Comfort zone

We are happy, satisfied and feel much relieved when we are in comfort zone at home or outside.Isn’t it ?

We work, do exercises and attend household chores where our maximum energy is consumed eventually to land at comfort zone of food, drink and sleep. Wherever we go in the world, we always look for comfortable places, meeting nice people, relishing food and enjoying relaxation zones. Of course, who wants to be discomfortable in life ? Even if we have to face daily challenges, obstacles or problems, at the end we tend to keep ourselves in good mental and physical comfort zone.

Then what is the signification of comfort zone exactly?

 It’s peace, harmony and calmness state of body, mind and soul that is whole heartedly required by everyone to balance discomfort state of body. Some people feel comfort in spreading their energy, freaking out and exploring adventure places in leisure time. They love to travel and visit cool places to rejuvenate themselves while others feel comfort in contracting their energy. They love to do yoga, meditation, enjoying massage and spa, pray, gardening, cooking or love reading while munching snacks at home. So it depends on person to person, how they look, perceive and react towards their work and circumstances around them with their sound energy to dwell into their comfort zone.

Some people wind up their energy and every clutter around them. It’s like collecting their energy to assimilate for nice and perfect look for their mental peace and health.

 Some people feel comfort in throwing things here and there to make more clutter around them. This chaos help them to release their negative energy to atmosphere to make them feel cool, relax and comfortable.

Comfort or discomfort zone tells lots about people their behavior and their personalities.

It’s said that those people who leave their comfort zone, self-build shell or their cozy nest, they achieve more, and their goals are very efficiently acclaimed while some people believe they don’t need to pay any cost to disturb their mental and physical state of comfort zone.

Life is about exploring your own energy banks. How much you are able to earn, spend and save your energy.

Energy is power and power is everything in this world. Low energy zones are called sleep, creative and comfort zones while high energy zones are called discomfort, productive and disturbed zones. Comfort or discomfort zone, keep changing your mindset and place for self-pleasure and good world.

In conclusion, l observed some people find themselves in discomfort state even in comfortable zone and vice versa.

Wish you a comfortable zone soon in this summer !

एक विचारणीय प्रश्न : शादी के लिए क्या चहिए

शादी प्यार से कब बन गई व्यापार

न किसी को पता न चला

न किसी ने ली खबर

भुगतते भी सब स्वीकारते भी सब

बेमतलब की सबके गले पड़ी हार

रिश्ते बनाने, संवारने वा गढ़ने निकले थे सब

पर सबके हाथ आई सिर्फ दिलों की हार

किसी ने झल्ला के पूछा तो और क्या चाहिए शादी के लिए यार

इसके लिए कैसे हो दिल से तैयार

शादी शब्द के अर्थ का हुआ अनर्थ क्यों कलयुग में झेलनी पड़ी यह मार

शादी जैसे पवित्र रिश्ते अब क्यों नहीं फलते-फूलते, चलते वा बसते

बना दिया इसे भी दिलों का नही, लेन देन का अशुद्ध व्यापार

शादी के लिए चाहिए बस उपयुक्त समय वा बस एक सुंदर विचार

आज की जरुरत आज का समाचार

दो दिमाग दो दिल नही

एक दिमाग एक दिल ही काफी है शादी के लिए

दो सैलरी दो घर नहीं

एक सैलरी एक घर ही काफी है शादी के लिए

दो गाड़ी दो नौकर नही

एक गाड़ी एक नौकर ही काफी है शादी के लिए

दो मंजिले दो सफर नही

एक मंजिल एक हमसफर ही काफी है शादी के लिए

दो घर परिवारों से आर्थिक वा काम की मदद नहीं

एक परिवार में आपसी समझ वा मदद ही काफी है शादी के लिए

दो कपड़े दो जोड़ी जूते नहीं

एक ढंग का कपड़ा एक आरामदायक जूता ही काफी है शादी के लिए

दो मंहगी प्यार की खुराक दो बड़ी खरीदारी की सौगात नही

एक कीमती समय एक समझदारी की सस्ती खुराक ही काफी है शादी के लिए

दो चंगे दो मंदे बंदों से न बनेगी कहानी

एक चंगा एक मंदा किरदार की कहानी काफी है शादी के लिए

जरुरत से ज्यादा सामान,धन और होशियारी नही

एक ने कहा दूसरे ने मानी

लो बन गई सबकी प्रेम कहानी

शादी के लिए और क्या चाहिए जानी

धरती पर स्वर्ग शादी की निशानी है

अब तो कोई नही परेशानी है

5 जून पर्यावरण दिवस पर चेतना भाव

एक संदेश हम सबके लिए है “पर्यावरण हरा आवरण माँगे पवित्रीकरण”

