वर भीगा संसार

कान्हा गोकुलप्रिय

कृष्ण संग खेलती गोपियाँ

कृष्णमुख में माखन

 कंदमूल अतिप्रिय

कमाल के सखा

कद्र करी मित्र सुदामा

कृष्ण सर्व-कल्याण

कवच बने द्रौपदी

कलाई में लाज-बंधन

 कर्मठ-ज्ञान प्रकटे सूक्ष्म-शरीर

कृष्ण-कथन गीता अनंत

कुरुक्षेत्र बना स्थान

करुणानिधान चेतना आधार   

कृष्ण विष्णु महावतार

कृषक स्वरुप अन्न धन संपन्न

कृष्ण जप कृष्ण तप

 कृष्ण रीझे सुन कीर्तन

कारीगिरी अद्भुत कर्म महान

कृष्ण बन काल

कलंक हरे संसार

किया कंस निकंदन

कृष्ण को अभिनंदन

कर जोड़ हृदयवंदन

कोटि-कोटि प्रणाम

हर घर तिरंगा

स्वतंत्रता का हमें आज परचम लहराना है
स्वाधीनता का हमें गीत पुरजोर देशभक्ति भाव से गाना है
स्वराज का हमें जो सम्मान मिला है उसे सिरमाथे रखना और पुख्ता बनाना है
हे मां भारती, तुम्हे सुदृढ़,संपूर्ण व साकार बनाना है

तेरी गोद में सोए अनगिनत शहीदों व जागते वीर सपूतों के लिए श्रद्धा से सिर झुकाना है
वंदे मातरम्, वंदे मातरम् का स्वर, सारे भारत में गुंजाना है
हमें स्वावलंबन का शुभ आह्वान करते जाना है
हे दिव्य धरा, सप्रेम व पुलकित भाव से संयुक्त, तू रहे सदा प्रगतिशील और भयमुक्त कहते जाना है

सदभावना की लौ सदा जलाए रखना है
सकुशलता से, सुकून से, संयम से, एकता को हर हाल में बचाना है
सद्गुणों और समर्पण से स्वदेश का कर्तव्य निभाना है
हे मातृभूमि, तुम्हे पवित्र, पोषक और सौभाग्यवान बनाना है

तेरी आन, बान और शान के लिए सदा तैयार रहना और मिट जाना है
अद्वित्य, अनमोल और अदभुत है हमारी जन्मभूमि इसका नाम जग में चमकाना है
तेरी लाज की रक्षा में, सरहदों पर खड़े असंख्य शूरवीरों के लिए नतमस्तक हो जाना है
हे भारत माता, तेरा दीदार, तेरा स्पर्श है उत्कर्ष, तेरी मिट्टी में जन्म ले और तेरे लिए प्राण तजे, श्वास में विश्वास भरते जाना है