
पंच तत्वों में समाहित भगवान
भूमि, गगन, वायु, अग्नि, नीर कण-कण
शक्ति, प्राण, चेतना में रहता वह निर्गुण
पहला ऋण भूमि, सुन मूढ़ मति सज्जन
जीव, वन, स्वर्ण-चाँदी, वस्त्र और अपारअन्न-धन
भूमि सहती भार, व्यर्थ पदार्थ करते सब विसर्जन
स्वछता में छुपा वो सद्गुणी, चुका पहला ऋण
अस्वछता रखने का है भारी दंड प्रकरण
दूसरा ऋण गगन, नीली छतरी का सुरक्षा आवरण
देवी-देवताओं, गुरुओं, ग्रहों, पितृ और भर्ता ऋण
सूर्य, चंद्र और वर्षा-ऋतु की बौछार पावन
नभ का बहुत आभार, बरसती कृपा घन-घन
झुका सिर, नहीं तो सिर पर मुसीबतों का आगमन
तीसरा ऋण वायु का साफ, निर्मल व शीतल हवा का आलिंगन
बिना प्राण-वायु ,एक क्षण भी, न अस्तित्व, न जीवन
पर्यावरण को दूषित करने से बिगड़े जीवन के समीकरण
एक नादानी से कंही न हो जाये, मानवता छिन्न-भिन्न्न
हरियाली लाने को, हल चला या निकाल हल, घोर जतन
चौथा ऋण अग्नि का, लकड़ी, कोयला व ईंधन
ऊर्जा, ऊष्मा और उजाला का करते भरपूर सेवन
बिन उष्णता के ठंडा, मृत व निर्जीव तन-मन
दिव्य प्रेम के देते जाए, छोटे-छोटे कंठ स्वर से ऋण
पाँचवा ऋण नीर का, पोषण गंगा का वर्ना पाषाण जीवन
कुँए, झरने, नदियाँ और सागर, आद्रता से संपन्न
बिन पानी सब सून, कहे कबीर सुवाणी, जल ही है जीवन
भगवान बिखरा पोषित करने हर घर हर आँगन
आओ चुकाए थोड़ा-थोड़ा प्रत्येक ऋण प्रतिदिन
अपनी शक्ति सामर्थ्यनुसार यह पांच ऋण
भगवान के प्रति जताए आभार कर्म भाव-वंदन
परम सत्य है भगवान ऋण मुश्किल व नामुमकिन
पर फर्ज़ समझ करे पावन घर, धरा और पर्यावरण