यह सच है कि सृष्टि का चराचर जगत

वृहद रूप से सुंदर, सबल वा सशक्त रूप में मानव को सहज उपलब्ध है

अनंत,असीम वा अद्भुत ईश्वरीय कृपा का साक्षात साक्षात्कार है

ये नेमतें हमारे भाग्य को गढ़े क्यों हम इन्हें भूले

ये बने, खड़े, हाजिर, तत्पर रहते चौबीसों घंटे सेवा में तैयार जैसे समर्पित सेवादार

कुदरत की हमारे प्राणों के लिए यह दिव्य सौगात है

मनुष्यता को समर्पित शांति, आराम, सरंक्षण वा पोषण का मनभावन उपहार है

वसुंधरा पर ही यह संभव, दुर्लभ वा दर्शनीय है

बेशुमार वन संपदा जन्नत का खुला द्वार है

प्रकृति की सांसों से चलती वा फलती हमारी सांसें है

कैसे भूले यह अनुपम प्रेम वा समर्पण का उत्तम विचार है

प्रकृति स्वयं में जीवंत वरदान है

हर जीव, जंतु, प्राणी को मिला अनोखा वा बहुमूल्य प्राकृतिक दान है

लेते है हम बखूबी तो लौटना भी श्रेयष्कर संस्कार है

आभार, प्रार्थना, चेतना सभी उज्वल भाव है

संभालना, समेटना, स्वच्छता रखना, निर्मल स्वभाव है

प्रकृति के प्रति सजगता और सरंक्षणता का सूक्ष्म भाव है

लेने देने से मनुष्य, प्रकृति और ईश्वर स्वत: संवरते है

सही, सकारात्मक वा संतुलन ऊर्जा से गुल गुलशन गुलफाम बनते है

आधुनिक युग का बड़ा अनिवार्य वा ज्वलंत प्रसंग है

प्रफुल्ल, समृद्ध वा पोषण होने की उत्कंठा वा उमंग है

हाथ से हाथ, कंधे से कंधा, कुछ बेहतर करे, न करे मंदा

एक पेड़ अवश्य लगाए, अपनों के नाम या बड़ो को देने को मान सम्मान

बूंद बूंद से भरता सागर फिर काहे को खाली रखे कर्म की गागर

आज वृक्ष बोएंगे, सींचेंगे, संभालेंगे, तभी कल फल खायेंगे

चाहे मिले एक दिवस एक हफ्ता एक साल

पर्यावरण पोषण में दे यथाशक्ति योगदान

हराभरा, शुद्ध, सुगंधित, सात्विक वातावरण सबका जन्म सिद्ध अधिकार

हरियाली वा खुशहाली की समेटे फिर अनगिनत भेंटे सालों साल

प्यार न नकार

प्यार महंगा भी मिलता है

प्यार सस्ता भी मिलता है

प्यार मुफ्त में भी मिलता है

प्यार किराए पर भी मिलता है

प्यार सच्चा भी मिलता है

प्यार झूठा भी मिलता है

प्यार मांगो तो ठेंगा मिलता है

प्यार नकारो तो गले पड़ता है

सतयुग मानो तो प्यार फलता है

कलयुग मानो तो प्यार छलता है

प्यार में कोई संवरता है

प्यार में कोई बिगड़ता है

प्यार महंगा सौदा है

लाख चाहो दिल से दिमाग का दही करता है

यह तो मुकद्दर की बात है यारों

कि किस को क्या मिलता है

जियो बेहिसाब जनाब

जीवन गणित है या गणित ही जीवन है

विषय गंभीर है पकाऊ है पर बहुत ही प्रचलित है

जीवन लाभ हानि की गिनती है या ईश्वर से विनती है

कुछ पल्ले नहीं पड़ा ख़ाक जीना आया कैसी पनौती है

ऊंट पहाड़ के आगे से सरपट निकला बाद में मैं समझा

ठगे जाना आज के आदमी की नियति है

हिसाब किताब जब लगाने बैठे एक दिन

तो चेता आया अमूल्य निधि जीवन को कौड़ियों में भुनाया

जिस मालिक का नमक खाते रहे वह तक न गया चुकाया

नायाब नसीब समझते थे खुद को खुदा को भी झुठलाया

रिश्तों की किश्तों को भरने में सारा जीवन घिसा और दिमाग घिसाया

जो पास में जमा पूंजी जोड़ी थी वो भी सब कच्चे दिमाग से गंवाया

स्कूल में मास्टर जी ने डंडे मार मार कर गणित पढ़ाया

सीख ले बच्चू काम आएगा नही तो पछताएगा

ढंग से पढ़ ले गणित कुछ बन ले नही तो संसार में बेमौत मारा जाएगा

दुनिया को समझने के लिए पैरों पर खड़ा होने के लिए

गणित को गोली समझ निगल लिया

जहां तक मुझे याद है मास्टर जी का पढ़ाया गणित का

एक भी सवाल एक दिन भी काम नहीं आया

वो तो रह गया किताबों में यादों में किस्सों में

दुनिया ने बिना किताबों बिना फीस बिना क्लास

बिना डंडे बिना फंडे के मुझे ऐसा गणित पढ़ाया

न भूल सके वो सभी अंक जिसने हमें राजा से रंक बनाया

हमें आजमा के हमें लजा के हमें सजा दे के

अनगिनत सवालों में ऐसा लपेटा ऐसा समेटा

सालों का सबक मिनटों में तुरंत समझ आया 

एक एक कर्ज पड़ा चुकाना कुछ भी न रहा बकाया

कोइ हमें तिजोरी समझ काम हममें जमा करता गया

किसी ने हमसे सामान मांग मांग कर हमें घटाया

किसी ने हमें कई गुणा बदनाम कर शून्य कर दिया

किसी ने हमारे इतने भाग किए कि मुश्किल हो गया जीवन गुजाराना

उलझे रहे बेहिसाब न कारण न समस्या समझ आई

हमारी जिंदगी की खुली किताब सब पढ़ गए

एक हम ही खुद तक को न पढ़ पाए खुदा को दी दुहाई

न निकला हल न समाधान न मिला जवाब

सबका निकला काम सब हुए नदारद टूटे ख्वाब

जिस भी समीकरण को सुलझाने वा संतुलन करने बैठते

खुद ही छोड़ने पर हो जाते मजबूर

घर के पढ़े लिखे बुद्धू जो ठहरे हजूर

किताबों का गणित और जिंदगी का गणित

जैसे बिना हथियार लड़ना हो पानीपत का युद्ध

इस हेर फेर में कोई बन गया करोड़पति कोई रह गया रोड़पति

बुद्धि के खेल में गणित के उल्टफेर में

क्या क्या गणना करनी पड़ी हमसे न पूछो

बुद्धि से बुद्धू तक की उपाधि हंस कर पहननी पड़ी

हाथ आई न माया न सत्ता देखो क्या करना पड़ा

सिर्फ कलम घिसाई कागज का पत्ता पत्ता

कुबेर का धन तो होशियार ले उड़े

हम आज तक न संभले ऐसे होश उड़े

मुफ्त में हमें मिली जगहंसाई और रुसवाई

जीवन को जीना था या पढ़ना था

यह बात आज तक किसी ने न समझाई

जमा घटा ने दोनों जहान से कर दी हमारी अश्रुपूर्ण विदाई

गणित या अगणित हमनें तो दोनों में मात खाई

पता नहीं आपको यह जीवन की परीक्षा रास आई या नही आई

और हमारी व्यथा समझ में आई या नही आई

ग्रहण

सूर्य को लगता ग्रहण

चंद्रमा को लगता ग्रहण

संसार में जो भी है शक्तिशाली

उसी को लगता है ग्रहण

फिर हम और तुम तो है केवल उस

महाशक्ति की परछाई

कैसे बचेंगे हमें भी तो लगेगा ग्रहण

ग्रहण के प्रकोप से आज तक कौन बच पाया है

कौन रहा अछूता कौन समझ पाया है

देखे न जात न पात बस क्षीण कर देता सबकी शक्तियाँ

सबका पुण्य कर्म वा पावन जीवन

दिव्य शक्तियों को निष्क्रिय करती तामसिक शक्तियाँ

क्या बात है सोचने विचारने की बात है

ग्रहण लगता केवल एक दिन

लेकिन वह एक दिन हम सब पर  पड़ता है भारी कैसे भूले हम

मानव शक्तियों को चुनौती देती दानव शक्तियाँ

 गहन यह राज है होते इससे सब मनोरथ काज हृदय में कर दफन

शक्ति का ह्रास सुप्त अचेतन बदहवास

सूर्य आत्मा चंद्रमा मन लगन शरीर

आत्मबल मनोबल तनोबल

सब होते इसके आगे निर्बल वा लघु बल

ग्रहण से निस्तेज संपूर्ण सृष्टि

ढीले पड़ जाते परमात्मा तक के परम बल

जीवन संतुलन के लिए है महत्व वा अवश्य

जीने के लिए चाहिए हमें दोनों पक्षों का बल

सकारात्मक बल वा नकरात्मक बल

सकारात्मक बल को रखे थोड़ा ज्यादा

नकरात्मक बल को रखे थोड़ा कम

तभी जीवन क्रम चलेगा चुनौती जितनी होगी प्रबल

कुछ उठेगा तो कुछ गिरेगा

कोई पाएगा तो कोई खोएगा

कोइ हंसेगा तो कोई रोएगा

कोई अमीर तो कोई निर्धन

कहीं सुख तो कहीं दुःख

कहीं धूप तो कहीं छांव

दो पलड़े प्रकृति ने बनाये

कायम रखने को संतुलन

संसार का सीधा सादा वा सरल सा नियम

परीक्षा तो परमात्मा तक को देनी पड़ती है

और तू रहा है डर

प्रभू प्रकृति और प्राणी

सबको शोधन संशोधन और सशक्तिकरण के लिए

झेलना पड़ता है निरस्तीकरण

ग्रहण को कर नमन शक्ति का कर वरण ईश्वर की ले शरण

कोई ग्रहण फिर तुझे नही सताएगा

यही है जीवन का सुंदर प्रकरण

घोर कलयुग का सच

सुनो भाइयों और बहनों

कलयुग की कड़वी कहानी

सब चेहरे दिखते एक समान

यहां न कोई राजा है न कोई रानी

न कोई अच्छा है न कोई बुरा है

सब भरते एक घाट पर एक समान पानी

फेसबुक के सब दीवाने है वा दुनिया के परम ज्ञानी

तो सुनो सब फेसबुक पर फेसबुक की जुबानी

न चलते न फलते यहां कोई कायदे वा कानून

न शालीनता न संस्कार न कोई सभ्यता की निशानी

यह सतयुग द्वापर त्रेता नही जनाब कलयुग है जानी

यह सिर्फ और सिर्फ कलयुग है प्यारे जिसे नानी भूली सुनानी

यहां सब करते है जी भर के मनमानी

कैसा समय आ गया है यह बोल बोल कर

समय पर ही डालते अपने दुःख दर्द अपनी सारी परेशानी 

कल कल करते कारखाने वा चलती फैक्ट्रियां

काला काला धुंआ छोड़ते वाहन वा गाड़ियां

कचरा कचरा बिखरा चहुँ ओर बदबू से भरी गलियां वही पुरानी

कसैला स्वाद जीभ और जिंदगी का

कलह कलह से उत्पन्न शोर और विपन्नता

केवल मुट्ठी भर भोजन पानी वस्त्र धन रोजगार

जनसंख्या फैलती जैसे हो महामारी सदियों पुरानी

आंसू पी लेते आंसू खा लेते जिसकी न पहचान

न अस्तित्व जिनका जर्जर जीवन वा बेमानी

सबको नही मिलती सुखद यहां जिंदगानी

कुछ धन से अमीर कुछ दिल से अमीर

फिर भी मानवता का पात्र खाली पड़ा देखता मुख दानी 

क्या लेकर आए थे क्या लेकर जायेंगे

सब जानते सब मानते फिर भी मोह में फंसे

माया का न आदि न अंत कथा की व्यथा सबकी वाणी

मैं में सब मरे सब तेज गति कुमति में गिरफ्तार वा कर्जदार

फिर भी आगे निकलने की होड़ में

बिगाड़ दिए इंसानियत के तार और रंगीन जवानी

भद्र हाथों को बना के रखे गुलाम स्वार्थी वा कलुषित मन

परवदगार खुद ही आदमी के डर से तालों में हो गया बंद

काहे को दिखूं होशियार सनकी ही ठीक उसने ठानी

कलयुग लहूलुहान है कांटे चुभ रहे है मानव हैरान परेशान है

क्या इसका है कोई समाधान या कोई हल

क्या जड़ता ही गले होगी लगानी और निष्क्रियता अपनानी

निष्काम कर्म ही धर्म है कर्म ही सबसे जरूरी है

समझना सबको यह मर्म है धोना पोंछना वा संवारना

कलयुग में कड़ी मेहनत बड़ी जरूरी वा सबसे पहला कदम है

कर्म ने तोड़ा है तो कर्म ही जोड़ेगा बनेगी सबकी बात बतानी है

कर्म से हारे हैं तो कर्म से ही जीतेंगे जीवन तभी स्वर्ण कहानी है

नही तो कलयुग बन कर रह जायेगा कोलाहल की काण्ड की वा काल की

वहम अहम और भ्रम की नितांत खोखली कहानी

अदृश्य प्रभु

वो दिखता है, देखने वाले की नज़र चाहिए

वो कृपा करता है, पाने की पात्रता चाहिए

वो समझता है, स्पष्ट संवाद होना चाहिए

वो पिघलता है, प्रार्थना में दम होना चाहिए

वो प्रेम करता है, भाव भरा दिल होना चाहिए

वो सामने बैठा है, स्वीकार कर लेना चाहिए

वो न जाने तेरे कितने, अपराध क्षमा करता है

उसके जैसा कोई नहीं न्यायाधीश, मान लेना चाहिए

वो सबका मालिक है, पल पल संभालता है

उसकी उपस्थिति के तुझे, और कितने सबूत चाहिए

वो अदृश्य है, क्योंकि तप से, खोजने पर ही मिलता है

सबको नहो मिलता, इस कथन को मान लेना चाहिए

वो अगर भाग्य है, तो उसे पाने के लिए कर्म चाहिए

जो बोया है खुद काट ले, खुद पर संशय क्यों होना चाहिए

बाहर ढूँढ़ता है उसे ,भीतर बैठे प्रभु से जरूर मिलना चाहिए

माया बड़ी या रचनाकार, मूल भेद समझना चाहिए

मनुख का चोला पहन, दर दर डोला, तन भटका, मन कब टटोला

बंधन तोड़ने आया था, बंधन में और फँस गया, बस ज्ञान इतना चाहिए

काया से माया का या सरमाया का, कौन सा आलिंगन चाहिए

जो तुझे भव से चाहे तारना, उससे दूरी की कीमत चुकानी आनी चाहिए

प्रारब्ध

कर्मभूमि पृथ्वी मानुख का पाया जन्म

कठोर परिश्रम बिना कर्म का क्या मर्म

मन वचन कर्म से जीवन का भरण-पोषण

सेवा समर्पण व सिमरन में बसे श्रेष्ठ कर्म

अच्छे का फल अच्छा बुरे का फल बुरा नियति क्रम

सब पर एक समान लागू प्रकृति का कड़ा नियम

जन्म-जन्म का चलता एक ही खाता संचित कर्म

सुख दुःख भोगना लिखा प्रारब्ध इसके फल नर्म-गर्म

क्रियामान है वर्तमान कर्म जुड़ेगा संचित कर्म

शुकराना ज्यादा मुकरना कम कर्मबन्धन का शमन

कर्म के बीज चुन-चुन कर बोना सतर्कता पल-पल

संभल-संभल चलना केवल कर्म अपना फल मिलेगा कल

 न फसल अपनी न मोल अपना न मालिकाना हक

कर्ता भर्ता हर्ता वो मालिक तू तो केवल निमित्त भर

तू भाव से सींचना शुभ कर्म को भींचना

मेहनत से है भरना कुँआ पावन जल को है खींचना

शक्ति भक्ति मुक्ति के घाट सब जीव उतरते

कर्मों से करते नित्य स्नान बहता निर्मल गंगा जल

शुरुआत में अनुराग फिर वैराग बने मंज़िल

अंत में  विरक्ति से सब लक्ष्य हो हासिल

जो बिन चाहे बिन मांगे मिले कहलाए वो भाग्य

जो बिन कहे बिन देखे जेब से निकले वो दुर्भाग्य

जो दुःख में दे सहानुभूति और सुख की गहरी अनुभूति

वो मालिक की परम कृपा दुर्लभ सौभाग्य की प्राप्ति

एक हाथ से कर्म दुसरे हाथ से धर्म व आँखों में शर्म

फिर देख भगवान जगन्नाथ का अद्भुत दर्शन

कर्म ज्ञान भक्ति का मार्ग सबसे कठिन

निष्काम भाव व निःस्वार्थ कर्म में रह सदा मगन

मन के वहम अहम् और भरम नष्ट करते सब कर्म

धर्म अर्थ काम मोक्ष स्वतः होंगे परिपूर्ण यही सुकर्म

प्रारब्ध चाहे बड़ा हो या भारी हो या कुल्हारी हो

कोशिशों पर टिकना अनाड़ी हो या खिलाड़ी हो

हंसते खिलखिलाते दिल से भरना प्यार की किश्तें

प्रारब्ध से मत डर कर डट कर सामना मिलेंगे फरिश्ते

प्रयास और प्रार्थना में है बड़ी शक्ति व दम-ख़म

हरदम रखना याद प्रारब्ध माँगता केवल शुभ कर्म

नमस्ते आंटी

अंग्रेज चले गए और छोड़ गए अंग्रेजी एक नाम “आंटी”

नारी पर भारी पड़ती “आंटी” नाम की आरी

इस आंटी में निबटे सभी रिश्तेदार नाते दोस्त जान पहचान या अंजान

सबका बस एक ही काम “आंटी” ठोको नाम

सभी महिलाओं और सभी बुजुर्गों को खलता चुभता गुस्साता

कभी न भरमाता यह नाम

फिर भी “आंटी” नाम के जैसे बन कर रह गए गुलाम

चिढ़कर झल्लाकर दुःखी होकर अक्सर सभी बोलेंगी

“आंटी मत कहो न” ऐ भले इंसान

पर आदमी तो आदमी है इस संसार का अनोखा प्राणी  

सीधा-सादा सपाट भोला-भाला बेचारा अदना और नादान

वो क्या जाने “आंटी”नाम बुलाने के परिणाम

वो अज्ञानी कहां जानता होगा

हमें होती है बड़ी कोफ्त और सहनी पड़ती है फजीहत

“आंटी” शब्द पिघले सीसे की तरह उतरता कान

महिलाओं को एक ही संबोधन में लपेटती ये दुनिया सारी

औरत की बस इत्ती सी पहचान इत्ता सा नाम और मान

पुकारती जानती या समझती दुनिया केवल एक ही नाम

हास परिहास या उपहास लेकिन आदमियों को सब माफ

“नमस्ते आंटी” सुनते ही भवें तन जाती

चढ़ जाता पारा औरतों का ऊंचा सातवें आसमान

आदमी न देखता न समझता न औकात न शऊर

बस फेंक दिया बेमतलब “आंटी” का गुबार

भैया आंख खोल देख तो ले सामने कौन खड़ी है

बच्ची बूढ़ी प्रौढ़ा या जवान

न उम्र न शरीर न चेहरा न व्यक्तित्व न पहचान

बस चेप दिया सबको “आंटी” का तकियाकलम

8 से 80 साल तक के आदमी की एक ही घिसी पीटी जुबान “आंटी”

चलाते सब इसी से काम करते खामखा स्त्रियों को बदनाम

“आंटी” नाम में तुल जाती सब उम्र की नारियां बेहिसाब

बच्चे जवान मध्यम औसत या बुजुर्ग न बच सके सब बेजुबान

इस अटपटे से नाम से सब डरते निकलती सबकी जान

बिना देखे ही कोमल हृदय नरम स्वभाव वा नाजुक काया को

दे दिया “आंटी” का भद्दा सा नाम बिन मांगी सामाजिक शान

न इनका मतलब आपसे न आपकी परवाह न करे सम्मान

न जानने बुझने का विकल्प ना सरल समाधान

हद तो तब हो गई जब पड़ोस के बुजुर्ग बोले

“आंटी बेटा” बिजली के आने की कुछ सूचना मिले तो देना

थोड़ा लगा लेते दिमाग तो अंकल जी मिलता इसका उपनाम

दीदी देवी बिटिया गुड्डी काकी बीबीजी

बहनजी मांजी मैडमजी अपनेपन के नाम

असभ्य संसार में क्यों नहीं चलते यह प्यारे नाम और शालीन काम

अबला नारी पर अंग्रेजों ने जाते जाते च्यूंगम सा चिपका दिया

“आंटी” का खिताब वा बेहूदा नाम

मैं काइयाँ तू साइयाँ

जिन खोजा तिन पाइयाँ तेरे इश्क ते कुर्बान मैं साइयाँ

अखां खुलिया जद मेरी मेरे साइयाँ सच्चा रूप तेरा देख मैं हर्षाइयाँ

तेरे वास्ते तेरे रास्ते छड़ दुनिया तेरे कोल हुन मैं आइयाँ

जिन खोजा…………………………………………

ऐ प्रेम दा रंग जो तू चढ़ाया है मोह-माया दे सब रंग भूल मैं आइयाँ

जिन खोजा……………………………………………

तू लाड़ लड़ावे तू मैनू दुलारे तेरे एक इशारे ते मैं दौड़ी आइयाँ

जिन खोजा…………………………………………

तेरे सुख दे द्वारे मैं दुःख छड़ आइयाँ तेरे आगे कुछ न सुझदा मेरे साइंया

जिन खोजा…………………………………………

ऐ जन्म-जन्म दे फेरे में न जानदी तेरे प्रीत दे सागर विच डुबकी लगाइयाँ

जिन खोजा…………………………………………..

हुन छड़ना हथ तू मेरा मेरे साइंया मेरे प्रेम दी रखना लाज मैं हाँ काइयाँ

जिन खोजा…………………………………………

तू बड़ा कब होगा ?

मां कहती थी कब तक करेगा यह नादानियां

तेरी शैतानियाँ से होती है हमें बड़ी परेशानियां

तू कब जिम्मेवारियां समझेगा

तू कब संभलेगा तू बड़ा कब बनेगा

जब तक मां थी तब तक दुनिया की क्या परवाह थी

मेरी दुनिया खाना-पीना चैन की नींद वा आराम थी

कान में शब्द उतरते ही झट से दिमाग से उड़ जाते थे

उसने बोलना न छोड़ा और मैंने नज़रअंदाज करना

मां थी तो चाहे मेरी दुनिया फैली बिखरी लापरवाह थी

वो दिखती रहती थी तो मेरी दुनिया सही सलामत कायनात थी

सब चिंताएं उस पर छोड़ मैं निश्चिंत था

मां का उलहाना करहाना मुझे जगाना जारी था

उसे बस रोज एक ही राग गाना और गुनगुनाना था

मेरे सोए भाग्य को जगाना था

समय पंख लगा उड़ गया

न मैं बदला न मां का बड़बड़ाना

तू बड़ा कब बनेगा तू कब बनेगा सयाना

अब स्वर मंद पड़ गए थे फीका समझाना

सिर पर हो मां का हाथ और प्यारा सा साथ

खड़ी रही वो हमेशा बन हमसाया ताउम्र मेरे पास

मां के होते कौन बड़ा बनना चाहता है

और आज तक कौन बड़ा बन पाया है

“मांवां ठंडिया छावां” में मां खुद ही उलझ जाती थी

चाहे खूब सुनाती थी पर जी भर प्रेम भी लुटाती थी

ये सिलसिला उसकी आखरी सांस लेने तक चला

जब तक मां लेती रही बलाएं और उतारती रही नजर

मुझे न जानना था न समझना था

मुझे कँहा बड़ा बनना था

मां के लाड़ दुलार से बस बिगड़ना था

आखिर बड़ा बनकर भी क्या करना था

उसकी सांसों के टूटने पर उसके हाथों के छूटने पर

उसकी आंखों के बंद होने पर मैं लड़खड़ाया

तुझे खोकर अचानक ये मुझे क्या हो गया

देख मां आज मैं सचमुच बड़ा हो गया

माँ की कही एक एक बात स्वतः समझ आ गई

मां के गुजरने पर पाया जीवन मर्म टूटे मेरे सारे भ्रम

उसका प्यार भरा ताना भी खत्म शिकायतें भी खत्म

उसकी आवाज खत्म मेरा बचपना भी खत्म

देख मां आज तेरा बेटा सचमुच बड़ा सयाना हो गया

पर इस बड़ा बनने की कीमत में मां मैंने तुझे गँवा दिया

महंगे हो गए है आप

तुम मिलना बैठना बतियाना चाहते हो
दिल के तार पुनः जोड़ना चाहते हो
पर यह मुमकिन नहीं हो पाएगा जनाब
क्योंकि महंगे हो गए है आप

तुम सुलझे संवरे सुशोभित और सुसज्जित
मैं उलझा बिखरा फैला और लज्जित
बनेगी न अपनी बात
क्योंकि महंगे हो गए है आप

तुम ज्ञान अनुभव की ले कर चलते ढाल वा तलवार
मैं अज्ञानी नादान पात्र शक्ति सामर्थ्य से लाचार
अच्छा है छोड़ दो यह विचार
क्योंकि महंगे हो गए है आप

तुम फैले संपूर्ण ब्रह्मांड में भरे आत्मविश्वास
मैं खड़ा बिंदु पर बदहवास वा निश्वास
बेहतर है न जाने एक दूसरे का हाल
क्योंकि महंगे हो गए है आप

तुम संसार से भरमाए हो नोटों से जेब भरे हो
मैं संसार से परे हूं खरे खोटे सब देख तरा हूं
रिश्तों की नरम डोर संभाल न पाओगे
क्योंकि महंगे हो गए हो आप

तुम स्थूल संसार में विचरते हो
मैं सूक्ष्म संसार का जीव दिखता हूं
सस्ते जज्बातों को समझ न पाओगे
क्योंकि महंगे हो गए है आप

तुम आओगे उपलब्धियों के घोड़े पर सवार
मैं नाकामियों को समेटता बीमार वा लाचार
गरीब बस्ती में कहां मस्ती कर पाओगे
क्योंकि महंगे हो गए है आप

तुम जीवन सफल सिद्ध करते वरदान
मैं अभिशाप झेलता मामूली इंसान
सदियों के फांसले मिनटों में कैसे भर पाओगे
क्योंकि महंगे हो गए है आप

देख के तुम्हारा रुतबा और रूआब
मैं न ला पाऊंगा आवभगत का भाव
नदिया के दो किनारे कहां मिला पाओगे
क्योंकि महंगे हो गए है आप

प्रेम के गुलाम

ये प्रेम के गुलाम

अक्सर रहते है गुमनाम और बदनाम

ये प्रेम के सच्चे सौदों में

बिकते है खुलेआम और मिलते है सस्ते में सरेआम

ये प्रेम के तराजू में

आजीवन तोले जाते है और मुफ्त में दिलों जान बांट आते है

ये प्रेम में पड़ते है सब पर भारी

एक पलड़े में खुद तो दूसरे पलड़े में सारा जहान भर लेते हैं

ये प्रेम के मसीहा कहलाते है

एक ढूंढो तो हजारों आसानी से मिल जाते है

ये प्रेम मे खूब हंसेंगे खूब खुलकर बातें करेंगे

पर सबसे छुप कर अकेले में रोकर सुकून वा आराम पाते है

ये प्रेम के पुजारी बन सारा जीवन बिताते है

बिना इनके खुद खुदा अधूरा है और दुनिया बेमानी है

ये प्रेम को होश से ज्यादा जोश में निभाते है

जिंदादिली और ताकत की बेमिसाल तस्वीर बन जाते है

ये प्रेम के झमेलों में मेले सी चमक वा झलक दिखलाते है

अपनी फिक्र अपना जिक्र करना सदा भूल जाते है

ये प्रेम के न जादूगर है न बाजीगर है न कारीगर है

ये तो है बस प्यारे से साधारण इंसान

ये प्रेम की खातिर रहते तैयार होने को कुर्बान

फिर भी लोग इन्हीं पर न जाने क्यों उंगली उठाते है

ये प्रेम के गुलाम इंसानियत और रूमानियत की खातिर

जीवन का हर कड़वा घूंट अमृत समझ पी जाते है

दुःख को बुन

दुःख को पाया तो समझ आया इसका मर्म

दुःख में दबे थे बंधे थे छुपे थे

अनगिनत सुख-कर्तव्यों  के धागे

समझदार व्यक्ति दुःख को लेते है बुन

दुःख नहीं है घुन बना इसे जीवन का ईंधन

कष्ट मिले दुनिया से तो बना एक नाव

चल पड़ दूर मंजिल की ओर हो सवार

परेशानी मिले तो लिप मिटटी से चमका ले अपना घर

तानों व्यंगों से न घबरा भर रंगोली में रंग

कांटे चुभे तो रच डाल सुंदर बगिया अपने आँगन

पीड़ा मिले तो बो दे खेत में अनगिनत बीज

अपशब्द के घूँट पीकर कर नृत्य बदल दे दुःख के रंग

मीरा बन जहर पी लेना मिलेगा कृष्ण का संग दिव्य प्रेम प्रसंग

अपयश की कालिख को लेखनी में उतार रच देना इतिहास

हिंसा का कर विरोध झाँसी की रानी समान अन्याय से लड़ना जंग

दुःख के बना खंजर हथियार सक्षम सम्बल हो जाना उपेक्षित नार

सुख को छुपाना पलकों में ख़ुशी को दबाना सीने में

आशाओं को भींच लेना बाहों में विश्वास रखना जुबां के नीचे

अरमानों को बांधना पल्लू में उत्साह को खींचना साँसों में

दुःख से उबरेगा नर तो बनेगा नीरज नारी संवर बनेगी महानारी  

दुःख देने वालों को सुख की परिभाषा सहज सिखलाना

लेन-देन की इस दुनिया में सुख का कम दुःख का सिक्का ज्यादा चला

दुःख देने वालो से नहीं दुःख समेटने वालो का कारोबार सदा चला

जीवन के तराजू में एक सुख के पलड़े से ज्यादा दूसरे में दुःख अधिक चढ़ा

जीवन- मरण

मैंने स्वर्ग और नर्क को

बड़ी शिद्दत से जिया है

मैंने कभी देवदूतों से कभी यमदूतों से

साक्षात् सामना किया है

मैने शकुन अपशकुन के सभी रंग और प्रसंग  

जीजान से झेले और संभाले है

मैंने आदमी को जानवर

और जानवर को आदमी बनते देखा है

मैंने स्थूल संसार में सूक्ष्म संसार को

और सूक्ष्म संसार में स्थूलता का गहरा अनुभव किया है

मैंने घोड़ों को गधे

और गधों को घोड़े बनते अक्सर देखा है

मैंने इसी संसार में राक्षसों और संतों का

मेला वेला और झमेला सब देखा है

मैंने अच्छाई को तड़पते

और बुराई को खूब फलते फूलते देखा है

मैंने भलाई को रोते बिलखते

और कुटिलाई को हँसते खेलते देखा है

मैंने कर्म के क्षेत्र में कई झंडे गाड़े

और आलस व अज्ञानता में कई अमृतप्याले तोड़  डाले है 

मैंने वफ़ा से ख़फ़ा और बेवफ़ा से नफ़ा

बेख़ौफ़ इस दुनिया का बिंदास दस्तूर देखा है

मुझे कुछ अपनों में बेगाने मिले कुछ बेगानों में अपने मिले

मेरे ऑंसू किसी से देखे न गए और किसी ने मुझे जी भर के रुलाया है

मैं स्वयं की लंबी यात्रा में धरती से पाताल लोक    

और आकाश लोक दोनों लोकों में निरंतर घूमा है 

मैंने तन को तोडा है मन को जोड़ा है

और आत्मा को गहरा झिंझोड़ा है

मैंने पुरानी मानसिकता पुराने रीति रिवाज छोड़

नई दिशा नए आयाम का कठिन सफर तय किया है 

मैंने रिश्तों से ऊपर रखे मानवता के फ़रिश्तें 

न्याय और विश्वास से सबसे जुड़ने का संकल्प किया है

मैंने घरों को टूटते बिखरते काँपते

और वंशों को बिना कारण विध्वंस होते देखा है

मैंने आशीर्वाद को अभिशाप में बदलते

और अभिशाप को आशीर्वाद में बदलते देखा है

मैंने प्यार में गहरे तैरते डूबते व उभरते

और नफरत की आग में अपना घर फूँकते लोगों को देखा है

मैंने राम का आदर्श और कृष्ण का संघर्ष

जीवन में साक्षात् उतारते लोगों को भली भांति देखा है

प्रतिस्पर्धा के इस युग में जीने के सब गुर सीखे

पर न अपना भाग्य न अपनी कोशिशें सफल कर पाया हूँ

मैंने “माया मिली न राम” सन्देश को चरितार्थ किया है

ईश्वर के मर्म को अपने कर्म को और इंसानी धर्म को

समझने का एक असफल प्रयास किया है

हम सब मजदूर

खुदा ने जब यह खूबसूरत दुनिया बनाई
खुद बैठ कर एक एक चीज जीजान से बनाई
इंसान की कर रचना अपनी एक सुंदर प्रतिकृति बनाई
उत्तम में से रखा मनुष्य सर्वोत्तम
उसके लिए प्रत्येक नेमत रचाई
सब कुछ बनाया उसने बहुत वा बेहतरीन
बस एक चिंता उसे सताई
मैंने किया अपना काम
सौंपा सब तुझे इंसान बनना कद्रदान
कैसे सुंदर दुनिया की होगी साफसफाई रखरखाई
मनुख ने देख ईश्वर की चिंता की लकीरें
प्रेम और विश्वास की दी दुहाई
उसे ढांढस बंधा कहा हे मालिक !
हमारे लिए गर तूने बनाया अद्भुत रेनबैसेरा
हमारी हुई संभालने की जिम्मेदारी
हे ईश्वर ! मालिक रहोगे सदा तुम हमारे
हम रहेंगे आजीवन दास तुम्हारे
हम बनेंगे तुम्हारे दो पांव दो हाथ दो आंखें
तेरी रहमतों और नेमतों को
संजोएंगे तन मन धन के साथ
मालिक वो एक हम सब है मजदूर
फिर क्यों है ये दूरियां रहते सब दूर दूर
करते काम ऊपरवाले का सब बिना शर्त सब मंजूर
मजदूरी देते सबको ऐ मालिक आप
दिल खोल एक बराबर समय पर जरूर
घोर असंतुलन फिर इस धरती पर क्यों
मजदूर ने मजदूर को अपना न समझा
मजदूर ने मजदूर का न रखा मान
मजदूर ने मजदूर को किया शर्मिंदा
मजदूर ने मजदूर को किया मजबूर
मजदूर ने अपने मालिक को किया निराश
सब मजदूरों ने मालिक से कर एकता का वादा
तोड़े वायदे वा कायदे कानून
उस मालिक की दुनिया जी भर कर लूटी
न संभाली ढंग से न मिलजुल कर नेमतें पाली
मजदूर अनेक पर हे मालिक तू नेक केवल एक
क्यों कुछ करते राज क्यों कुछ करते एतराज
क्यों कुछ करते काज क्यों कुछ ही मानते तेरा राज
क्यों कुछ ही रखते तेरी लाज
मजदूर दिवस पर आओ ले शपथ
बनेंगे हम सब सच्चे मजदूर अच्छे मजदूर
एक दूसरे की मजदूरी का और मजबूरी का
न उड़ाएंगे मजाक न हंसेंगे बेबाक
उस मालिक का रखेंगे मान सम्मान
उस मालिक को देंगे अपनी सच्चाई ईमानदारी का सच्चा सबूत
और लेंगे उससे अपनी मजदूरी खुशी खुशी
ढेर सारी और इत्मीनान से भरपूर

कोरा आदमी

न ज्ञान का पहना चश्मा

न संस्कारों का लगाया माथे चन्दन  

न लज्जा के पहने अंगवस्त्र

न मानवता की ओढ़ी शाल

न उच्च कोटी कर्म की रखी चोटी

न विनम्रता की पहनी तुलसी माला

न आँखों में शर्म का काजल लगाया

न हौंसलो की कंघी घुमाई

न सत्य की शपथ सुपारी खाई

न शौर्य की पहनी टोपी

न मर्यादा की पकड़ी छड़ी

न सद्गुण के पहने आभूषण

न सजग रहने को पहने खड़ग

न वक़्त का आदर करने को घड़ी लगाई

न खेल की भावना के पहने रक्षासूत्र

न आत्मा को सत्संग की सुगंध सुंघाई

न मन को सकरात्मक ऊर्जा की धूप लगाई

न बुद्धि को वेदों की धूनी दिखाई

न देह को गंगा में डुबकी लगवाई

न मुख में रखी राम नाम की इलायची मिश्री

हे नारायण ! आदमी ने इंसान न बनने की बड़ी कीमत चुकाई

मैं सर्वव्यापी

न धन-दौलत

न मान-सम्मान

न प्रशंसा तारीफ

न यशोगान

न उपहारों का सामान

न फूलों के हार

न रंग बिरंगे गुलदस्ते

न शानदार पार्टी

न नाच गाना

न सम्मान-समारोह

न अखबारों की सुर्खियां

न मेरे नाम के प्रतिष्ठित संस्थान 

न सर्वश्रेष्ठ नागरिक होने का तमगा

न सफलता की सीढ़ी चढ़ने का पैमाना

न इतिहास के पृष्ठों में उपस्थिति

मेरी कर्म के प्रति सच्ची निष्ठा

और प्रतिबद्धता होने का

मुझे न देना ईनाम

न कोई गुमान

इन सबसे दब मैं मर जाऊंगा

कर्म की सच्ची राह से फिर डिग जाऊंगा

मैं निर्मल से कुटिल हो जाऊंगा

यदि हो मेरे हितैषी तो बस इतना करना

मुझे प्यार देना

मुझे संभाल देना

मुझे अपना स्नेहभरा हाथ देना

मुझे गले लगाना

मेरे साथ हमेशा खड़े रहना

मुझे और विनम्र होने की पट्टी पढ़ाना

मुझे मुसीबतों में डटे रहने के गुर सिखलाना

मुझे पीठ पर हल्की सी थपकी देना

मुझे हौंसलो की जोर से मुक्की देना

मुझे प्रेरणा की घुट्टी देना

बस आराम करने को एक छुट्टी देना

मेरे भोलेपन को मेरी कमजोरी न समझना

मुझे मेरी मंजिल की याद दिलाते रहना

मेरी हमदर्द बन मेरी संवेदना समझ मुझे बहलाना

मैं ईश्वर के प्रति आस्थावान रहूं यह विश्वास देना

मैं निर्विकार भाव से काम करूं यह आशा देना

मैं अकेला नहीं इस दुनियां में

आस पास होने का सुंदर अहसास देना

मेरी उपलब्धियों गिनने की बजाए

हारने के बाद कैसे सहा जाए जिंदा रहा जाए

मुझे तसल्ली वा ढांढस के दो शब्द कहना

बुराई से लड़ सकूं अच्छाई पकड़ सकूं

काबिल बनने के कंधे बन जाना

मिट्टी की देह से कुछ पुण्यकर्म कर

कर्मबंधन काट सकूं यह आशीष देना

कर्म के गूढ़ भाव से हर दिल में उतरना चाहता हूं

कर्म को धर्म समझने का मर्म संजोना चाहता हूं

मैं पापी कर्म की उत्कृष्टता तक पहुंचना चाहता हूं

मैं बन सर्वव्यापी शुभ कर्म फैलाना चाहता हूं

संपूर्ण ब्रह्मांड में कर्म का विस्तार

निष्काम भाव से करना चाहता हूं

No love vibes No joy rides

.

meeting chatting loved ones

beautiful moments lots of fun

desperate to catch good times

an idea usually struck in mind

to throw a wonderful surprise

an inner voice suddenly calms me down  

wait and see who tunes to your vibes

an eye opening fact a harsh truth

made me crazy difficult to realize

sorry dear no love vibes no joy rides

sharing caring kind gestures

easy to call you through a voice splendor

 cozy time to open heart so tight

vent out emotions all problems sort out

your engagements routine busy statements

your availability seems like a pretty crime

hardly could control my feelings

picked up phone but unable to dial

sensed a great silence over distant

sorry dear no energy vibes no joy rides

sending gifts greeting good wishes

human lives simpy alive smile meaningful

god is one his blessings innumerable

makes joy doubles sorrows negligible

mutually connect direct human touch

let’s create utopian world here on earth

body stiff mind occupied only soul vibrates

breathe feel visualize all divine signals

can’t wait longer for your reply

yes dear send me good vibes for joy rides